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इंडिया बुक में किया नाम दर्ज
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दिव्यांगता को शक्ति बनाकर कोई भी व्यक्ति अपनी मंजिल को हासिल कर सकता है। जन्म से सेरेब्रल पाल्सी (एक रोग जिसमें दिमागी अक्षमता के कारण चलने-फिरने और अनैच्छिक क्त्रिस्याओं पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है) से पीड़ित सेक्टर-13 निवासी डॉ. रितेश सिन्हा ने एक मुद्रा बनाकर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी नाम दर्ज कराया है। इसका प्रकाशन 2023 में होगा। इससे पहले वे जनवरी 2020 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस में नाम दर्ज करा चुके हैं। इसके लिए उन्हें प्रमाण पत्र भी मिल चुका है।
बता दें डॉ. रितेश सिन्हा ने रितेश मुद्रा के नाम से एक ऐसी मुद्रा बनाई है, जिससे दिव्यांग व्यक्ति के हाथ पांव में आने वाली अकड़ कम होती है। इस मुद्रा को वह निरंतर अभ्यास कर रहे हैं 2018 में इन्होंने ये मुद्रा तैयार की थी। इसी कारण इंडिया बुक ऑफ रिकार्डस में उनका नाम दर्ज किया गया है। बता दें बचपन में रितेश को स्कूल संचालकों ने दाखिला देने से मना कर दिया था। इसके बाद इन्होंने केवल इस रोग को मात दी, बल्कि वे लेखक, इनोवेटर, मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। इतना ही नहीं उन्होंने सीपी (सेरेब्रल पाल्सी) के अर्थ को बदल कर सेरेब्रल पाल्सी यानि कैपेबल पर्सन (सक्षम व्यक्ति) का नाम दिया है। अब वह अपनी मां डॉ. पी आर सिन्हा, सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक, एनडीआरआई करनाल के साथ सेक्टर-13 में रह रहे हैं। इनकी मां का कहना है कि दिव्यांग को दया नहीं बल्कि प्रेरणा की जरूरत होती है
डॉ. रितेश की मां डॉ. पीआर सिन्हा ने बताया कि रितेश का जन्म 30 मार्च 1974 को करनाल में हुआ था। उसके पिता डॉ. आरएन सिन्हा आईसीएआर में एडीजी थे। 11 महीने तक रितेश हाथ पांव हिला नहीं पा रहा था तो उन्होंने डॉक्टरों को दिखाया तब पता चला कि उनका बेटा सेरेब्रल पाल्सी बीमारी से पीड़ित है। शारीरिक अक्षमता के कारण रितेश अपने शरीर को भी कंट्रोल करने में सक्षम नहीं था। इसलिए कोई भी स्कूल उसे दाखिला देने के लिए तैयार नहीं था। काफी संघर्ष के बाद, रितेश को एक स्कूल में दाखिला मिला। रितेश सिन्हा ने पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लामा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन, इनफॉर्मेशन टैक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर और प्राकृतिक चिकित्सा में डिप्लोमा पूरा किया। उन्होंने 1990 में अपना खुद के पैर से चलने वाली ट्राइ साइकिल का आविष्कार किया। जिसके बाद वह 10 किलोमीटर तक खुद ही कहीं भी आने जाने में सक्षम हो गया।
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रितेश ने दावा किया कि दिव्यांग लोगों की क्षमताओं और क्षमता के बारे में जनता में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से, उन्होंने अपना स्वयं का प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया। यहां उन्होंने आईटी उद्योग में एक मजबूत कैरियर बनाने के लिए 1000 से अधिक व्यक्तियों को कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया।
वह विकलांग लोगों को व्हाट्सएप और फेसबुक पर अपने कैपेबल पर्सन ग्रुप के माध्यम से अपनी समस्याओं को हल करने में मदद करता है। सेरेब्रल पाल्सी विचारों, विचारों, सूचनाओं के आदान-प्रदान और उन्हें प्रेरित करने के लिए जोड़ता है। इस ग्रुप में पूरे भारत से करीब 100 लोग जुड़े हुए हैं, जो इस सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हैं।
