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एनडीआरआई में भैंसों की मौत: मृत पशुओं का दस चूहों को चढ़ाया खून, खिलाया फीड सभी तंदुरुस्त
Fri, 20 Sep 2019 01:13 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, करनाल(हरियाणा)
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Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 20 Sep 2019 01:13 PM IST
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एनडीआरआई में भैंसों की मौत के मामले में तमाम तरह की आशंकाओं के बीच वैज्ञानिकों ने एक और तर्क सामने रखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले दिनों क्लाइमेट चेंज के कारण उमस और गर्मी से पशुओं की मौत हुई है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पोस्टमार्टम के दौरान पशुओं के फेफड़ों में पानी मिला है, साथ ही लीवर पर भी असर दिखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मृत पशुओं का खून दस चूहों पर चढ़ाया गया, लेकिन इनमें से एक भी चूहे की मौत नहीं हुई है, बल्कि चूहे तंदुरुस्त हैं।
अगर मृत पशुओं के खून में कोई बैक्टीरिया या फिर जहर आदि होता तो 8 से 10 घंटों में चूहों की मौत हो जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। साथ ही जो फीड पशुओं को खिलाया गया था, वो फीड चूहों को भी दिया गया, लेकिन इसका कोई असर चूहों पर नहीं पड़ा। इसी को आधार मानकर वैज्ञानिक इसी जांच पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अभी यह फाइनल रिपोर्ट नहीं है।
इससे भी बड़ा तर्क यह है कि तमाम तरह की दवाइयां देने के बाद भी दो दिन पहले तक पशुओं की तबियत में सुधार नहीं आ रहा था, वहीं दो दिन से ही मौसम में ठंडक आने के कारण बीमार पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार आ रहा है। हालांकि, तीन अलग-अलग संस्थानों के वैज्ञानिकों ने खून और अन्य सैंपल लेबोरेट्री में चेक के लिए भेजे हैं। सभी की रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों का खुलासा हो सकेगा।
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लाला लाजपत राय वेटरनरी यूनिवर्सिटी हिसार (लुवास) के उचानी स्थित रीजनल रिसर्च सेंटर के हेड डॉ. आरएस बिसला बताते हैं कि पिछले दस दिनों से उमस और गर्मी ज्यादा थी। अधिकतम तामपान 34 डिग्री और न्यूनतम 25 डिग्री सेल्सियस चल रहा है। ऐसे में उमस के कारण न केवल आम जन का बल्कि पशुओं का भी बुरा हाल रहा। हवा नहीं चलने के कारण घुटन के हालात बने हुए थे। डॉ. आरके बताते हैं कि अभी कई स्तर पर जांच चल रही है, लेकिन पशुओं को पोस्टमार्टम व मृत पशुओं के खून के लिए गए सैंपलों से ये पता लगता है कि पशुओं को कोई संदिग्ध बीमारी नहीं थी।
क्योंकि भैंसों में गर्मी सहने की क्षमता कम होती है, इसलिए ही भैंसों के लिए जोहड़ों की व्यवस्था होती है और वे जोहड़ में लेटकर गर्मी दूर करते हैं। उनका दावा है कि इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, क्योंकि कैटल गार्ड में गायों के साथ साथ भैंसें बंधी हैं, पूरे प्रकरण में एक भी गाय की मौत नहीं हुई, जबकि भैंसें लगातार बीमार होती रही और मरती रही। क्योंकि गाय पसीना निकाल लेती है, लेकिन भैंस में बाडी टेंपरेचर कंट्रोल करने की क्षमता नहीं होती। ऐसे में गर्मी और उमस के मौसम में भैंसों को कम से चार से पांच घंटे तक पानी में रखना होता है।
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अगर मृत पशुओं के खून में कोई बैक्टीरिया या फिर जहर आदि होता तो 8 से 10 घंटों में चूहों की मौत हो जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। साथ ही जो फीड पशुओं को खिलाया गया था, वो फीड चूहों को भी दिया गया, लेकिन इसका कोई असर चूहों पर नहीं पड़ा। इसी को आधार मानकर वैज्ञानिक इसी जांच पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अभी यह फाइनल रिपोर्ट नहीं है।
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इससे भी बड़ा तर्क यह है कि तमाम तरह की दवाइयां देने के बाद भी दो दिन पहले तक पशुओं की तबियत में सुधार नहीं आ रहा था, वहीं दो दिन से ही मौसम में ठंडक आने के कारण बीमार पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार आ रहा है। हालांकि, तीन अलग-अलग संस्थानों के वैज्ञानिकों ने खून और अन्य सैंपल लेबोरेट्री में चेक के लिए भेजे हैं। सभी की रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों का खुलासा हो सकेगा।
