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नाटक से सुषमा सेठ देश को देंगी कल्पना चावला के सपनों का संदेश
करनाल
Updated Sat, 26 Oct 2013 10:11 PM IST
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फिल्मी दुनिया में नाम कमा चुकी रंगमंच की जानीमानी हस्ती सुषमा सेठ के प्रयास सच में सकारात्मक सोच के साथ समाज और देश के रचनात्मक विकास की दिशा में दृढ़ दिखाई पड़ रहे हैं। उनके दिल में देशहित में अंतरिक्ष परी डॉ. कल्पना चावला के अधूरे सपनों को रंगमंच के जरिए पूरा करने की तड़प है।
इस काम को पूरा करने के लिए सुषमा सेठ को उम्र का फिक्र नहीं है। सुषमा सेठ ने शनिवार को विशेष बातचीत में बताया कि रंगमंच के जरिए ही उन्होंने अंतरिक्ष परी डॉ. कल्पना चावला को अच्छी तरह से समझा। इन दिनों उन पर कल्पना चावला के सपनों को पूरा करने का पूरा जुनून है।
इसके लिए वे अपने 40 बाल कलाकारों से रविवार को कल्पना चावला की जन्मस्थली करनाल में सितारों के साथ कल्पना चावला रोल प्ले करवाकर देश के लोगों को महत्वपूर्ण संदेश देंगी। देश की सरहदों के बंटवारे से पूर्व भले ही वह बालिका थी लेकिन बचपन से ही उनमें रंगमंच का शौक रहा है।
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स्कूल से कॉलेज तक में उन्होंने नाटकों में हिस्सा लिया। नाटकों के जरिए समाज के लोगों को नई सोच देने और अमूल चूल परिवर्तन लाने की दिशा में संदेश देने की भूमिका अदा करना प्रारंभ किया। वर्ष 1958 में अमेरिका के कॉरनेगीमेलन विश्वविद्यालय के ब्रॉयरक्लिफ कॉलेज में रंगमंच के बल पर जहां ऑल राउंड एक्सीलेंस अवार्ड हासिल कर भारत का नाम रोशन किया, वहीं, अमेरिका में ही स्टूडेंट कौंसिल की अध्यक्ष रहकर प्रतिभा का लोहा मनवाया।
भारत लौटने के बाद वे रंगमंच में पूरी तरह रम गई। फिल्मों का जिक्र करें तो उन्होंने ‘जुनून’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘सिलसिला’, ‘1942-ए लव स्टोरी’, ‘नगीना’ और ‘वारिस’ समेत सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के स्लम क्षेत्र के 40 बाल कलाकारों के जरिए रंगमंच के माध्यम से देश के लोगों को प्रेरित करने के लिए काम किया।
नाटक में कल्पना चावला के टैगोर बाल निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल से लेकर करनाल की गलियों में खेलना कूदना चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी और अंतरिक्ष में जाने तक का पूरा हाल होगा। सेठ ने कहा कि विश्व उसका कुटुंब है। देशों को आपस में युद्ध नहीं करने चाहिए। पृथ्वी को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। धरती पर पर्यावरण को बचाकर रखना चाहिए। कल्पना चावला जीव जंतुओं के संरक्षण के प्रति सचेत थी। वे साइंस एंड टेक्नोलॉजी में भी विश्व को ऊंचे स्तर पर ले जाना चाहती थी।
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इस काम को पूरा करने के लिए सुषमा सेठ को उम्र का फिक्र नहीं है। सुषमा सेठ ने शनिवार को विशेष बातचीत में बताया कि रंगमंच के जरिए ही उन्होंने अंतरिक्ष परी डॉ. कल्पना चावला को अच्छी तरह से समझा। इन दिनों उन पर कल्पना चावला के सपनों को पूरा करने का पूरा जुनून है।
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इसके लिए वे अपने 40 बाल कलाकारों से रविवार को कल्पना चावला की जन्मस्थली करनाल में सितारों के साथ कल्पना चावला रोल प्ले करवाकर देश के लोगों को महत्वपूर्ण संदेश देंगी। देश की सरहदों के बंटवारे से पूर्व भले ही वह बालिका थी लेकिन बचपन से ही उनमें रंगमंच का शौक रहा है।
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स्कूल से कॉलेज तक में उन्होंने नाटकों में हिस्सा लिया। नाटकों के जरिए समाज के लोगों को नई सोच देने और अमूल चूल परिवर्तन लाने की दिशा में संदेश देने की भूमिका अदा करना प्रारंभ किया। वर्ष 1958 में अमेरिका के कॉरनेगीमेलन विश्वविद्यालय के ब्रॉयरक्लिफ कॉलेज में रंगमंच के बल पर जहां ऑल राउंड एक्सीलेंस अवार्ड हासिल कर भारत का नाम रोशन किया, वहीं, अमेरिका में ही स्टूडेंट कौंसिल की अध्यक्ष रहकर प्रतिभा का लोहा मनवाया।
भारत लौटने के बाद वे रंगमंच में पूरी तरह रम गई। फिल्मों का जिक्र करें तो उन्होंने ‘जुनून’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘सिलसिला’, ‘1942-ए लव स्टोरी’, ‘नगीना’ और ‘वारिस’ समेत सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के स्लम क्षेत्र के 40 बाल कलाकारों के जरिए रंगमंच के माध्यम से देश के लोगों को प्रेरित करने के लिए काम किया।
नाटक में कल्पना चावला के टैगोर बाल निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल से लेकर करनाल की गलियों में खेलना कूदना चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी और अंतरिक्ष में जाने तक का पूरा हाल होगा। सेठ ने कहा कि विश्व उसका कुटुंब है। देशों को आपस में युद्ध नहीं करने चाहिए। पृथ्वी को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। धरती पर पर्यावरण को बचाकर रखना चाहिए। कल्पना चावला जीव जंतुओं के संरक्षण के प्रति सचेत थी। वे साइंस एंड टेक्नोलॉजी में भी विश्व को ऊंचे स्तर पर ले जाना चाहती थी।