रितेश ने बताया कि आम जनता में सेरेब्रल पाल्सी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने अंडरस्टैंडिंग ऑफ सेरेब्रल पाल्सी नामक बुक लिखी है। उसे कैविनकर अवार्ड, मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है। उनके डिजिटल इंडिया अभियान के लिए इनटेल व दि बैटर इंडिया डोट कोम द्वारा चयन किया गया था। अबेलिटी टेस्ट में सफलता मिलने के बाद रितेश को 2010 में करनाल कोर्ट में कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी मिली।
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बता दें डॉ. रितेश सिन्हा ने रितेश मुद्रा के नाम से एक ऐसी मुद्रा बनाई है, जिससे दिव्यांग व्यक्ति के हाथ पांव में आने वाली अकड़ कम होती है। इस मुद्रा को वह निरंतर अभ्यास कर रहे हैं 2018 में इन्होंने ये मुद्रा तैयार की थी। इसी कारण इंडिया बुक ऑफ रिकार्डस में उनका नाम दर्ज किया गया है। बता दें बचपन में रितेश को स्कूल संचालकों ने दाखिला देने से मना कर दिया था। इसके बाद इन्होंने केवल इस रोग को मात दी, बल्कि वे लेखक, इनोवेटर, मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। इतना ही नहीं उन्होंने सीपी (सेरेब्रल पाल्सी) के अर्थ को बदल कर सेरेब्रल पाल्सी यानि कैपेबल पर्सन (सक्षम व्यक्ति) का नाम दिया है। अब वह अपनी मां डॉ. पी आर सिन्हा, सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक, एनडीआरआई करनाल के साथ सेक्टर-13 में रह रहे हैं। इनकी मां का कहना है कि दिव्यांग को दया नहीं बल्कि प्रेरणा की जरूरत होती है
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डॉ. रितेश की मां डॉ. पीआर सिन्हा ने बताया कि रितेश का जन्म 30 मार्च 1974 को करनाल में हुआ था। उसके पिता डॉ. आरएन सिन्हा आईसीएआर में एडीजी थे। 11 महीने तक रितेश हाथ पांव हिला नहीं पा रहा था तो उन्होंने डॉक्टरों को दिखाया तब पता चला कि उनका बेटा सेरेब्रल पाल्सी बीमारी से पीड़ित है। शारीरिक अक्षमता के कारण रितेश अपने शरीर को भी कंट्रोल करने में सक्षम नहीं था। इसलिए कोई भी स्कूल उसे दाखिला देने के लिए तैयार नहीं था। काफी संघर्ष के बाद, रितेश को एक स्कूल में दाखिला मिला। रितेश सिन्हा ने पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लामा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन, इनफॉर्मेशन टैक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर और प्राकृतिक चिकित्सा में डिप्लोमा पूरा किया। उन्होंने 1990 में अपना खुद के पैर से चलने वाली ट्राइ साइकिल का आविष्कार किया। जिसके बाद वह 10 किलोमीटर तक खुद ही कहीं भी आने जाने में सक्षम हो गया।
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रितेश ने दावा किया कि दिव्यांग लोगों की क्षमताओं और क्षमता के बारे में जनता में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से, उन्होंने अपना स्वयं का प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया। यहां उन्होंने आईटी उद्योग में एक मजबूत कैरियर बनाने के लिए 1000 से अधिक व्यक्तियों को कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया।
वह विकलांग लोगों को व्हाट्सएप और फेसबुक पर अपने कैपेबल पर्सन ग्रुप के माध्यम से अपनी समस्याओं को हल करने में मदद करता है। सेरेब्रल पाल्सी विचारों, विचारों, सूचनाओं के आदान-प्रदान और उन्हें प्रेरित करने के लिए जोड़ता है। इस ग्रुप में पूरे भारत से करीब 100 लोग जुड़े हुए हैं, जो इस सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हैं।
रितेश ने बताया कि आम जनता में सेरेब्रल पाल्सी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने अंडरस्टैंडिंग ऑफ सेरेब्रल पाल्सी नामक बुक लिखी है। उसे कैविनकर अवार्ड, मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है। उनके डिजिटल इंडिया अभियान के लिए इनटेल व दि बैटर इंडिया डोट कोम द्वारा चयन किया गया था। अबेलिटी टेस्ट में सफलता मिलने के बाद रितेश को 2010 में करनाल कोर्ट में कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी मिली।