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Karnal News: आधुनिकता में पीछे छूटा रंगमंच, संसाधन न युवाओं में चाह
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अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस
- सरकारी सहायता के अभाव में रंगमंच से जुड़े कलाकार आर्थिक संकट से जूझ रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। रंगमंच कभी समाज को जागरूक करने और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम हुआ करता था पर आज यह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। आधुनिक दौर में डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण रंगमंच के समक्ष कई तरह की चुनौतियां आ चुकी हैं। दूसरी ओर, सरकारी सहायता के अभाव में रंगमंच से जुड़े कलाकारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
महाकवि कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम से लेकर मौजूदा दौर तक आते-आते रंगमंच जैसी प्राचीन संस्कृति और कला विलुप्त होती दिख रही है। आज के युवाओं का रुझान इसमें बेहद कम देखने का मिलता है, यही कारण है कि नाटक मंचन की कला अब समाप्त होती दिख रही है। अब बच्चों से लेकर युवाओं, बुजुर्गों तक के हाथों में मोबाइल फोन हैं, इंटरनेट सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के जरिये वेब सीरिज, नाटक आदि देखने को मिल जाता है। दूसरी तरफ युवा रील्स के द्वारा ही अपनी कला को दिखाना अधिक पसंद कर रहा है। यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान की ओर से 27 मार्च को हर साल अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाने की शुरुआत 1961 में गई।
निफा थियेटर को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत
निफा के संस्थापक प्रीतपाल सिंह पन्नू ने कहा कि उनकी संस्था निफा की ओर से ऐतिहासिक, सामाजिक और अन्य पहलुओं पर लोगों को जागरूक करने के लिए रंगमंच की सहायता से थिएटर किए जाते हैं, जिनमें नाटक मंचन, लाइट एंड साउंड ड्रामा, वर्बल ड्रामा और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से संदेश देने का काम किया जाता है। निफा पूरे देश में थिएटर को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है। इसमें लगभग 35 से 40 ऐसे कलाकार हैं जो जिले से निकल कर राष्ट्रीय स्तर तक प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। रंगमंच से अनुपम खेर और नसीरूद्दीन शाह जैसे महान अभिनेता निकलकर आज अच्छे मुकाम पर हैं। उनका कहना है कि थिएटर के समक्ष आधुनिक दौर में कई बड़ी चुनौतियां हैं। आज थिएटर की ऐसी स्थिति है कि कई रंगमंच कर्मी थिएटर को छोड़ रहे हैं।
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समाज में थिएटर का रुझान घटा
सार्थक सांस्कृतिक संघ से संजीव लखनपाल कहते हैं कि जिले में पहले के मुकाबले थिएटर की स्थिति सही नहीं है। आज के युवा थिएटर में मास्टर तो कर रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य नहीं कर रहे हैं। आज समाज में थिएटर का रुझान बहुत कम हो गया है। खासकर युवाओं का झुकाव इस ओर नहीं है, जिससे यह कला शहर में विकसित नहीं हो पा रही है। उन्होंने बताया कि अब तक उन्होंने 105 नाटक पूरे देश में और लगभग 1000 तक शो किए हैं। जिले में ऐसे कई कलाकार हैं जो रंगमंच थिएटर के माध्यम से बॉलीवुड तक पहुंचे हैं। उनकी संस्था के ऐसे युवा जो नाटक कला में आगे जाना चाहते हैं उन्हें निशुल्क थिएटर में लिया जाता है और आगे बढ़ाने के लिए नाटक मंचन आदि के गुर सिखा कर उन्हें अच्छा अभिनेता या अभिनेत्री और निदेशक आदि के काबिल बनाया जाता है। आज के समय में युवाओं का रुझान थिएटर में अब नहीं देखने को मिलता है क्योंकि आज की युवा पीढ़ी रील्स आदि बना रही है जो उन्हें संस्कारहीन बना रही है।
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- सरकारी सहायता के अभाव में रंगमंच से जुड़े कलाकार आर्थिक संकट से जूझ रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। रंगमंच कभी समाज को जागरूक करने और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम हुआ करता था पर आज यह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। आधुनिक दौर में डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण रंगमंच के समक्ष कई तरह की चुनौतियां आ चुकी हैं। दूसरी ओर, सरकारी सहायता के अभाव में रंगमंच से जुड़े कलाकारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
महाकवि कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम से लेकर मौजूदा दौर तक आते-आते रंगमंच जैसी प्राचीन संस्कृति और कला विलुप्त होती दिख रही है। आज के युवाओं का रुझान इसमें बेहद कम देखने का मिलता है, यही कारण है कि नाटक मंचन की कला अब समाप्त होती दिख रही है। अब बच्चों से लेकर युवाओं, बुजुर्गों तक के हाथों में मोबाइल फोन हैं, इंटरनेट सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के जरिये वेब सीरिज, नाटक आदि देखने को मिल जाता है। दूसरी तरफ युवा रील्स के द्वारा ही अपनी कला को दिखाना अधिक पसंद कर रहा है। यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान की ओर से 27 मार्च को हर साल अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाने की शुरुआत 1961 में गई।
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निफा थियेटर को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत
निफा के संस्थापक प्रीतपाल सिंह पन्नू ने कहा कि उनकी संस्था निफा की ओर से ऐतिहासिक, सामाजिक और अन्य पहलुओं पर लोगों को जागरूक करने के लिए रंगमंच की सहायता से थिएटर किए जाते हैं, जिनमें नाटक मंचन, लाइट एंड साउंड ड्रामा, वर्बल ड्रामा और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से संदेश देने का काम किया जाता है। निफा पूरे देश में थिएटर को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है। इसमें लगभग 35 से 40 ऐसे कलाकार हैं जो जिले से निकल कर राष्ट्रीय स्तर तक प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। रंगमंच से अनुपम खेर और नसीरूद्दीन शाह जैसे महान अभिनेता निकलकर आज अच्छे मुकाम पर हैं। उनका कहना है कि थिएटर के समक्ष आधुनिक दौर में कई बड़ी चुनौतियां हैं। आज थिएटर की ऐसी स्थिति है कि कई रंगमंच कर्मी थिएटर को छोड़ रहे हैं।
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समाज में थिएटर का रुझान घटा
सार्थक सांस्कृतिक संघ से संजीव लखनपाल कहते हैं कि जिले में पहले के मुकाबले थिएटर की स्थिति सही नहीं है। आज के युवा थिएटर में मास्टर तो कर रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य नहीं कर रहे हैं। आज समाज में थिएटर का रुझान बहुत कम हो गया है। खासकर युवाओं का झुकाव इस ओर नहीं है, जिससे यह कला शहर में विकसित नहीं हो पा रही है। उन्होंने बताया कि अब तक उन्होंने 105 नाटक पूरे देश में और लगभग 1000 तक शो किए हैं। जिले में ऐसे कई कलाकार हैं जो रंगमंच थिएटर के माध्यम से बॉलीवुड तक पहुंचे हैं। उनकी संस्था के ऐसे युवा जो नाटक कला में आगे जाना चाहते हैं उन्हें निशुल्क थिएटर में लिया जाता है और आगे बढ़ाने के लिए नाटक मंचन आदि के गुर सिखा कर उन्हें अच्छा अभिनेता या अभिनेत्री और निदेशक आदि के काबिल बनाया जाता है। आज के समय में युवाओं का रुझान थिएटर में अब नहीं देखने को मिलता है क्योंकि आज की युवा पीढ़ी रील्स आदि बना रही है जो उन्हें संस्कारहीन बना रही है।