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कभी उड़ाती थी कागज के जहाज, आज भरी थी अंतरिक्ष की उड़ान
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देव शर्मा
करनाल। 24 साल पहले यानी 19 नवंबर-1997 का दिन था। जब कभी कर्णनगरी की गलियों में कागज के हवाई जहाज बनाकर आसमान में उड़ाने वाली करनाल की बेटी कल्पना चावला ने नासा के एक मिशन विशेषज्ञ व प्राथमिक रोबोटिक आर्म ऑपरेटर के रूप में स्पेस शटल कोलंबिया से अंतरिक्ष में अपनी पहली उड़ान भरी थी। यह दिन करनाल के वाशिंदे कभी नहीं भूलते, क्योंकि इस दिन करनाल ही नहीं बल्कि देशभर की निगाहें टेलीविजन स्क्रीन पर टिकी थी। जब सफलता के साथ कल्पना अंतरिक्ष के अकल्पनीय संसार की ओर रवाना हुई तो हर भारतीय गौरवान्वित था।
यह उसका पहला स्पेस मिशन था। कल्पना चावला को पहली बार अंतरिक्ष में जाने का मौका मिला था। वह इसको लेकर काफी रोमांचित थी। वह छह अंतरिक्ष यात्रियों में से एक थी। वह इतिहास रचने जा रही थी। दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री होने का खिताब हमेशा के लिए उसके नाम लिखा जा रहा था। राकेश शर्मा के बाद वह दूसरी भारतीय अंतरिक्ष यात्री बन रही थी।
जब दाखिला लेने गई तो नहीं था कोई नाम
हरियाणा के करनाल शहर में कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हुआ था। अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी कल्पना का बचपन का नाम मोंटू था। उसने अपनी पढ़ाई करनाल के टैगोर बाल निकेतन में दाखिला लेकर शुरू कर दी थी। खास बात यह थी कि जब वह दाखिला लेने गई थी तब तक उसका कोई नाम नहीं था, जब हेड मास्टर ने तीन नाम उसके पिता को सुझाए तो मोंटू स्वयं बोल पड़ी कि उसका नाम कल्पना रखो। उसके पिता बीएल चावला ने बताया कि उसके शिक्षकों ने उन्हें घर आकर बताया कि कल्पना स्कूल में कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ाती रहती है। उसने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई पूरी की।
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करीब 372 घंटे अंतरिक्ष में बिताए
अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह 1982 में अमेरिका चली गईं। टैक्सस यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एम टेक किया। फिर यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। 1988 में कल्पना ने नासा के रिसर्च सेंटर में नियुक्ति पा ली। 1995 में वह नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं फिर उसका नाम छह अंतरिक्ष यात्रियों की सूची में शामिल हो गया। इसके बाद आठ महीने के कड़े प्रशिक्षण के बाद आखिरकार वह दिन भी आ गया। जब उसने अंतरिक्ष में पहली छलांग लगाई। वह तब 35 साल की थी, जब उसने एसटीएस-87 से पहली उड़ान भरी। इस मिशन के दौरान कल्पना ने 1.04 करोड़ मील सफर तय करते हुए करीब 372 घंटे अंतरिक्ष में बिताए थे।
एक फरवरी को रोया देश
पहली भारतीय अंतरिक्ष यात्री और करनाल की लाडली कल्पना की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा अंतिम यात्रा साबित हुई। पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय दुर्घटना हो गई। एक फरवरी 2003 को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही सब कुछ बिखर गया। पूरी तरह सफल रहा अभियान अंतिम क्षणों में बिखर गया। करनाल ही नहीं बल्कि देश के बच्चे-बच्चे की आंखें नम हो गईं।
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करनाल। 24 साल पहले यानी 19 नवंबर-1997 का दिन था। जब कभी कर्णनगरी की गलियों में कागज के हवाई जहाज बनाकर आसमान में उड़ाने वाली करनाल की बेटी कल्पना चावला ने नासा के एक मिशन विशेषज्ञ व प्राथमिक रोबोटिक आर्म ऑपरेटर के रूप में स्पेस शटल कोलंबिया से अंतरिक्ष में अपनी पहली उड़ान भरी थी। यह दिन करनाल के वाशिंदे कभी नहीं भूलते, क्योंकि इस दिन करनाल ही नहीं बल्कि देशभर की निगाहें टेलीविजन स्क्रीन पर टिकी थी। जब सफलता के साथ कल्पना अंतरिक्ष के अकल्पनीय संसार की ओर रवाना हुई तो हर भारतीय गौरवान्वित था।
यह उसका पहला स्पेस मिशन था। कल्पना चावला को पहली बार अंतरिक्ष में जाने का मौका मिला था। वह इसको लेकर काफी रोमांचित थी। वह छह अंतरिक्ष यात्रियों में से एक थी। वह इतिहास रचने जा रही थी। दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री होने का खिताब हमेशा के लिए उसके नाम लिखा जा रहा था। राकेश शर्मा के बाद वह दूसरी भारतीय अंतरिक्ष यात्री बन रही थी।
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जब दाखिला लेने गई तो नहीं था कोई नाम
हरियाणा के करनाल शहर में कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हुआ था। अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी कल्पना का बचपन का नाम मोंटू था। उसने अपनी पढ़ाई करनाल के टैगोर बाल निकेतन में दाखिला लेकर शुरू कर दी थी। खास बात यह थी कि जब वह दाखिला लेने गई थी तब तक उसका कोई नाम नहीं था, जब हेड मास्टर ने तीन नाम उसके पिता को सुझाए तो मोंटू स्वयं बोल पड़ी कि उसका नाम कल्पना रखो। उसके पिता बीएल चावला ने बताया कि उसके शिक्षकों ने उन्हें घर आकर बताया कि कल्पना स्कूल में कागज के हवाई जहाज बनाकर उड़ाती रहती है। उसने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई पूरी की।
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करीब 372 घंटे अंतरिक्ष में बिताए
अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह 1982 में अमेरिका चली गईं। टैक्सस यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एम टेक किया। फिर यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। 1988 में कल्पना ने नासा के रिसर्च सेंटर में नियुक्ति पा ली। 1995 में वह नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं फिर उसका नाम छह अंतरिक्ष यात्रियों की सूची में शामिल हो गया। इसके बाद आठ महीने के कड़े प्रशिक्षण के बाद आखिरकार वह दिन भी आ गया। जब उसने अंतरिक्ष में पहली छलांग लगाई। वह तब 35 साल की थी, जब उसने एसटीएस-87 से पहली उड़ान भरी। इस मिशन के दौरान कल्पना ने 1.04 करोड़ मील सफर तय करते हुए करीब 372 घंटे अंतरिक्ष में बिताए थे।
एक फरवरी को रोया देश
पहली भारतीय अंतरिक्ष यात्री और करनाल की लाडली कल्पना की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा अंतिम यात्रा साबित हुई। पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय दुर्घटना हो गई। एक फरवरी 2003 को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही सब कुछ बिखर गया। पूरी तरह सफल रहा अभियान अंतिम क्षणों में बिखर गया। करनाल ही नहीं बल्कि देश के बच्चे-बच्चे की आंखें नम हो गईं।