पदक से चूकी मां को बेटे ने दुलारा
संगीता के दत्तक पुत्र डॉ. कृष्णा ने बताया कि प्रतियोगिता के लिए मां चार माह से कड़ा अभ्यास कर रही थीं। अचानक एक दिन हाथ में फैक्चर आ गया। इसके बावजूद वह जुटी रहीं। हम लोग आए दिन उनसे कहते थे- ‘मां अब रहने दो। आपकी उम्र हो गई है।’ तब वह कहती थीं- ‘‘जब तक मेरे अंदर ताकत है, मैं बेटे से पीछे नहीं रहना चाहती।’
संगीता डबास पेशे से शिक्षक हैं और शिक्षा विभाग करनाल में कार्यरत हैं। वह राष्ट्रीय स्तर की कब्बडी और शॉटपुट की खिलाड़ी रही हैं। उनकी दो बेटी व एक बेटा हैं वहीं पति वीरेंद्र सिंह नीलोखेंडी आईटीआई में प्लेसमेंट सेल में कार्यरत हैं। डॉ. कृष्णा ने बताया कि पहले वह शामगढ़ के सरकारी स्कूल में शारीरिक प्रशिक्षक के पद पर थीं। तब मैं वहां पढ़ाई करता था। पिता वैद्य हैं और हमारा बड़ा परिवार था। मजबूरी में मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तब संगीता मां ने मेरी मदद की और मुझे गोद ले दिया। वह पिछले चार साल से हर माह 1000 रुपये मेरे खाते में भेजती हैं। हालांकि अब मैं चंडीगढ़ पीजीआई में वैज्ञानिक के तौर पर कार्य कर रहा हूं लेकिन वह कहती हैं- जब तक मेरी सामर्थ्य है, पैसा भेजती रहूंगी।

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