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धर्मनगरी कुरुक्षेत्र : नदियों के घाटों पर भक्ति और भाव का संगम
Sun, 09 Nov 2025 12:17 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Sun, 09 Nov 2025 12:17 AM IST
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सेवा सिंह
कुरुक्षेत्र। गीता जन्म स्थली के साथ-साथ धर्मनगरी नदियों की धरा भी रही है, जहां नौ नदियां इस धरा को सींचती थीं तो इनके घाट भक्ति और भाव के संगम रहे। भले ही इनमें से अधिकतर समय के साथ विलुप्त होती रहीं लेकिन कुरुक्षेत्र 48 कोस के तीर्थों की जीवन रेखा यही नदियां मानी जाती रहीं। पिछले कईं वर्षों से मुख्य व पवित्र सरस्वती नदी का जीर्णोद्वार शुरू हुआ तो फिर से इसके साथ-साथ सोम नदी, राक्षी नदी के प्रति भी लोगों की आस्था व श्रद्वा बढ़ने लगी है।
श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था को देख सरस्वती किनारे ही अब तक 28 घाट तो 15 रिजरवायर तैयार किए जा चुके हैं। आदि ब्रदी में ही सोम नदी पर करीब 387 करोड़ से डैम बनाए जाने का प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में हैं।
नदियों के तट पर स्थित तीर्थ
आपगा तीर्थ, गादली जिला कैथल
त्रिविष्टप तीर्थ, टयोंठा जिला कैथल
इक्षुमति तीर्थ, पोलड़ जिला कैथल
सप्त सारस्वत तीर्थ, मांगना जिला कुरुक्षेत्र
सरस्वती तीर्थ, पिहोवा जिला कुरुक्षेत्र
कौशिकी तीर्थ, कोयर जिला करनाल
जगदग्नि तीर्थ, जामनी जिला जींद
बॉक्स
सरस्वती किनारे अवस्थित थे 122 मंदिर, छह पिंडदान केंद्र
लोक प्रचलित है कि सरस्वती का जल सहायक नदियों में भी प्रवाहित होता था। प्राचीन समय में सरस्वती किनारे ही आदि बद्री से लेकर कैथल तक 122 मंदिर थे। इसी नदी के किनारे ही पांच पिंडदान स्थल थे, जहां लोग पूजा अर्चना करते थे। इनके प्रति आज भी श्रद्धा ज्यों की त्यों है। इनमें यमुनानगर जिला में कपाल मोचन व सरस्वती नगर, कुरुक्षेत्र में सन्निहित सरोवर व पिहोवा तीर्थ, राजस्थान में पुष्कर झील व गुजरात के पाटक जिला में सिद्धपुर शामिल है। सरस्वती व दृष्यदवति नदियों के बीच के क्षेत्र को ही ब्रह्माव्रत व महाभारत में कुरुक्षेत्र 48 कोस माना जाता था। इस क्षेत्र के लोगों को पिंडदान के लिए किसी अन्य तीर्थ पर जाने की जरूरत नहीं मानी जाती।
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निरंतर प्रवाहित होती थी सरस्वती, आठ थी सहायक नदियां
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल के मुताबिक प्राचीन समय में इस क्षेत्र से जहां सरस्वती मुख्य व सदैव बहने वाली नदी थी तो वहीं इसकी सहायक आठ नदियां थी, जिनमें वैतरणी, आपगा, गंगा-मंदाकिनी, मधुस्रवा, वासुनदी, कौशिक, दृष्यदवती व हिरण्वती शामिल है। सहायक नदियां वर्षाकाल में ही बहती थी। इनका जिक्र वामन पुराण में भी माना जाता है। महाभारत के वन पर्व व शल्य पर्व में भी सरस्वती नदी का विशद वर्णन मिलता है। मनुस्मृति में सरस्वती एवं दृश्यदवती नदियों के बीच के क्षेत्र को ही कुरुक्षेत्र कहा गया है। पुरातत्ववेताओं ने प्रदेश में ही सरस्वती व उसकी सहायक नदियों के तटों से 558 स्थल आद्य हड़प्पा कालीन संस्कृति के, 114 स्थल विकसित हड़प्पा संस्कृति के तथा 1168 उत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृति केंद्र खोजे जा चुके हैं। हरियाणा से गुजरात तक 2378 पुरातात्विक स्थल मिलते हैं। इससे कुरुक्षेत्र भूमि में बड़ी संख्या में तीर्थों की उपस्थिति की संभावना जताई जा रही है। यह भी संभव है कि सरस्वती के घाटों पर अनेक स्थल कालांतर में तीर्थ रुप में परिणित हो गए होंगे।
सरस्वती किनारे ही अष्ट कोसी यात्रा : धुमन
सरस्वती हेरिटेज बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन किरमिच बताते हैं कि जीर्णोद्वार के बाद सरस्वती में करीब 400 किलोमीटर क्षेत्र में जल प्रवाहित होने लगा है। बारिश के सीजन में करीब 500 क्यूसिक तक इसमें जलस्तर रहा तो 60 करोड़ लीटर पानी रिचार्ज हुआ। सरस्वती के साथ अब इसके किनारे रहे प्राचीन मंदिरों का भी जीर्णोद्वार किया जा रहा है। यहां तक कि सरस्वती किनारे अष्टकोसी यात्रा भी फिर से शुरू की गई है।
