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Karnal News: समुद्री जिप्सम का विकल्प तलाशेंगे वैज्ञानिक
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करनाल। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में ‘लवणता ग्रस्त मृदाओं का प्रबंधन एवं खारे जल का कृषि में उपयोग‘ विषय पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की दो दिवसीय 28वीं द्विवार्षिक कार्यशाला में 45 शोध परियोजनाओं की प्रगति रिपोर्ट पर मंथन किया गया है। जिसमें 27 नई परियोजमाओं पर भी संज्ञान लिया गया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए वैज्ञानिकों ने 2021-22 की तकनीकी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। वैज्ञानिकों द्वारा खराब भूमिगत जल का मानचित्र तैयार किया गया। मुख्य अतिथि रहे आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि समुद्री जिप्सम का विकल्प ढूंढ़ने के लिए काम किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में लवणग्रस्त भूमि के सुधार में गति प्रदान की जा सके।
कार्यशाला के अंतिम दिन मुख्य अतिथि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी रहे जो ऑनलाइन जुड़े। उन्होंने कहा कि ये कार्यशाला पूरे देश में लवणता अनुसंधान, लवणग्रस्त भूमि और खारे जल के कृषि में उपयोग के विभिन्न पहलुओं पर भविष्य की रणनीति निर्धारित करने में लाभदायक सिद्ध होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि बदलते पर्यावरण का भूमिगत जल की गुणवत्ता और मृदा लवणता पर होने वाले प्रभाव तथा उससे निपटने की भविष्य की रणनीति पर कार्य करने की आवश्यकता है।
इससे पूर्व दिनभर परियोजना के वैज्ञानिकों का तकनीक सत्र चला। देशभर के सभी दस अनुसंधान केंद्रों की शोध रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। सीएसएसआरआई के वैज्ञानिकों ने भी रिपोर्ट प्रस्तुत की। सभी शोध पर एक टेबल पर मंथन हुआ। इसी दौरान देशभर के खराब पानी पर गहन शोध अध्ययन के बाद तैयार मानचित्र प्रस्तुत किया गया। जिसे सहमति मिली। इसी मानचित्र के आधार पर किस मृदा में कौन सी फसलें, कौन सी किस्में लगाकर पैदावार ली जा सकती है, जिसकी गाइड लाइन जारी की जाएगी।
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सीएसएसआरआई के निदेशक डॉ. आरके यादव ने मुख्य अतिथि स्वागत करते हुए कहा कि इस कार्यशाला में 45 शोध प्रोजेक्ट के प्रगति रिपोर्ट पर चर्चा की गई तथा 27 नए प्रोजेक्ट के बारे में भी संज्ञान लिया गया। उन्होंने परियोजना के वैज्ञानिकों द्वारा खराब भूमिगत जल के मानचित्रीकरण पर खुशी जाहिर की तथा यह कहा कि यह उपलब्धि परियोजना में कार्यरत वैज्ञानिकों के वर्षों की मेहनत का प्रतिफल है। इससे पूर्व परियोजना के पूर्व समंवयक डॉ. एसके गुप्ता ने कहा कि कैनाल कमांड क्षेत्र में उथले ट्यूबवेल लगाकर जल भराव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। साथ ही बोरवेल तकनीक तथा वर्टिकल ड्रेनेज तकनीक के ऊपर भी और अधिक गहन शोध की आवश्यकता है ताकि उनकी उपयोगिता के ऊपर विचार किया जा सके।
इस मौके पर परियोजना में कार्यरत पांच सेवानिवृत होने वाले वैज्ञानिकों डॉ. आरबी सिंह, डॉ. एसके चौहान, डॉ. विश्वनाथ जॉकिन्स, डॉ. केएस बांगड़ व डॉ. केपी वैद्य को सम्मानित किया गया। संचालन परियोजना के प्रभारी डॉ. रामेश्वर लाल मीणा और प्रधान वैज्ञानिक डॉ राकेश वनियाल ने किया। इस अवसर पर संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार, डॉ. सत्येंद्र कुमार, डॉ. कैलाश प्रजापत आदि भी मौजूद रहे।
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कार्यशाला के अंतिम दिन मुख्य अतिथि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी रहे जो ऑनलाइन जुड़े। उन्होंने कहा कि ये कार्यशाला पूरे देश में लवणता अनुसंधान, लवणग्रस्त भूमि और खारे जल के कृषि में उपयोग के विभिन्न पहलुओं पर भविष्य की रणनीति निर्धारित करने में लाभदायक सिद्ध होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि बदलते पर्यावरण का भूमिगत जल की गुणवत्ता और मृदा लवणता पर होने वाले प्रभाव तथा उससे निपटने की भविष्य की रणनीति पर कार्य करने की आवश्यकता है।
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इससे पूर्व दिनभर परियोजना के वैज्ञानिकों का तकनीक सत्र चला। देशभर के सभी दस अनुसंधान केंद्रों की शोध रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। सीएसएसआरआई के वैज्ञानिकों ने भी रिपोर्ट प्रस्तुत की। सभी शोध पर एक टेबल पर मंथन हुआ। इसी दौरान देशभर के खराब पानी पर गहन शोध अध्ययन के बाद तैयार मानचित्र प्रस्तुत किया गया। जिसे सहमति मिली। इसी मानचित्र के आधार पर किस मृदा में कौन सी फसलें, कौन सी किस्में लगाकर पैदावार ली जा सकती है, जिसकी गाइड लाइन जारी की जाएगी।
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सीएसएसआरआई के निदेशक डॉ. आरके यादव ने मुख्य अतिथि स्वागत करते हुए कहा कि इस कार्यशाला में 45 शोध प्रोजेक्ट के प्रगति रिपोर्ट पर चर्चा की गई तथा 27 नए प्रोजेक्ट के बारे में भी संज्ञान लिया गया। उन्होंने परियोजना के वैज्ञानिकों द्वारा खराब भूमिगत जल के मानचित्रीकरण पर खुशी जाहिर की तथा यह कहा कि यह उपलब्धि परियोजना में कार्यरत वैज्ञानिकों के वर्षों की मेहनत का प्रतिफल है। इससे पूर्व परियोजना के पूर्व समंवयक डॉ. एसके गुप्ता ने कहा कि कैनाल कमांड क्षेत्र में उथले ट्यूबवेल लगाकर जल भराव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। साथ ही बोरवेल तकनीक तथा वर्टिकल ड्रेनेज तकनीक के ऊपर भी और अधिक गहन शोध की आवश्यकता है ताकि उनकी उपयोगिता के ऊपर विचार किया जा सके।
इस मौके पर परियोजना में कार्यरत पांच सेवानिवृत होने वाले वैज्ञानिकों डॉ. आरबी सिंह, डॉ. एसके चौहान, डॉ. विश्वनाथ जॉकिन्स, डॉ. केएस बांगड़ व डॉ. केपी वैद्य को सम्मानित किया गया। संचालन परियोजना के प्रभारी डॉ. रामेश्वर लाल मीणा और प्रधान वैज्ञानिक डॉ राकेश वनियाल ने किया। इस अवसर पर संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार, डॉ. सत्येंद्र कुमार, डॉ. कैलाश प्रजापत आदि भी मौजूद रहे।