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सरकारी स्कूलों में शौचालय न पानी
ब्यूरो/अमर उजाला,करनाल
Updated Tue, 25 Aug 2015 01:01 AM IST
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न पढ़ाने के लिए शिक्षक हैं न स्कूल में छत। न शौचालय हैं न पीने के पानी
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की व्यवस्था। सीएम सिटी करनाल सहित जिलेभर में करीब 150 स्कूलों की स्थिति
कुछ ऐसी ही है। जिले में दो स्कूल बिना बिल्डिंग के चल रहे हैं। इन दोनों
स्कूलों में शौचालय तक नहीं थे।
हालांकि हाल ही में इन दोनों बिल्डिंग लैस स्कूलों में फैब्रीकेटिड शौचालय बनवा दिए गए हैं। दोनों निगदू के कमोपुरा के हैं। जहां शौचालय हैं वहां ताला लगा हुआ है। जिले में इस समय करीब 1800 शिक्षकों की कमी है। जिले के 277 सरकारी स्कूलों में शौचालयों की रिपेयरिंग व करीब 82 नए शौचालयों के लिए करोड़ों रुपये की राशि जरूर आई, लेकिन अधिकारी इस राशि को निकलवा पाने में असमर्थ रहे। परिणाम यह रहा कि 77 स्कूलों की रिपेयरिंग आज तक नहीं हो पाई और 19 लाख 77 हजार 745 रुपये लैप्स हो गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान और निर्देशों के एक साल बाद भी सीएम सिटी करनाल में सरकारी स्कूलों में शौचालयों के हालात अच्छे नहीं हैं। अभी भी जिले में सरकारी स्कूल 100 प्रतिशत शौचालयों के लक्ष्य से बेहद दूर हैं। जहां शौचालय हैं वहां या तो वे मरम्मत के इंतजार में हैं या वह किन्हीं अन्य कारणों से बंद पड़े हैं। यहां सीनियर सेकेंडरी, सेकेंडरी हाई और प्राथमिक कुल करीब 786 स्कूल हैं। इनमें से करीब 77 स्कूलों में करीब एक साल से शौचालयों को मरम्मत का इंतजार है।
इस तरह आई राशि
277 स्कूल शौचालयों की मरम्मत के लिए करीब 80 लाख रुपये आए, वहीं इनमें से करीब 199 की रिपेयरिंग हो गई, लेकिन 77 शौचालयों के लिए आया करीब 20 लाख रुपये मार्च महीने में नहीं निकलवाने के कारण लैप्स हो गया था। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान के तहत 42 शौचालयों के लिए 42 लाख व अशक्त बच्चों के लिए शौचालय बनवाने के लिए 72 हजार 300 प्रति शौचालय के हिसाब से आया। अब नाबार्ड अभियान के तहत 29 शौचालय बनवाए जाने हैं, लेकिन कब तक बनेंगे कुछ नहीं कहा जा सकता। इनके लिए 2 लाख 15 हजार रुपये प्रति टॉयलेट के हिसाब से राशि आई है। इसी राशि से हैंडपंप भी लगाया जाना है। बहरहाल सरकारी स्कूलों की सीएम सिटी में स्थिति बेहद खराब है।
शौचालयों की सफाई के लिए नहीं है स्वीपर
जिले में एक भी प्राइमरी और हाई स्कूल में शौचालयों की सफाई के लिए स्वीपर का बंदोबस्त नहीं किया गया है। कुछ ऐसा ही हाल सीनियर सेकेंडरी स्कूलों का है। यहां पर यदि स्वीपर है तो वह अनुबंध पर रखा गया है। करीब 125 रुपये उसे रोजाना दिए जाते हैं, जो दो घंटे काम करके चला जाता है।
निगदू और करनाल में मिले हाल बेहाल
शौचालयों की स्थिति का जायजा लेने जब अमर उजाला की टीम निगदू के कई स्कूलों में पहुंची तो वहां के हाल बेहाल मिले। क्षेत्र के कई गांवों में बने सरकारी स्कूलों में शौचालय की स्थिति इतनी दयनीय है कि बच्चे कभी भी बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। साथ ही शौचालय नहीं होने के कारण खुले में जाने के चलते कभी भी दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। न किसी अधिकारी न ही स्कूल समिति को इसकी परवाह है। क्योंकि स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर गरीब परिवार के बच्चे होते हैं।
बोतलों में पानी लेकर जाते हैं बच्चे
बच्चों को शौच के लिए बोतलों में पानी ले जाना पड़ता है। गांव निगदू के राजकीय प्राथमिक पाठशाला में बने लड़कियों के शौचालय को लड़के व लड़कियां दोनों ही प्रयोग में लाते हैं। क्योंकि स्कूल में लड़कों के लिए बनाया गया शौचालय पूरी तरह कंडम है। लड़कियों के शौचालय का दरवाजा व दीवार गिरी पड़ी है, जो टूटकर अटकी हुई है। छोटे-छोटे बच्चों को बाहर ही शौचालय जाना पड़ता है। गांव बोहला खालसा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में बने लड़कियों के शौचालय में दरवाजे टूटे पड़े हैं। कुछ शौचालयों पर ताला लटका है।
नलवी पार के एकमात्र हाई स्कूल की स्थिति भी ऐसी ही
शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर गांव नलवी पार में एकमात्र हाई स्कूल है। इस स्कूल में आसपास के करीब 6 गांव के बच्चे आते हैं। प्राइमरी स्कूल भी इसी स्कूल के भीतर है। हालांकि स्कूल में करीब 4 शौचालय हैं, लेकिन सभी के सभी बंद पड़े हैं। किसी में पानी नहीं है तो किसी में पानी के रिसाव के कारण उसे बंद करना पड़ा है।
