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Karnal News: परिवार में बेटे की चाह कर रही मां को बीमार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 24 Dec 2025 01:49 AM IST
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The mother, who yearns for a son in the family, is sick.
मानसी मौर्य
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करनाल। समय और समाज के बदलने के दावे के विपरीत परिवार में बेटे की चाह महिलाओं के लिए तनाव का बड़ा कारण है। दबाव इतना है कि बेटी पैदा होने के बाद महिलाएं तनाव में मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाती हैं। जिला नागरिक अस्पताल के मनोरोग विभाग व सुकून केंद्र में हर सप्ताह पांच से छह महिलाएं प्रसवोत्तर तनाव से ग्रस्त होकर पहुंच रही हैं।
मनोचिकित्सक डाॅ. सौभाग्य सिंधु ने बताया कि महिलाएं तनाव से इस तरह से ग्रस्त हो जाती हैं कि वे नवजात को पूरी तरह से नजरअंदाज करने लगती हैं। परिवार का बेटे के लिए लगातार दबाव के अतिरिक्त भावनात्मक सपोर्ट न मिलना भी इसका प्रमुख कारण है। परिवार की बेटे की चाह पूरी न होने पर या प्रसव के बाद हर तरह से अकेला छोड़ दिए जाने पर प्रसवोत्तर तनाव की समस्या बढ़ती है।
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उन्होंने बताया कि महिलाओं को इस तनाव के बारे में पता ही नहीं होता। ओपीडी में हर सप्ताह पांच से छह महिलाएं ऐसी आ रही हैं जिनके परिवार स्वयं महिलाओं को काउंसिलिंग करवाने के लिए लेकर आते हैं। महिलाएं एक-एक साल तक प्रसवोत्तर तनाव से ग्रस्त रहती हैं। लेकिन उन्हें ही नहीं पता होता। तनाव में वह बच्चे को ही नजरअंदाज करने लगती हैं। तीन से चार बार काउंसिलिंग के बाद वे सामान्य स्थिति में आ पाती हैं। संवाद
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प्रसव के बाद दोषारोपण न हो
सुकून केंद्र की काउंसलर अर्चना ने बताया कि प्रसव के बाद महिलाओं में इस तनाव को सबसे ज्यादा देखा जाता है। तनाव घरेलू व पारिवारिक कलह को भी जन्म देता है। कई महिलाएं ऐसी आती है जिनके घरों में उन्हें समझने व सुनने वाला कोई नहीं होता। पति के बच्चे की जिम्मेदारी न लेने के कारण वह तनाव से घिरती चली जाती है। जरूरी है कि प्रसव के बाद महिलाओं को किसी प्रकार का दोष देने की जगह उन्हें मानसिक व भावनात्मक रूप से समझा जाए।


प्रमुख कारण
-कई बेटियों के बाद बेटा न होने के ताने।
-अकेले बच्चे और घर की जिम्मेदारी।
-परिवार व पति का भावनात्मक सहारा न होना।
-आराम करने का समय नहीं मिलना।
-सामाजिक व पारिवारिक दबाव होना।



-------प्रसवोत्तर अवसाद
डॉ. सौभाग्य के अनुसार, प्रसवोत्तर अवसाद प्रसव के बाद महिलाओं में होने वाली गंभीर मानसिक स्थिति होती है। इसमें महिला में हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी, शारीरिक थकान और भावनात्मक सहयोग न होने के कारण लगातार उदासी, तनाव, चिड़चिड़ापन और अकेलापन महसूस करने लगती हैं। इस स्थिति में महिलाएं स्वयं को ही दोषी समझने लगती हैं। बच्चे को भी भावनात्मक रूप से अपना नहीं पाती। महिला अपने बच्चे को भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति तक में आ जाती हैं। यदि इन लक्षणों को समय पर नहीं पहचाना जाए तो मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो सकता है।
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केस-1
बेटियां होने पर मिलते थे ताने, तनाव ने पहुंचाया अस्पताल
शामली से 33 वर्षीय महिला प्रसव के आठ माह बाद भी अपने बच्चे को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। बहन उनको काउंसिलिंग के लिए ओपीडी में लाईं। बातचीत में पता चला कि महिला की पहले से तीन बेटियां होती हैं। ताने मिलते थे। चौथी बेटी होने पर वह तनाव से ग्रस्त हो गईं। चार चरणों में महिला के साथ उनके पति की भी काउंसिलिंग की गई। भरोसा जगाया गया। गंभीर स्थिति के कारण महिला को अन्य मानसिक थेरेपी भी दी गईं। अब वह ठीक हैं।


केस-2
प्रसव के डेढ़ साल बाद महिला की करानी पड़ी काउंसिलिंग
29 वर्षीय महिला को परिवार मनोरोग ओपीडी में काउंसिलिंग कराने के लिए पहुंचा। महिला को प्रसव के डेढ़ साल बाद पता चलता है कि वह प्रसवोत्तर अवसाद से ग्रस्त है। वह प्रसव के बाद से हमेशा उदास रहने लगी थीं। परिवार के हर सदस्य पर गुस्सा करतीं। अपने बच्चे को खुद से दूर रखने लगी थीं। बातचीत में महिला ने बताया कि वह सारा दिन अकेले ही घर-परिवार को संभालती हैं। परिवार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती। परिवार को समझाया गया कि बच्चा संभालना अकेले महिला की जिम्मेदारी नहीं है। दो चरणों की काउंसिलिंग में महिला को सामान्य स्थिति में लाया जा सका।
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