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Karnal News: जलीय कृषि में आठ प्रतिशत वृद्धि के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंचा भारत
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एनडीआरआई में हरियाणा, दिल्ली और बिहार राज्य के किसानों को दिया जलीय कृषि का प्रशिक्षण
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान(एनडीआरआई) के कृषि विज्ञान केंद्र में शुक्रवार को हरियाणा, दिल्ली व बिहार राज्य के 17 किसानों को मिश्रित मत्स्य पालन के लिए सर्वोत्तम प्रबंधन विधियों पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। जिसके अंतिम ने केवीके अध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार सारस्वत ने जलीय कृषि को लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि देश में पिछले दस सालों में मछली उत्पादन में वृद्धि हुई है, जिसके बदौलत भारत ने जलीय कृषि उत्पादन में लगभग आठ प्रतिशत वैश्विक भागीदारी कर दूसरा स्थान प्राप्त किया है।
प्रशिक्षण में मत्स्य विज्ञान के विषय वस्तु विशेषज्ञ प्रदीप ए. ने जलीय कृषि के आर्थिक लाभों, मिश्रित मछली पालन की विशेषताएं बताते हुए कहाकि तालाब क्षेत्र व आयतन का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए मछलियों का आदर्श अनुपात आवश्यक है। तालाब को खाद डालने के 15 दिन बाद मछली के बीज डालने के लिए तैयार किया जा सकता है। मछली के बीज का आदर्श आकार 100-150 ग्राम होता है, और इनकी संख्या 6000-7500 बीज प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए। उन्होंने जलीय कृषि में प्रमुख रोगों, उनके उपचार के उपायों तथा परजीवी संक्रमण पर नियंत्रण के तरीके भी बताते हुए आनुवंशिक रूप से उन्नत मछली प्रजातियों जैसे जयंती रोहू, अमूर कार्प, अमृत कतला, महा मागुर, जीआई स्कैंपी तथा गीफ्ट तिलापिया की जानकारी दी।
वैज्ञानिक राकेश कुमार टोंक ने डेयरी फार्मिंग व एकीकृत मत्स्य पालन को अपनाने की अपार संभावनाएं बताई। डॉ. सोनिया ने मछली एवं उसके उप-उत्पादों के पोषण संबंधी लाभ बताएं।
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प्रशिक्षुओं को प्रगतिशील मत्स्य कृषक सुशील कुमार की हैचरी एवं मत्स्य फार्म का भ्रमण भी कराया गया, जहां उन्होंने कृषक से प्रत्यक्ष संवाद कर व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। अंत में डॉ. पंकज कुमार सारस्वत और टीम ने प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान(एनडीआरआई) के कृषि विज्ञान केंद्र में शुक्रवार को हरियाणा, दिल्ली व बिहार राज्य के 17 किसानों को मिश्रित मत्स्य पालन के लिए सर्वोत्तम प्रबंधन विधियों पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। जिसके अंतिम ने केवीके अध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार सारस्वत ने जलीय कृषि को लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि देश में पिछले दस सालों में मछली उत्पादन में वृद्धि हुई है, जिसके बदौलत भारत ने जलीय कृषि उत्पादन में लगभग आठ प्रतिशत वैश्विक भागीदारी कर दूसरा स्थान प्राप्त किया है।
प्रशिक्षण में मत्स्य विज्ञान के विषय वस्तु विशेषज्ञ प्रदीप ए. ने जलीय कृषि के आर्थिक लाभों, मिश्रित मछली पालन की विशेषताएं बताते हुए कहाकि तालाब क्षेत्र व आयतन का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए मछलियों का आदर्श अनुपात आवश्यक है। तालाब को खाद डालने के 15 दिन बाद मछली के बीज डालने के लिए तैयार किया जा सकता है। मछली के बीज का आदर्श आकार 100-150 ग्राम होता है, और इनकी संख्या 6000-7500 बीज प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए। उन्होंने जलीय कृषि में प्रमुख रोगों, उनके उपचार के उपायों तथा परजीवी संक्रमण पर नियंत्रण के तरीके भी बताते हुए आनुवंशिक रूप से उन्नत मछली प्रजातियों जैसे जयंती रोहू, अमूर कार्प, अमृत कतला, महा मागुर, जीआई स्कैंपी तथा गीफ्ट तिलापिया की जानकारी दी।
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वैज्ञानिक राकेश कुमार टोंक ने डेयरी फार्मिंग व एकीकृत मत्स्य पालन को अपनाने की अपार संभावनाएं बताई। डॉ. सोनिया ने मछली एवं उसके उप-उत्पादों के पोषण संबंधी लाभ बताएं।
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प्रशिक्षुओं को प्रगतिशील मत्स्य कृषक सुशील कुमार की हैचरी एवं मत्स्य फार्म का भ्रमण भी कराया गया, जहां उन्होंने कृषक से प्रत्यक्ष संवाद कर व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। अंत में डॉ. पंकज कुमार सारस्वत और टीम ने प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।