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संरक्षित खेती को बढ़ावा देने पर दिया जोर
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करनाल। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान में संरक्षित कृषि पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम में अनुसंधानकर्ताओं का मार्गदर्शन किया गया। समापन समारोह में शनिवार को बतौर मुख्य अतिथि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ. एसके चौधरी ने कहा कि ये वैज्ञानिक दूत के रूप में काम करेंगे। जो संरक्षित खेती को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाएंगे।
उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद संरक्षित खेती ने किसानों की सहायता की है। संरक्षित खेती पंजाब व हरियाणा के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी व्यापक स्तर पर बढ़ती जा रही है। इसे सिंचित क्षेत्र के अलावा बागवानी क्षेत्रों में भी फैलाव की आवश्यकता है। संरक्षित खेती गरीबी कम करने, भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने, प्रदूषण कम करने व खेती में होने वाले खर्च को कम करने में बहुत ही कारगर कृषि पद्धति है। इस दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली, परिषद के दूसरे संस्थान, सीमिट व बीसा के संयुक्त प्रयास चल रहे हैं।
संस्थान के निदेशक डॉ. प्रबोध चंद्र शर्मा ने कहा कि यह प्रशिक्षण मुख्य रूप से विभिन्न भागों में संपन्न हुआ। संरक्षित खेती अपनाकर आसानी से खरपतवारों का प्रबंधन, जमीन की उपजाऊ क्षमता में बढ़ोतरी, पानी की बचत तथा वातावरण के खतरों से बचा जा सकता है।
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सीमिट के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण के समन्वयक डॉ. एमएल जाट ने कहा कि एशिया व साउथ अफ्रीका में पिछले दस साल में 500 से ज्यादा वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस प्रशिक्षण में लगभग सारे पहलू पर ध्यान दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र सीमिट, बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया बीसा व केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के संयुक्त पहल में यह 11वां प्रशिक्षण ‘गेटवे फॉर प्रोडक्टिव एंड सस्टेनेबल क्रॉपिंग सिस्टम’ विषय पर रहा। जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि विज्ञानल केंद्रों, अनुसंधान संस्थानों व कृषि विश्वविद्यालय के 16 वैज्ञानिकों ने भाग लिया। इस मौके पर प्रधान वैज्ञानिक डॉ.एचएस जाट, डॉ. आरके यादव, डॉ. दीपक व अन्य वैज्ञानिक मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद संरक्षित खेती ने किसानों की सहायता की है। संरक्षित खेती पंजाब व हरियाणा के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी व्यापक स्तर पर बढ़ती जा रही है। इसे सिंचित क्षेत्र के अलावा बागवानी क्षेत्रों में भी फैलाव की आवश्यकता है। संरक्षित खेती गरीबी कम करने, भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने, प्रदूषण कम करने व खेती में होने वाले खर्च को कम करने में बहुत ही कारगर कृषि पद्धति है। इस दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली, परिषद के दूसरे संस्थान, सीमिट व बीसा के संयुक्त प्रयास चल रहे हैं।
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संस्थान के निदेशक डॉ. प्रबोध चंद्र शर्मा ने कहा कि यह प्रशिक्षण मुख्य रूप से विभिन्न भागों में संपन्न हुआ। संरक्षित खेती अपनाकर आसानी से खरपतवारों का प्रबंधन, जमीन की उपजाऊ क्षमता में बढ़ोतरी, पानी की बचत तथा वातावरण के खतरों से बचा जा सकता है।
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सीमिट के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण के समन्वयक डॉ. एमएल जाट ने कहा कि एशिया व साउथ अफ्रीका में पिछले दस साल में 500 से ज्यादा वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस प्रशिक्षण में लगभग सारे पहलू पर ध्यान दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र सीमिट, बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया बीसा व केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के संयुक्त पहल में यह 11वां प्रशिक्षण ‘गेटवे फॉर प्रोडक्टिव एंड सस्टेनेबल क्रॉपिंग सिस्टम’ विषय पर रहा। जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि विज्ञानल केंद्रों, अनुसंधान संस्थानों व कृषि विश्वविद्यालय के 16 वैज्ञानिकों ने भाग लिया। इस मौके पर प्रधान वैज्ञानिक डॉ.एचएस जाट, डॉ. आरके यादव, डॉ. दीपक व अन्य वैज्ञानिक मौजूद रहे।