कुछ खामियों के कारण ट्रेजरी से मार्च में आया करीब 20 लाख रुपया लैप्स हो गया था। नाबार्ड के तहत भी कुछ शौचालय जल्द ही बनवा दिए जाएंगे। जल्द ही सभी स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था कर दी जाएगी।
सरोज बाला, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी, करनाल।
हालांकि हाल ही में इन दोनों बिल्डिंग लैस स्कूलों में फैब्रीकेटिड शौचालय बनवा दिए गए हैं। दोनों निगदू के कमोपुरा के हैं। जहां शौचालय हैं वहां ताला लगा हुआ है। जिले में इस समय करीब 1800 शिक्षकों की कमी है। जिले के 277 सरकारी स्कूलों में शौचालयों की रिपेयरिंग व करीब 82 नए शौचालयों के लिए करोड़ों रुपये की राशि जरूर आई, लेकिन अधिकारी इस राशि को निकलवा पाने में असमर्थ रहे। परिणाम यह रहा कि 77 स्कूलों की रिपेयरिंग आज तक नहीं हो पाई और 19 लाख 77 हजार 745 रुपये लैप्स हो गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान और निर्देशों के एक साल बाद भी सीएम सिटी करनाल में सरकारी स्कूलों में शौचालयों के हालात अच्छे नहीं हैं। अभी भी जिले में सरकारी स्कूल 100 प्रतिशत शौचालयों के लक्ष्य से बेहद दूर हैं। जहां शौचालय हैं वहां या तो वे मरम्मत के इंतजार में हैं या वह किन्हीं अन्य कारणों से बंद पड़े हैं। यहां सीनियर सेकेंडरी, सेकेंडरी हाई और प्राथमिक कुल करीब 786 स्कूल हैं। इनमें से करीब 77 स्कूलों में करीब एक साल से शौचालयों को मरम्मत का इंतजार है।
इस तरह आई राशि
277 स्कूल शौचालयों की मरम्मत के लिए करीब 80 लाख रुपये आए, वहीं इनमें से करीब 199 की रिपेयरिंग हो गई, लेकिन 77 शौचालयों के लिए आया करीब 20 लाख रुपये मार्च महीने में नहीं निकलवाने के कारण लैप्स हो गया था। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान के तहत 42 शौचालयों के लिए 42 लाख व अशक्त बच्चों के लिए शौचालय बनवाने के लिए 72 हजार 300 प्रति शौचालय के हिसाब से आया। अब नाबार्ड अभियान के तहत 29 शौचालय बनवाए जाने हैं, लेकिन कब तक बनेंगे कुछ नहीं कहा जा सकता। इनके लिए 2 लाख 15 हजार रुपये प्रति टॉयलेट के हिसाब से राशि आई है। इसी राशि से हैंडपंप भी लगाया जाना है। बहरहाल सरकारी स्कूलों की सीएम सिटी में स्थिति बेहद खराब है।
शौचालयों की सफाई के लिए नहीं है स्वीपर
जिले में एक भी प्राइमरी और हाई स्कूल में शौचालयों की सफाई के लिए स्वीपर का बंदोबस्त नहीं किया गया है। कुछ ऐसा ही हाल सीनियर सेकेंडरी स्कूलों का है। यहां पर यदि स्वीपर है तो वह अनुबंध पर रखा गया है। करीब 125 रुपये उसे रोजाना दिए जाते हैं, जो दो घंटे काम करके चला जाता है।
निगदू और करनाल में मिले हाल बेहाल
शौचालयों की स्थिति का जायजा लेने जब अमर उजाला की टीम निगदू के कई स्कूलों में पहुंची तो वहां के हाल बेहाल मिले। क्षेत्र के कई गांवों में बने सरकारी स्कूलों में शौचालय की स्थिति इतनी दयनीय है कि बच्चे कभी भी बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। साथ ही शौचालय नहीं होने के कारण खुले में जाने के चलते कभी भी दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। न किसी अधिकारी न ही स्कूल समिति को इसकी परवाह है। क्योंकि स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर गरीब परिवार के बच्चे होते हैं।
बोतलों में पानी लेकर जाते हैं बच्चे
बच्चों को शौच के लिए बोतलों में पानी ले जाना पड़ता है। गांव निगदू के राजकीय प्राथमिक पाठशाला में बने लड़कियों के शौचालय को लड़के व लड़कियां दोनों ही प्रयोग में लाते हैं। क्योंकि स्कूल में लड़कों के लिए बनाया गया शौचालय पूरी तरह कंडम है। लड़कियों के शौचालय का दरवाजा व दीवार गिरी पड़ी है, जो टूटकर अटकी हुई है। छोटे-छोटे बच्चों को बाहर ही शौचालय जाना पड़ता है। गांव बोहला खालसा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में बने लड़कियों के शौचालय में दरवाजे टूटे पड़े हैं। कुछ शौचालयों पर ताला लटका है।
नलवी पार के एकमात्र हाई स्कूल की स्थिति भी ऐसी ही
शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर गांव नलवी पार में एकमात्र हाई स्कूल है। इस स्कूल में आसपास के करीब 6 गांव के बच्चे आते हैं। प्राइमरी स्कूल भी इसी स्कूल के भीतर है। हालांकि स्कूल में करीब 4 शौचालय हैं, लेकिन सभी के सभी बंद पड़े हैं। किसी में पानी नहीं है तो किसी में पानी के रिसाव के कारण उसे बंद करना पड़ा है।
कुछ खामियों के कारण ट्रेजरी से मार्च में आया करीब 20 लाख रुपया लैप्स हो गया था। नाबार्ड के तहत भी कुछ शौचालय जल्द ही बनवा दिए जाएंगे। जल्द ही सभी स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था कर दी जाएगी।
सरोज बाला, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी, करनाल।