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Karnal News: आयुष्मान का 60 करोड़ का भुगतान अटका, अस्पताल रोक सकते हैं इलाज
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करनाल। आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों की आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। योजना के तहत इलाज करने वाले 25 से अधिक निजी अस्पतालों का करीब 60 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। लंबे समय से भुगतान नहीं मिलने से अस्पताल संचालकों में नाराजगी बढ़ रही है और अब 10 सितंबर के बाद आयुष्मान योजना के तहत इलाज बंद करने को लेकर मंथन शुरू हो गया है। यदि निजी अस्पतालों ने इलाज रोकने का फैसला लिया तो इसका सीधा असर आयुष्मान कार्डधारक मरीजों पर पड़ सकता है।
निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस उपचार उपलब्ध कराना है। ऐसे में निजी अस्पतालों की ओर से योजना के तहत सेवाएं रोकने का फैसला मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर गंभीर बीमारी, ऑपरेशन और लंबे इलाज की जरूरत वाले मरीजों के सामने विकल्प सीमित हो सकते हैं।
अस्पताल संचालकों की मुख्य चिंता योजना के तहत किए गए इलाज के बदले मिलने वाले भुगतान को लेकर है। अस्पतालों में मरीज का इलाज, दवाइयां, जांच, चिकित्सकीय स्टाफ और अन्य संसाधनों पर खर्च पहले होता है, जबकि योजना के तहत निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद भुगतान मिलता है। लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने से अस्पतालों की कार्यशील पूंजी प्रभावित होने की बात सामने आ रही है।
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इसी के चलते अब निजी अस्पतालों में इस बात पर विचार किया जा रहा है कि यदि 10 सितंबर तक भुगतान संबंधी स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो आयुष्मान योजना के तहत इलाज जारी रखा जाए या नहीं। हालांकि अभी इसे सभी अस्पतालों का अंतिम और सामूहिक फैसला नहीं माना जा सकता।
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आईएमए ने कहा- सामूहिक फैसला नहीं
मामले में आईएमए की भूमिका को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो गई है। आईएमए के जिला प्रधान डॉ. सलिल गुप्ता ने कहा कि इस मामले में आईएमए सीधे तौर पर शामिल नहीं है। आयुष्मान योजना के तहत अस्पताल का पैनलमेंट और योजना में इलाज जारी रखने अथवा बंद करने का फैसला संबंधित डॉक्टर या अस्पताल अपने स्तर पर करता है। इसका मतलब यह है कि 10 सितंबर के बाद इलाज बंद करने का निर्णय आईएमए के बैनर तले सामूहिक रूप से नहीं होगा, बल्कि जिन अस्पतालों का आयुष्मान योजना के तहत पैनलमेंट है, वे अपनी आर्थिक स्थिति और लंबित भुगतान को देखते हुए व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय ले सकते हैं।
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मरीजों के सामने विकल्प
अगर कुछ निजी अस्पताल आयुष्मान के तहत इलाज लेना बंद करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल उन मरीजों को लेकर होगा जो पहले से उपचाराधीन हैं। साथ ही नए मरीजों को भी सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस उपचार मिलने में दिक्कत आ सकती है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों पर भी मरीजों का अतिरिक्त दबाव बढ़ने की संभावना रहेगी। सीएमओ डॉ. पूनम चौधरी ने कहा कि यदि निजी अस्पताल इलाज बंद करते हैं तो जिला अस्पताल में पर्याप्त व्यवस्था कराई जाएगी। जिससे किसी भी गंभीर मरीज को आयुष्मान के तहत इलाज मिल सकेगा।
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निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस उपचार उपलब्ध कराना है। ऐसे में निजी अस्पतालों की ओर से योजना के तहत सेवाएं रोकने का फैसला मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर गंभीर बीमारी, ऑपरेशन और लंबे इलाज की जरूरत वाले मरीजों के सामने विकल्प सीमित हो सकते हैं।
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अस्पताल संचालकों की मुख्य चिंता योजना के तहत किए गए इलाज के बदले मिलने वाले भुगतान को लेकर है। अस्पतालों में मरीज का इलाज, दवाइयां, जांच, चिकित्सकीय स्टाफ और अन्य संसाधनों पर खर्च पहले होता है, जबकि योजना के तहत निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद भुगतान मिलता है। लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने से अस्पतालों की कार्यशील पूंजी प्रभावित होने की बात सामने आ रही है।
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इसी के चलते अब निजी अस्पतालों में इस बात पर विचार किया जा रहा है कि यदि 10 सितंबर तक भुगतान संबंधी स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो आयुष्मान योजना के तहत इलाज जारी रखा जाए या नहीं। हालांकि अभी इसे सभी अस्पतालों का अंतिम और सामूहिक फैसला नहीं माना जा सकता।
आईएमए ने कहा- सामूहिक फैसला नहीं
मामले में आईएमए की भूमिका को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो गई है। आईएमए के जिला प्रधान डॉ. सलिल गुप्ता ने कहा कि इस मामले में आईएमए सीधे तौर पर शामिल नहीं है। आयुष्मान योजना के तहत अस्पताल का पैनलमेंट और योजना में इलाज जारी रखने अथवा बंद करने का फैसला संबंधित डॉक्टर या अस्पताल अपने स्तर पर करता है। इसका मतलब यह है कि 10 सितंबर के बाद इलाज बंद करने का निर्णय आईएमए के बैनर तले सामूहिक रूप से नहीं होगा, बल्कि जिन अस्पतालों का आयुष्मान योजना के तहत पैनलमेंट है, वे अपनी आर्थिक स्थिति और लंबित भुगतान को देखते हुए व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय ले सकते हैं।
मरीजों के सामने विकल्प
अगर कुछ निजी अस्पताल आयुष्मान के तहत इलाज लेना बंद करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल उन मरीजों को लेकर होगा जो पहले से उपचाराधीन हैं। साथ ही नए मरीजों को भी सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस उपचार मिलने में दिक्कत आ सकती है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों पर भी मरीजों का अतिरिक्त दबाव बढ़ने की संभावना रहेगी। सीएमओ डॉ. पूनम चौधरी ने कहा कि यदि निजी अस्पताल इलाज बंद करते हैं तो जिला अस्पताल में पर्याप्त व्यवस्था कराई जाएगी। जिससे किसी भी गंभीर मरीज को आयुष्मान के तहत इलाज मिल सकेगा।