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Karnal News: राखियों ने दिया रोजगार, संवर रहा घर-संसार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2026 02:16 AM IST
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Rakhis have provided employment, transforming lives and livelihoods.
राखी बनातीं महिलाएं
करनाल। स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के रक्षाबंधन के मायने परंपरा से अलग भी हैं। राखियों का मतलब उनके लिए भाई के प्यार के साथ ही रोजगार भी है। रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक आने के साथ हाथ से राखियां बनाने वाली महिलाओं का काम बढ़ जाता है। उनकी बनाई सुंदर राखियां भाई की कलाई पर तो सजती हैं ही इनको बनाने के एवज में महिलाओं को मिलने वाला मेहनताना उनके घर-संसार को संवारता है।
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रक्षाबंधन के त्योहार के लिए बाजारों में राखियों की खरीदारी शुरू हो गई है। ग्रामीण क्षेत्र की स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं इस बार राखियों के कारोबार से अपनी पहचान बना रही हैं। वे हाथ से तैयार राखियों की विशेष दुकानें लगाकर रोजगार कर रही हैं। महिलाओं का कहना है कि इससे उन्हें घर के कामकाज के साथ रोजगार का अवसर मिल रहा है।
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रेशमा पिछले छह साल से हस्तनिर्मित उत्पाद बना रही हैं। उन्होंने इस बार कान्हा थीम पर बच्चों के लिए और पारंपरिक तरीके से युवाओं के लिए राखियां बनाई हैं। इन राखियों का दाम पांच रुपये से लेकर 100 रुपये तक रखा गया है। समूह की महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
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20 हजार रुपये तक आमदनी
समूह सदस्य मोनिका ने बताया कि वे ग्रामीण और शहरी स्तर पर स्टॉल लगाकर राखियां बेचती हैं। त्योहारों पर उन्हें 15 से 20 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है। वे कई दिनों से रंग-बिरंगे धागों, मोती, कुंदन और रेशमी सामग्री से राखियां बना रही हैं। बच्चों, युवाओं और बड़ों की पसंद के अनुसार अलग-अलग डिजाइन तैयार किए जा रहे हैं।

विशेष ऑर्डर पर करती हैं काम
चिड़ाव गांव की सदस्य रीना देवी हर साल हस्तनिर्मित राखियां बनाती हैं। वह विशेष ऑर्डर पर क्रोशिया, ऊनी और रेशम के धागों से आधुनिक डिजाइन की राखियां तैयार करती हैं। इन्हें ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है। त्योहार के समय पर इन राखियों के एवज में मिलने वाला पैसा घर में खुशियां ले आता है।
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