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लाला लाजपत राय वेटरनरी यूनिवर्सिटी हिसार (लुवास) के उचानी स्थित रीजनल रिसर्च सेंटर के हेड डॉ. आरएस बिसला बताते हैं कि पिछले दस दिनों से उमस और गर्मी ज्यादा थी। अधिकतम तामपान 34 डिग्री और न्यूनतम 25 डिग्री सेल्सियस चल रहा है। ऐसे में उमस के कारण न केवल आम जन का बल्कि पशुओं का भी बुरा हाल रहा। हवा नहीं चलने के कारण घुटन के हालात बने हुए थे। डॉ. आरके बताते हैं कि अभी कई स्तर पर जांच चल रही है, लेकिन पशुओं को पोस्टमार्टम व मृत पशुओं के खून के लिए गए सैंपलों से ये पता लगता है कि पशुओं को कोई संदिग्ध बीमारी नहीं थी।
क्योंकि भैंसों में गर्मी सहने की क्षमता कम होती है, इसलिए ही भैंसों के लिए जोहड़ों की व्यवस्था होती है और वे जोहड़ में लेटकर गर्मी दूर करते हैं। उनका दावा है कि इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, क्योंकि कैटल गार्ड में गायों के साथ साथ भैंसें बंधी हैं, पूरे प्रकरण में एक भी गाय की मौत नहीं हुई, जबकि भैंसें लगातार बीमार होती रही और मरती रही। क्योंकि गाय पसीना निकाल लेती है, लेकिन भैंस में बाडी टेंपरेचर कंट्रोल करने की क्षमता नहीं होती। ऐसे में गर्मी और उमस के मौसम में भैंसों को कम से चार से पांच घंटे तक पानी में रखना होता है।
उन्होंने बताया कि इन भैंसों को हम वाटर बफेलो के नाम भी जानते हैं। उनका कहना है कि हमें आशंका है कि गर्मी और उमस के कारण पैदा हुए तनाव और घुटन के कारण पशुओं के फेफड़े और लीवर अच्छे तरीके से काम नहीं कर सके, इसलिए उनकी मौत हो गई। बता दें कि पहले एनडीआरआई में भैंसों के लिए तालाब था, लेकिन पिछले तीन साल से तालाब सूखा है और भैंसों को फव्वारे से ही नहलाया जाता है।
ये भी हैं सवाल
अब सवाल यह है कि क्या गर्मी केवल एनडीआरआई के पशुओं को ही लगी? इस सवाल के जवाब में डा. बिसला बताते हैं कि गांवों में पाली गई भैंसें इनवायरमेंट के अनुसार होती हैं और उन पर इतना ज्यादा इनवायरमेंटल स्ट्रैस नहीं आता। क्योंकि एनडीआरआई में रखी जाने वाली भैंसों की केयर ज्यादा होती है और इनका खाना-पानी अच्छा होता है, इसलिए ये ज्यादा संवेदनशील होती हैं। हालांकि, कैटल यार्ड में गर्मी दूर करने के लिए पंखे आदि लगे हैं, लेकिन उमस के कारण वे भी इतना काम नहीं कर पाए। उन्होंने बताया कि पशु के शरीर में कई ऐसे कीटाणु होते हैं, जो बीमारी पैदा नहीं करते, लेकिन अगर गर्मी हो जाए तो वे तुरंत बीमारी पैदा कर सकते हैं।
मैं पहले दिन से ही एनडीआरआई के वैज्ञानिकों के संपर्क में हूं। कई पशुओं का पोस्टमार्टम भी किया है। क्लीनिकल सिमटेम समेत तमाम तरह के टेस्ट भी किए हैं। मैं अनुभव और तथ्यों के आधार पर कह सकता हूं कि शायद भैंसों की मौत गर्मी के कारण हुई घुटन के कारण हुई है। फिर भी लैब से रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट रूप से कुछ कहा जा सकता है। -डा. आरएस बिसला, लुवास के रीजनल रिसर्च सेंटर, उचानी, करनाल।
ये भी हैं सवाल
अब सवाल यह है कि क्या गर्मी केवल एनडीआरआई के पशुओं को ही लगी? इस सवाल के जवाब में डा. बिसला बताते हैं कि गांवों में पाली गई भैंसें इनवायरमेंट के अनुसार होती हैं और उन पर इतना ज्यादा इनवायरमेंटल स्ट्रैस नहीं आता। क्योंकि एनडीआरआई में रखी जाने वाली भैंसों की केयर ज्यादा होती है और इनका खाना-पानी अच्छा होता है, इसलिए ये ज्यादा संवेदनशील होती हैं। हालांकि, कैटल यार्ड में गर्मी दूर करने के लिए पंखे आदि लगे हैं, लेकिन उमस के कारण वे भी इतना काम नहीं कर पाए। उन्होंने बताया कि पशु के शरीर में कई ऐसे कीटाणु होते हैं, जो बीमारी पैदा नहीं करते, लेकिन अगर गर्मी हो जाए तो वे तुरंत बीमारी पैदा कर सकते हैं।
मैं पहले दिन से ही एनडीआरआई के वैज्ञानिकों के संपर्क में हूं। कई पशुओं का पोस्टमार्टम भी किया है। क्लीनिकल सिमटेम समेत तमाम तरह के टेस्ट भी किए हैं। मैं अनुभव और तथ्यों के आधार पर कह सकता हूं कि शायद भैंसों की मौत गर्मी के कारण हुई घुटन के कारण हुई है। फिर भी लैब से रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट रूप से कुछ कहा जा सकता है। -डा. आरएस बिसला, लुवास के रीजनल रिसर्च सेंटर, उचानी, करनाल।