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धान छोड़ सोयाबीन लगाएं, बंपर उत्पादन से किसान होंगे मालामाल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 29 May 2021 02:30 AM IST
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produce Soyabeen instead of rice
भूजल संकट के इस दौर में किसान यदि धान की खेती छोड़ सोयाबीन की फसल लगाएं तो बंपर फसल से वे न केवल मालामाल होंगे, बल्कि लगातार गिर रहे भूजल को बचाने में मददगार भी बनेंगे। सोयाबीन की फसल के संदर्भ में पिछले दो साल में जो नई रिसर्च सामने आई है। उसके तहत यदि प्रदेश में सोयाबीन की खेती की जाती है तो वे किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी और इससे लगातार गिरते भूजल को भी बचाया जा सकेगा। इसके लिए हरियाणा का क्लाइमेट और मिट्टी सबसे अधिक सहायक होंगे।
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रिसर्च में यह बात सामने आई है कि हरियाणा का क्लाइमेट सोयाबीन के बंपर उत्पादन के लिए खासा उपयुक्त है। इस क्लाइमेट में यदि कृषि विज्ञानियों की निगरानी में सोयाबीन की खेती की जाए तो किसान इस फसल उत्पादन के लिए अग्रणी राज्यों से भी दोगुना उत्पादन कर सकते हैं। साथ ही इसमें पानी भी बहुत कम लगेगा। बताते चलें कि सोयाबीन उत्पादन में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व कर्नाटक राज्य अग्रणी हैं। मगर हरियाणा व पंजाब में इन राज्यों की तुलना में सोयाबीन का अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। अनुसंधान के तहत किए गए ट्रायल में यह परिणाम सामने आया है।
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केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान व अंतरराष्ट्रीय गेहूं एवं मक्का सुधार केंद्र मैक्सिको के क्लाइमेट चेंज एग्रीकल्चर एंड फूड सिक्योरिटी परियोजना (सिमिट) के संयुक्त तत्वावधान में करनाल जिले में दो साल तक सोयाबीन की फसल का ट्रायल किया गया। तरावड़ी के प्रगतिशील किसान मनोज कुमार, नड़ाना गांव के जितेंद्र सिंह राणा व सांभली गांव के ईश्वर सिंह के खेतों में सोयाबीन फसल के यह ट्रायल किए गए। ट्रायल में औसत उत्पादन 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त हुआ, जोकि अन्य राज्यों की औसतन उत्पादकता से डेढ़ से दो गुना अधिक है। धान की तुलना में 70 से 80 प्रतिशत कम पानी लगा।
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सीएसएसआरआई के निदेशक डा. पीसी शर्मा व सिमिट के प्रधान वैज्ञानिक एमएल जाट ने कहा कि मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व कर्नाटक में सोयाबीन की बारिश आधारित खेती होती है। जिस कारण उपज कम है। हरियाणा पंजाब में सिंचाई के अच्छे स्रोत हैं, इसलिए उत्पादन अच्छा रहता है। इस फसल के लिए हरियाणा में केवल दो से तीन बार सिंचाई पर्याप्त हैं।
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बुआई समय व किस्मों का चयन
जून के पहले सप्ताह से अंतिम सप्ताह तक बिजाई करें। पानी ठहराव वाले खेतों में बेड बनाकर बिजाई करें। बीज की मात्रा 25 से 30 किलोग्राम प्रति एकड़ हो। बीजों की गहराई 2.5 से 5 सेंटीमीटर, लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी चार से पांच सेंटीमीटर रखें। बेड प्लांटर मशीन का प्रयोग करें। एसएल-958, एसल-744, एसएल-525, आरवीएस-202-4 व एमएसीएस-1407 किस्मों को लगाया जा सकता है।

--- डा. एसके ककरालिया, अनुसंधान वैज्ञानिक, सिमिट।
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उर्वरक एवं खरपतवार नियंत्रण के उपाय
प्रति एकड़ एक बैग डीएपी बुआई के समय डालें। खरपतवार की रोकथाम के लिए 600 एमएल स्टोंप 30 ईसी (पेंडामेथलीन) का स्प्रे बुआई के दो दिन के भीतर करें। दूसरा स्प्रे बुआई के 20 से 25 दिन बाद 300 से 400 ग्राम परसूट/वीडब्लॉक/परिमेज 10 एमएल (इमेजाथाइपर) का स्प्रे 140 से 200 लीटर पानी में मिलाकर करें।
---डा. एचएस जाट, प्रधान वैज्ञानिक, सीएसएसआरआई।
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