{"_id":"6510a6317ade799d78034684","slug":"revisedpeople-will-wipe-out-congress-in-elections-2024-biplab-dev-karnal-news-c-18-knl1008-226027-2023-09-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"मन कभी नहीं भरता इसे उत्तम दिशा दें : क्षुल्लक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मन कभी नहीं भरता इसे उत्तम दिशा दें : क्षुल्लक
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। दस लक्षण धर्म श्रृंखला में क्षुल्लक प्रज्ञांश सागर महाराज के मार्गदर्शन में जीवन में उत्तम संयम धर्म को अपनाने की भावना से भक्तों से भरे श्री दिगंबर जैन मंदिर परिसर में अभिषेक शांतिधारा के बाद पूजन किया गया। क्षुल्लक ने बताया कि संयम, धर्म के पालन के लिए कान, मन आदि सब वश में करो।
मन की चंचला के संबंध उन्होंने कहा कि मन से (वश में रखकर) नर नारायण बनता है और मन (बेलगाम होने पर) से ही नारकी (नर्कवाशी) भी बनता है। मन के संयम की तुलना ट्रैफिक लाइट से की गई है। ट्रैफिक लाइट की लालबत्ती हमें रुकने को विवश करती है यदि हम न रुकें तो दुष्परिणाम, दुर्घटना के रूप में अथवा दंड भुगतने पड़ते हैं। यही बात मन की भी है। व्यवहार में देखते हैं, स्वादिष्ट मनपसंद खाना खाने से पेट तो भर जाता है, लेकिन मन कभी नहीं भरता बस इसी पर अंकुश लगाना या इसी को उत्तम दिशा देना ही संयम का पालन है। क्षुल्लक ने बताया संयम दो प्रकार का होता है। पूर्ण संयम को यम और किंचित संयम को नियम कहते हैं। महीनों उपवास के पश्चात भी आकुल-व्याकुल न होना यह इंद्रिय विजय (संयम ) की पराकाष्ठा है।
विज्ञापन
करनाल। दस लक्षण धर्म श्रृंखला में क्षुल्लक प्रज्ञांश सागर महाराज के मार्गदर्शन में जीवन में उत्तम संयम धर्म को अपनाने की भावना से भक्तों से भरे श्री दिगंबर जैन मंदिर परिसर में अभिषेक शांतिधारा के बाद पूजन किया गया। क्षुल्लक ने बताया कि संयम, धर्म के पालन के लिए कान, मन आदि सब वश में करो।
मन की चंचला के संबंध उन्होंने कहा कि मन से (वश में रखकर) नर नारायण बनता है और मन (बेलगाम होने पर) से ही नारकी (नर्कवाशी) भी बनता है। मन के संयम की तुलना ट्रैफिक लाइट से की गई है। ट्रैफिक लाइट की लालबत्ती हमें रुकने को विवश करती है यदि हम न रुकें तो दुष्परिणाम, दुर्घटना के रूप में अथवा दंड भुगतने पड़ते हैं। यही बात मन की भी है। व्यवहार में देखते हैं, स्वादिष्ट मनपसंद खाना खाने से पेट तो भर जाता है, लेकिन मन कभी नहीं भरता बस इसी पर अंकुश लगाना या इसी को उत्तम दिशा देना ही संयम का पालन है। क्षुल्लक ने बताया संयम दो प्रकार का होता है। पूर्ण संयम को यम और किंचित संयम को नियम कहते हैं। महीनों उपवास के पश्चात भी आकुल-व्याकुल न होना यह इंद्रिय विजय (संयम ) की पराकाष्ठा है।
विज्ञापन