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Karnal News: 38 साल के संघर्ष की जीत, सुप्रीम कोर्ट ने सुमित्रा देवी के हक में सुनाया फैसला
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सुमित्रा देवी व सतबीर की संघर्ष के दिनों की फोटो जब वह कोर्ट की तारीखों पर जाते थे आकाईव
करनाल। नौकरी की उम्मीद और अपना हक पाने की जिद में सुमित्रा देवी ने 38 साल तक संघर्ष किया। आखिरकार 17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुमित्रा देवी के हक में फैसला सुनाते हुए नौकरी देने की बजाय 12 लाख रूपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुमित्रा की ओर से अधिवक्ता सूर्यनारायण पांडेय ने पैरवी की। फैसला सुनकर 63 वर्षीय सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं।
करनाल के कोहंड गुढ़ा गांव से शुरु हुआ यह संघर्ष पानीपत के किशनपुरा में विराम हुआ। वर्तमान में किशनपुरा निवासी सुमित्रा देवी ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1988 में इंडियन ऑयल के बॉटलिंग प्लांट घराैंडा तहसील के गुढ़ा गांव में नौकरी के लिए आवेदन किया था लेकिन नियुक्ति नहीं मिली। इस नाैकरी के लिए जिला प्रशासन की स्थानीय रोजगार कमेटी की ओर से 50 लोगों की अनुशंसा की गई थी। सुमित्रा का नाम भी इन्हीं में से 49 नंबर पर था, सुमित्रा का कहना है कि उन्हें यह कहकर नाैकरी नहीं दी गई कि वह एक महिला हैं, यहां भारी सिलिंडर उठाने का कार्य होता है जिसे वह नहीं कर पाएंगी।
ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक नहीं मानी हार
नौकरी ने मिलने के बाद सुमित्रा ने न्याय के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्याय के लिए शुरू हुई यह लड़ाई ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। ट्रायल कोर्ट ने 22 सितंबर 1990 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे इंडियन ऑयल ने चुनौती दी। छह अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। इसके बाद सुमित्रा ने हार नहीं मानी और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 14 अक्तूबर 2025 को न्यायमूर्ति विकास बहल की अदालत ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
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पति सतबीर मजबूती से खड़े रहे साथ
करीब चार दशक के इस पूरे संघर्ष में सुमित्रा के साथ उनके पति सतबीर मजबूती से खड़े रहे। वह हर तारीख पर उनके साथ अदालत जाते और उन्हें आगे लड़ने का हौसला देते रहे। सतबीर ने बताया कि जब उनकी पत्नी को नाैकरी नहीं मिली तो वह 40 साल पहले ही रोजगार की तलाश में पानीपत आ गए और किशनपुरा गांव में रहने लगे।
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करनाल के कोहंड गुढ़ा गांव से शुरु हुआ यह संघर्ष पानीपत के किशनपुरा में विराम हुआ। वर्तमान में किशनपुरा निवासी सुमित्रा देवी ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1988 में इंडियन ऑयल के बॉटलिंग प्लांट घराैंडा तहसील के गुढ़ा गांव में नौकरी के लिए आवेदन किया था लेकिन नियुक्ति नहीं मिली। इस नाैकरी के लिए जिला प्रशासन की स्थानीय रोजगार कमेटी की ओर से 50 लोगों की अनुशंसा की गई थी। सुमित्रा का नाम भी इन्हीं में से 49 नंबर पर था, सुमित्रा का कहना है कि उन्हें यह कहकर नाैकरी नहीं दी गई कि वह एक महिला हैं, यहां भारी सिलिंडर उठाने का कार्य होता है जिसे वह नहीं कर पाएंगी।
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ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक नहीं मानी हार
नौकरी ने मिलने के बाद सुमित्रा ने न्याय के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्याय के लिए शुरू हुई यह लड़ाई ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। ट्रायल कोर्ट ने 22 सितंबर 1990 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे इंडियन ऑयल ने चुनौती दी। छह अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। इसके बाद सुमित्रा ने हार नहीं मानी और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 14 अक्तूबर 2025 को न्यायमूर्ति विकास बहल की अदालत ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
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पति सतबीर मजबूती से खड़े रहे साथ
करीब चार दशक के इस पूरे संघर्ष में सुमित्रा के साथ उनके पति सतबीर मजबूती से खड़े रहे। वह हर तारीख पर उनके साथ अदालत जाते और उन्हें आगे लड़ने का हौसला देते रहे। सतबीर ने बताया कि जब उनकी पत्नी को नाैकरी नहीं मिली तो वह 40 साल पहले ही रोजगार की तलाश में पानीपत आ गए और किशनपुरा गांव में रहने लगे।