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कुरुक्षेत्र। गीता जन्म स्थली के साथ-साथ धर्मनगरी नदियों की धरा भी रही है, जहां नौ नदियां इस धरा को सींचती थीं तो इनके घाट भक्ति और भाव के संगम रहे। भले ही इनमें से अधिकतर समय के साथ विलुप्त होती रहीं लेकिन कुरुक्षेत्र 48 कोस के तीर्थों की जीवन रेखा यही नदियां मानी जाती रहीं। पिछले कईं वर्षों से मुख्य व पवित्र सरस्वती नदी का जीर्णोद्वार शुरू हुआ तो फिर से इसके साथ-साथ सोम नदी, राक्षी नदी के प्रति भी लोगों की आस्था व श्रद्वा बढ़ने लगी है।
श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था को देख सरस्वती किनारे ही अब तक 28 घाट तो 15 रिजरवायर तैयार किए जा चुके हैं। आदि ब्रदी में ही सोम नदी पर करीब 387 करोड़ से डैम बनाए जाने का प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में हैं।
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नदियों के तट पर स्थित तीर्थ
आपगा तीर्थ, गादली जिला कैथल
त्रिविष्टप तीर्थ, टयोंठा जिला कैथल
इक्षुमति तीर्थ, पोलड़ जिला कैथल
सप्त सारस्वत तीर्थ, मांगना जिला कुरुक्षेत्र
सरस्वती तीर्थ, पिहोवा जिला कुरुक्षेत्र
कौशिकी तीर्थ, कोयर जिला करनाल
जगदग्नि तीर्थ, जामनी जिला जींद
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सरस्वती किनारे अवस्थित थे 122 मंदिर, छह पिंडदान केंद्र
लोक प्रचलित है कि सरस्वती का जल सहायक नदियों में भी प्रवाहित होता था। प्राचीन समय में सरस्वती किनारे ही आदि बद्री से लेकर कैथल तक 122 मंदिर थे। इसी नदी के किनारे ही पांच पिंडदान स्थल थे, जहां लोग पूजा अर्चना करते थे। इनके प्रति आज भी श्रद्धा ज्यों की त्यों है। इनमें यमुनानगर जिला में कपाल मोचन व सरस्वती नगर, कुरुक्षेत्र में सन्निहित सरोवर व पिहोवा तीर्थ, राजस्थान में पुष्कर झील व गुजरात के पाटक जिला में सिद्धपुर शामिल है। सरस्वती व दृष्यदवति नदियों के बीच के क्षेत्र को ही ब्रह्माव्रत व महाभारत में कुरुक्षेत्र 48 कोस माना जाता था। इस क्षेत्र के लोगों को पिंडदान के लिए किसी अन्य तीर्थ पर जाने की जरूरत नहीं मानी जाती।
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निरंतर प्रवाहित होती थी सरस्वती, आठ थी सहायक नदियां
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव उपेंद्र सिंघल के मुताबिक प्राचीन समय में इस क्षेत्र से जहां सरस्वती मुख्य व सदैव बहने वाली नदी थी तो वहीं इसकी सहायक आठ नदियां थी, जिनमें वैतरणी, आपगा, गंगा-मंदाकिनी, मधुस्रवा, वासुनदी, कौशिक, दृष्यदवती व हिरण्वती शामिल है। सहायक नदियां वर्षाकाल में ही बहती थी। इनका जिक्र वामन पुराण में भी माना जाता है। महाभारत के वन पर्व व शल्य पर्व में भी सरस्वती नदी का विशद वर्णन मिलता है। मनुस्मृति में सरस्वती एवं दृश्यदवती नदियों के बीच के क्षेत्र को ही कुरुक्षेत्र कहा गया है। पुरातत्ववेताओं ने प्रदेश में ही सरस्वती व उसकी सहायक नदियों के तटों से 558 स्थल आद्य हड़प्पा कालीन संस्कृति के, 114 स्थल विकसित हड़प्पा संस्कृति के तथा 1168 उत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृति केंद्र खोजे जा चुके हैं। हरियाणा से गुजरात तक 2378 पुरातात्विक स्थल मिलते हैं। इससे कुरुक्षेत्र भूमि में बड़ी संख्या में तीर्थों की उपस्थिति की संभावना जताई जा रही है। यह भी संभव है कि सरस्वती के घाटों पर अनेक स्थल कालांतर में तीर्थ रुप में परिणित हो गए होंगे।
सरस्वती किनारे ही अष्ट कोसी यात्रा : धुमन
सरस्वती हेरिटेज बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन किरमिच बताते हैं कि जीर्णोद्वार के बाद सरस्वती में करीब 400 किलोमीटर क्षेत्र में जल प्रवाहित होने लगा है। बारिश के सीजन में करीब 500 क्यूसिक तक इसमें जलस्तर रहा तो 60 करोड़ लीटर पानी रिचार्ज हुआ। सरस्वती के साथ अब इसके किनारे रहे प्राचीन मंदिरों का भी जीर्णोद्वार किया जा रहा है। यहां तक कि सरस्वती किनारे अष्टकोसी यात्रा भी फिर से शुरू की गई है।