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Karnal News: आधुनिक तकनीक अपनाकर बढ़ाना होगा दुग्ध उत्पादन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 15 Mar 2023 02:28 AM IST
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Milk production will have to be increased by adopting modern technology
माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में डॉ. कृष्णास्वामी किलारा अय्या स्मृति व्याख्यान में जलवायु परिवर्तन के बीच बढ़ती आबादी और पशु एवं दुग्ध उत्पादकता की चुनौतियों पर मंथन किया गया। इसमें जीबी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंतनगर (उत्तराखंड) के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि देश में बेहतर दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली नस्लों के साड़ों की कमी है, हमें इनकी कमी को पूरा करते हुए, बेहतर आधुनिक तकनीक का उपयोग कर दुग्ध उत्पादन को और बढ़ाना होगा। किसानों की आय में वृद्धि के लिए दुग्ध उत्पादों का निर्यात बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।
डॉ. डी. सुंदरेसन सभागार में एनडीआरआई के निदेशक एवं कुलपति डॉ. धीर सिंह की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने दीप प्रज्जवलित किया। संयुक्त निदेशक ( शैक्षणिक) डॉ. आशीष कुमार सिंह ने कहा कि डॉ. कृष्णास्वामी किलारा अय्या 1957-65 के दौरान एनडीआरआई के निदेशक रहे। उन्होंने खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) में भी काम किया। इसके बाद निदेशक डॉ. धीर सिंह ने प्रशस्ति पत्र पढ़ने के बाद मुख्य अतिथि को डॉ. कृष्णास्वामी किलारा अय्या स्मृति व्याख्यान पुरस्कार प्रदान किया।
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उन्होंने डॉ. चौहान को विश्व प्रसिद्ध जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक बताते हुए कहा कि उन्होंने कई संभावित प्रजनन जैव प्रौद्योगिकी विकसित करने के साथ ही गाय, भैंस, बकरी और याक में टेस्ट ट्यूब बेबी (इनविट्रो भ्रूण) की तकनीक की महत्वपूर्ण और आसान विधि विकसित की है। उनके नाम दुनिया में पहली भैंस के बछड़े का क्लोन ''गरिमा 2'' बनाने का रिकॉर्ड भी है।
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मुख्य अतिथि डॉ.मनमोहन सिंह चौहान ने कृत्रिम गर्भाधान, ईस्ट्रस सिंक्रोनाइज़ेशन, मल्टीपल ओव्यूलेशन इंडक्शन और भ्रूण स्थानांतरण, शुक्राणु और भ्रूण सेक्सिंग और इन विट्रो भ्रूण उत्पादन और परमाणु हस्तांतरण के माध्यम से क्लोनिंग से शुरू होने वाली विभिन्न प्रजनन तकनीक पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कृत्रिम गर्भाधान और इन विट्रो उत्पादन जैसे प्रजनन तकनीकों के संयोजन के साथ आणविक मार्करों का उपयोग करने के लिए चल रहे कदम से वांछित गुणों वाले जानवरों को प्राप्त करने के लिए आगे आनुवंशिक परिवर्तन में तेजी आने की संभावना है। उन्होंने कहा कि बेहतर दुग्ध उत्पादन क्षमता वाले 2500 अच्छी नस्लों के सांड़ हैं, जो काफी कम हैं। अभी प्रति व्यक्ति 418 ग्राम दूध की उपलब्धता है, जिसे 2047 तक प्रति व्यक्ति एक लीटर करना है, सांड़ व अच्छी नस्लों की कमी दूर करनी है। दुग्ध निर्यात को बढ़ाने के लिए भी काम किया जा रहा है। मौके पर पीएमई प्रकोष्ठ की प्रधान व प्रभारी डी. अर्चना वर्मा, शैक्षणिक समन्वयक डॉ. शिल्पा विज शामिल रहीं।

क्या हैं प्रमुख चुनौतियां
डॉ. एमएस चौहान के अनुसार स्थायी पशु उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए बढ़ता भू-क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग, पशु और पौधों के आनुवंशिक संसाधनों का क्षरण, पशुधन-मध्यस्थ पर्यावरण प्रदूषण, पानी की कमी और उभरती संक्रामक बीमारियों का खतरा आदि कई बड़ी चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों और व्यापक पर्यावरण की रक्षा करते हुए पशु उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा कराने की चुनौती भी इनमें से एक है।



10 सालों में बढ़ा दुग्ध उत्पादन
कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने प्रजनन जैव प्रौद्योगिकी पर कहा कि विश्व में सबसे बड़ा डेयरी उद्योग भारत में है, जो वैश्विक दुग्ध उत्पादन का 23 प्रतिशत है। ये राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भी पांच प्रतिशत है। जो सीधे आठ करोड़ से अधिक किसानों से जुड़ा है। देश का दुग्ध उत्पादन 2014-15 में 146.31 मिलियन टन था, जो 2020-21 में 6.2 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि दर के साथ 209.96 मिलियन टन तक पहुंच गया है।
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