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इनकी भक्ति से नहीं रहता मृत्यु का भय
अमर उजाला, करनाल
Updated Fri, 04 Oct 2013 12:15 AM IST
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करनाल के आर्य समाज मंदिर सेक्टर-13 में चल रहे वार्षिक उत्सव के चौथे दिन की शुरुआत आचार्य गवेंद्र शास्त्री के ब्रह्मत्व में यज्ञ से हुई।
यज्ञ के बाद भजनोपदेशक पंडित दिनेश दत्त ने बताया कि योगी अरविंद ने लिखा है कि जब मैं उपासना में बैठता हूं, तो मेरे सामने अनेक ऋषियों की आत्मा का अनुभव होता है और जब मैं और अधिक चिंतन करता हूं, तो मुझे उन सब ऋषियों से सबसे महान ऋषि दयानंद नजर आता है। यह थी योगी अरविंद की महर्षि दयानंद के प्रति श्रद्धांजलि।
प्रभु की भक्ति से मनुष्य का चार दुखों से निवारण हो जाता है। इनमें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि शामिल हैं। जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है।
यदि जन्म अपने हाथ में होता तो कोई भी गरीब के घर में जन्म न लेता। जन्म के साथ मृत्यु भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि प्रभु की उपासना और भक्ति करते रहे तो मृत्यु का भय नहीं रहेगा। कष्ट शरीर को होता है परंतु आत्मा को कष्ट नहीं दिया जा सकता।
आचार्य गवेंद्र शास्त्री ने कहा कि ज्ञान, कर्म और उपासना हमें मृत्यु के भय से बचाते हैं। भारतीय संस्कृति हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा देने वाली है। अपने से आयु में बड़ों के तजुर्बों का लाभ हमें लेना चाहिए। इहलोक और परलोक को सुधारने के लिए धर्म का रास्ता अपनाना चाहिए।
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इस मौके पर आर्य समाज सेक्टर-13 के प्रधान शांति प्रकाश आर्य, ओपी कुमार, बीएल आर्य, देशपाल ठाकुर, चौधरी छतर सिंह,राजपाल चौहान, सतिंद्र मोहन कुमार, भोपाल सिंह, सुमित्रा कुकरेजा, शकुंतला सुखीजा, सुदेश चोपड़ा, वीना गुप्ता, बिमला मान, प्रज्ञान मुनि, स्वामी सचिदानंद, बलबीर आर्य, अजय आर्य, आरके ठकुराल, अर्जुन देव वर्मा, क्षितिज आर्य, ओपी सचदेवा, सूरज गुलाटी आदि मौजूद थे।
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यज्ञ के बाद भजनोपदेशक पंडित दिनेश दत्त ने बताया कि योगी अरविंद ने लिखा है कि जब मैं उपासना में बैठता हूं, तो मेरे सामने अनेक ऋषियों की आत्मा का अनुभव होता है और जब मैं और अधिक चिंतन करता हूं, तो मुझे उन सब ऋषियों से सबसे महान ऋषि दयानंद नजर आता है। यह थी योगी अरविंद की महर्षि दयानंद के प्रति श्रद्धांजलि।
प्रभु की भक्ति से मनुष्य का चार दुखों से निवारण हो जाता है। इनमें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि शामिल हैं। जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है।
यदि जन्म अपने हाथ में होता तो कोई भी गरीब के घर में जन्म न लेता। जन्म के साथ मृत्यु भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि प्रभु की उपासना और भक्ति करते रहे तो मृत्यु का भय नहीं रहेगा। कष्ट शरीर को होता है परंतु आत्मा को कष्ट नहीं दिया जा सकता।
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आचार्य गवेंद्र शास्त्री ने कहा कि ज्ञान, कर्म और उपासना हमें मृत्यु के भय से बचाते हैं। भारतीय संस्कृति हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा देने वाली है। अपने से आयु में बड़ों के तजुर्बों का लाभ हमें लेना चाहिए। इहलोक और परलोक को सुधारने के लिए धर्म का रास्ता अपनाना चाहिए।
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इस मौके पर आर्य समाज सेक्टर-13 के प्रधान शांति प्रकाश आर्य, ओपी कुमार, बीएल आर्य, देशपाल ठाकुर, चौधरी छतर सिंह,राजपाल चौहान, सतिंद्र मोहन कुमार, भोपाल सिंह, सुमित्रा कुकरेजा, शकुंतला सुखीजा, सुदेश चोपड़ा, वीना गुप्ता, बिमला मान, प्रज्ञान मुनि, स्वामी सचिदानंद, बलबीर आर्य, अजय आर्य, आरके ठकुराल, अर्जुन देव वर्मा, क्षितिज आर्य, ओपी सचदेवा, सूरज गुलाटी आदि मौजूद थे।