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जैसा देखा-सुना, बता देना उत्तम सत्य नहीं : प्रज्ञांस सागर
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्री दिगंबर जैन मंदिर करनाल में सत्य धर्म की उपासना के लिए क्षुल्लक प्रज्ञांश सागर ने पंडित व कवि द्यानतराय का जिक्र करते हुए कहा कि उत्तम सत्य-वरत पालीजै, पर विश्वासघात नहिं कीजै। सांचे-झूठे मानुष देखो, आपन-पूत स्वपास न देखो।। क्षुल्लक ने बताया- जैसा देखा-सुना गया हो, वैसा का वैसा कह देना लोक में सत्य कहा जाता है। लेकिन यह उत्तम सत्य हो ऐसा आवश्यक नहीं है।
उन्होंने कहा कि स्व-पर-हित का ध्यान रखकर की जाने वाली मन, वचन, कार्य की क्रिया सत्य है। सत्य वचन हितकारी भी हों और मीठे भी होने चाहिए। जंगल में एक मुनि तपस्या कर रहे थे कि अचानक जोर-जोर से लोगों की आवाज आई पकड़ो भागने न पाए। इस कोलाहल से मुनि की आंख खुली तो देखा उनके सामने से एक गाय और बछड़ा भाग कर आगे निकल गया। मुनि को समझने में देर नहीं लगी कि इनको पकड़ने के लिए पीछे कसाई आ रहे हैं। वे तुरंत खड़े हो गए और इतनी ही देर में वे कसाई भी वहां पहुंच गए और मुनि से पूछने लगे कि यहां से कोई गाय और बछड़ा निकल कर गया है क्या? मुनि ने कहा जब से मैं खड़ा हूं तब से तो कोई गाय या बछड़ा यहां से नहीं निकला है।
सभी कसाई लौट गए और वहीं गाय और बछड़े को जंंगल में ढूंढने लग गए। इस प्रकार निर्दोष प्राणियों को जीवनदान मिल गया। इसे ही परम सत्य कहा जाता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति मुझ से आपकी चुगली करता हो और आप पीछे मुझ से पूछें कि वह व्यक्ति आपसे क्या कह रहा था, तो उस समय जो कुछ चुगली के शब्द उसने मुझसे कहे थे वे ज्यों के त्यों आपको बता देना यहां शांति मार्ग में सत्य नहीं असत्य है। अत: ध्यान रहे स्वपर-हितकारी, परिमित तथा मिष्टवचन ही सत्य है और इसके विपरीत असत्य होता है।
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करनाल। श्री दिगंबर जैन मंदिर करनाल में सत्य धर्म की उपासना के लिए क्षुल्लक प्रज्ञांश सागर ने पंडित व कवि द्यानतराय का जिक्र करते हुए कहा कि उत्तम सत्य-वरत पालीजै, पर विश्वासघात नहिं कीजै। सांचे-झूठे मानुष देखो, आपन-पूत स्वपास न देखो।। क्षुल्लक ने बताया- जैसा देखा-सुना गया हो, वैसा का वैसा कह देना लोक में सत्य कहा जाता है। लेकिन यह उत्तम सत्य हो ऐसा आवश्यक नहीं है।
उन्होंने कहा कि स्व-पर-हित का ध्यान रखकर की जाने वाली मन, वचन, कार्य की क्रिया सत्य है। सत्य वचन हितकारी भी हों और मीठे भी होने चाहिए। जंगल में एक मुनि तपस्या कर रहे थे कि अचानक जोर-जोर से लोगों की आवाज आई पकड़ो भागने न पाए। इस कोलाहल से मुनि की आंख खुली तो देखा उनके सामने से एक गाय और बछड़ा भाग कर आगे निकल गया। मुनि को समझने में देर नहीं लगी कि इनको पकड़ने के लिए पीछे कसाई आ रहे हैं। वे तुरंत खड़े हो गए और इतनी ही देर में वे कसाई भी वहां पहुंच गए और मुनि से पूछने लगे कि यहां से कोई गाय और बछड़ा निकल कर गया है क्या? मुनि ने कहा जब से मैं खड़ा हूं तब से तो कोई गाय या बछड़ा यहां से नहीं निकला है।
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सभी कसाई लौट गए और वहीं गाय और बछड़े को जंंगल में ढूंढने लग गए। इस प्रकार निर्दोष प्राणियों को जीवनदान मिल गया। इसे ही परम सत्य कहा जाता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति मुझ से आपकी चुगली करता हो और आप पीछे मुझ से पूछें कि वह व्यक्ति आपसे क्या कह रहा था, तो उस समय जो कुछ चुगली के शब्द उसने मुझसे कहे थे वे ज्यों के त्यों आपको बता देना यहां शांति मार्ग में सत्य नहीं असत्य है। अत: ध्यान रहे स्वपर-हितकारी, परिमित तथा मिष्टवचन ही सत्य है और इसके विपरीत असत्य होता है।
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