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पारंपरिक खेलों में बेटियों ने दिखाया उत्साह
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संवाद न्यूज एजेंसी
मधुबन। राजकीय महिला महाविद्यालय बसताड़ा में सोमवार को पारंपरिक ग्रामीण खेलों का आयोजन हुआ। जिसमें कॉलेज की छात्राओं ने उत्साह से हिस्सा लिया। स्टापु सहित 10 खेल आयोजित किए गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रिंसिपल डॉ. पीयूष कुमार ने की। मुख्यातिथि के रूप में एडीसी डा. वैशाली शर्मा पहुंचीं। उन्होंने खुद स्टापु, गिल्ली डंडा और रस्सी कूद में हिस्सा लिया।
स्टापु : पारंपरिक ग्राम्य खेलों को एक प्रोत्साहन की ओर एक प्रयास के अंतर्गत हुए स्टापु, पोसमपा, पिट्ठू, ऊंच-नीच का पापड़ा, कंचा-गोली, गिल्ली डंडा, आंख मिचौली या आंधी मौसी, कोकला छिपाकी, रस्सी कूद आदि 10 खेलों में कुल 400 छात्राओं ने हिस्सा लिया। खेल संयोजक डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य विलुप्त होते भारतीय पारंपरिक ग्रामीण खेलों को पुनर्जीवित करना है। उन्होंने कहा कि इन खेलों के लिए ज्यादा संसाधनों की भी जरूरत नहीं है। जिस तरह से घर के आंगन में खेल सकते हैं। ठीक उसी तरह बिना ज्यादा खर्च के ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। भविष्य में इस तरह के खेल जिला और राज्य स्तर पर भी आयोजित किए जा सकते हैं।
होता है सांस्कृतिक विकास
एडीसी डॉ. वैशाली ने कहा कि पारंपरिक ग्रामीण खेल बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे बड़ी और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके लिए आधुनिक खेलों जितना खर्च और संसाधन जुटाने की जरूरत नहीं है।
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मधुबन। राजकीय महिला महाविद्यालय बसताड़ा में सोमवार को पारंपरिक ग्रामीण खेलों का आयोजन हुआ। जिसमें कॉलेज की छात्राओं ने उत्साह से हिस्सा लिया। स्टापु सहित 10 खेल आयोजित किए गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रिंसिपल डॉ. पीयूष कुमार ने की। मुख्यातिथि के रूप में एडीसी डा. वैशाली शर्मा पहुंचीं। उन्होंने खुद स्टापु, गिल्ली डंडा और रस्सी कूद में हिस्सा लिया।
स्टापु : पारंपरिक ग्राम्य खेलों को एक प्रोत्साहन की ओर एक प्रयास के अंतर्गत हुए स्टापु, पोसमपा, पिट्ठू, ऊंच-नीच का पापड़ा, कंचा-गोली, गिल्ली डंडा, आंख मिचौली या आंधी मौसी, कोकला छिपाकी, रस्सी कूद आदि 10 खेलों में कुल 400 छात्राओं ने हिस्सा लिया। खेल संयोजक डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य विलुप्त होते भारतीय पारंपरिक ग्रामीण खेलों को पुनर्जीवित करना है। उन्होंने कहा कि इन खेलों के लिए ज्यादा संसाधनों की भी जरूरत नहीं है। जिस तरह से घर के आंगन में खेल सकते हैं। ठीक उसी तरह बिना ज्यादा खर्च के ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। भविष्य में इस तरह के खेल जिला और राज्य स्तर पर भी आयोजित किए जा सकते हैं।
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होता है सांस्कृतिक विकास
एडीसी डॉ. वैशाली ने कहा कि पारंपरिक ग्रामीण खेल बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे बड़ी और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके लिए आधुनिक खेलों जितना खर्च और संसाधन जुटाने की जरूरत नहीं है।
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