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Karnal News: दुश्मन को चकमा देने के लिए तालाब में लट्ठ गाड़कर टांग देते थे लालटेन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 07 May 2025 02:28 AM IST
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To deceive the enemy, they used to hang lanterns by digging a stick in the pond
- वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के ब्लैक आउट को याद कर सिहर जाते हैं बुजुर्ग
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देव शर्मा
करनाल। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध का वह मंजर जब सायरन बजते ही पूरा शहर अंधेरे में डूब जाता था। घरों की खिड़कियों को मोटे कपड़ों और काले कागज से ढक दिया जाता था। हर कोई छत पर चढ़कर देखता था कि कहीं शहर में रोशनी तो नहीं हो रही है। ये खौफ था कि दुश्मन देश के उन हवाई जहाजों, जो रोशनी देखते ही बम गिरा देते थे, को धोखा देने के लिए दूर तालाबों के किनारे बड़ा लट्ठ गाड़ कर उसमें लालटेन टांग देते थे, ताकि यदि दुश्मन बम गिराए, तो जानमाल की हानि न हो। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की आजादी के लिए लड़ी गई इस लड़ाई में जीत तो भारत को ही मिली, लेकिन आज भी उस ब्लैक आउट को याद कर बुजुर्ग सिहर जाते हैं।



सायरन बजते ही छा जाता था अंधेरा
बात वर्ष 1971 की है, उस समय हमारे देश के पास भी संसाधन काफी कम थे, भारत-पाक युद्ध के दौरान रात्रि में भी दुश्मन देश के विमानों से बम गिराए जाते थे, जिससे बड़ा नुकसान होता था, तभी ब्लैक आउट रखने की बात भारत सरकार ने की थी। जिसमें शहरी क्षेत्रों में सायरन बजते ही पूरा शहर अंधेरे में डूब जाता था।
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- चरण सिंह मलिक, दयानंद कॉलोनी।

छत पर चढ़कर देखते थे, कहीं रोशनी तो नहीं
हर शहर में एक चौकीदार या अन्य व्यक्ति की ड्यूटी रहती थी, जिससे संकेत मिलता था, तो वह तत्काल सायरन बजा देता था, जिससे हर व्यक्ति सतर्क हो जाता था। उस समय घरों में लालटेन, दीया या बल्ब बुझा दिए जाते थे। लोग छत पर चढ़कर देखते थे कि कहीं किसी के घर में रोशनी तो नहीं हो रही है।
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- जीत सिंह संधू, जरनैली कॉलोनी

अब कोई सीमा में घुसने की नहीं कर सकता हिम्मत
उस समय देश के हर व्यक्ति में देश भक्ति कूट-कूटकर भरी थी, वह इसी फिराक में रहते थे कि कैसे अपने देश को बचाएं। कोई बैर किसी से नहीं था। भले ही व्यक्तिगत नाराजगी हो, लेकिन उसे खतरे से आगाह जरूर किया जाता था। आज तो हमारा देश साधन संपन्न है, अब कोई ऐसे देश की सीमा में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता। 1971 के बाद से ब्लैक आउट नहीं होता।
- प्रो.जोगिंद्र मदान, अल्फा इंटरनेशनल सिटी

गांवों में रात को लगता था ठीकरी पहरा
युद्ध के दौरान गांवों में हर घर से एक व्यक्ति जाता था, पंचायत ड्यूटी लगाती थी। समूह के रूप में लोग रात को ठीकरी पहरा देते थे। बाहरी व्यक्ति को भी गांव में बिना जांच पड़ताल के नहीं घुसने दिया जाता था। जैसे ही सूचना मिलती थी कि दुश्मन के विमान आने वाले हैं, वैसे ही अंधेरी गलियों में जाकर गांव के लोगों को सतर्क कर दिया जाता था।

- धर्मपाल नरवाल, सेक्टर-13 करनाल


विद्युतीकरण का शुभारंभ करने आईं थी इंदिरा गांधी

उस समय तक बिजली तो पहुंच चुकी थी, वर्ष 1970 में करनाल का ऊंचानी विद्युतीकरण की दृष्टि से हरियाणा का अंतिम गांव था, जिसमें बिजली पहुंचने का शुभारंभ करने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पहुंचीं थी। लेकिन लोग करंट लगने से डरते थे, इसलिए कनेक्शन ही नहीं लेते थे। इसके बाद युद्ध में ब्लैक आउट होने लगा तो प्रक्रिया और धीमी हो गई।
- सूरजमल सिंघड़, सेक्टर-8 करनाल
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