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Karnal News: नहाय-खाय से शुरू हुआ छठ महापर्व, श्रद्धालुओं में उत्साह
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- सात को होने वाले कार्यक्रम के लिए तैयारी जोरों पर
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। कर्ण नगरी में छठ पर्व का आगाज मंगलवार को नहाय-खाय के साथ हो गया है। श्रद्धालुओं ने लौकी की सब्जी, चने की दाल और चावल का भोग लगाकर स्वयं भोजन किया। श्रद्धालुओं ने खाना बनाने को लेकर शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा। वहीं बाजार में पूजन सामग्री, सिंघाड़ा, नींबू और गन्ने सहित अन्य पूजन सामग्री की खरीद बढ़ गई है। श्रद्धालु उत्साह के साथ तैयारी में जुटे हैं।
चार दिवसीय महापर्व का आगाज मंगलवार को हो गया है, जिसको लेकर व्रतियों में उत्साह देखने को मिल रहा है। बुधवार छह नवंबर को खरना होगा, जिसमें शाम के समय व्रती छठी मैया को गुड़ की खीर और रोटी का भोग लगाकर स्वयं भी वही प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होगा। सात नवंबर को पश्चिमी यमुना नहर किनारे मेले जैसा माहौल रहेगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु सूर्य को संध्या अर्घ्य देने पहुंचेंगे। यहां श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय संस्था द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा, जिसमें मुख्यातिथि के तौर पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पहुंचेंगे। सात नवंबर को होने वाले कार्यक्रम को लेकर संस्था की ओर से तैयारियां जोरों पर हैं।
समिति के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत तब हुई थी, जब भगवान राम और माता सीता वनवास से अयोध्या लौटे थे। उनके सम्मान में लोगों ने उपवास रखा और सूर्य देव की पूजा की तभी से इस पर्व की परंपरा चली आ रही है। भारत के प्राचीन त्योहारों में से एक त्योहार श्री सूर्य षष्ठी है, जिसे छठ महापर्व भी कहा जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है। छठ पूजा के इन चार दिनों तक व्रत से जुड़े कई नियमों का पालन किया जाता है। नहाय-खाय के दिन व्रती सात्विक आहार ग्रहण कर खुद को पावन और पवित्र छठ पूजा के लिए तैयार करते हैं।
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मिट्टी के चूल्हे पर बनेगा खरना का प्रसाद
खरना का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से साठी-चावल दूध और गुड़ से तैयार किया जाएगा। प्रसाद को सूर्य देव को भोग लगाकर ग्रहण किया जाएगा। इसके बाद वीरवार को पूरा दिन व रात अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। इसके अगले दिन वीरवार की सुबह से लेकर दिन भर अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे और सांयकालीन अस्त होते सूर्य को तालाब या नदी में अर्घ्य देंगे। अर्घ्य में प्रसाद के रूप में ठेंकूवा, ईख, गुना, मौसमी फल, सीताफल, मूली, हल्दी, अदरक, सोने-चांदी, पीतल एवं बांस के छाज-सूप आदि में रखकर अर्घ्य देंगे।
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। कर्ण नगरी में छठ पर्व का आगाज मंगलवार को नहाय-खाय के साथ हो गया है। श्रद्धालुओं ने लौकी की सब्जी, चने की दाल और चावल का भोग लगाकर स्वयं भोजन किया। श्रद्धालुओं ने खाना बनाने को लेकर शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा। वहीं बाजार में पूजन सामग्री, सिंघाड़ा, नींबू और गन्ने सहित अन्य पूजन सामग्री की खरीद बढ़ गई है। श्रद्धालु उत्साह के साथ तैयारी में जुटे हैं।
चार दिवसीय महापर्व का आगाज मंगलवार को हो गया है, जिसको लेकर व्रतियों में उत्साह देखने को मिल रहा है। बुधवार छह नवंबर को खरना होगा, जिसमें शाम के समय व्रती छठी मैया को गुड़ की खीर और रोटी का भोग लगाकर स्वयं भी वही प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होगा। सात नवंबर को पश्चिमी यमुना नहर किनारे मेले जैसा माहौल रहेगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु सूर्य को संध्या अर्घ्य देने पहुंचेंगे। यहां श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय संस्था द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा, जिसमें मुख्यातिथि के तौर पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पहुंचेंगे। सात नवंबर को होने वाले कार्यक्रम को लेकर संस्था की ओर से तैयारियां जोरों पर हैं।
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समिति के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत तब हुई थी, जब भगवान राम और माता सीता वनवास से अयोध्या लौटे थे। उनके सम्मान में लोगों ने उपवास रखा और सूर्य देव की पूजा की तभी से इस पर्व की परंपरा चली आ रही है। भारत के प्राचीन त्योहारों में से एक त्योहार श्री सूर्य षष्ठी है, जिसे छठ महापर्व भी कहा जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है। छठ पूजा के इन चार दिनों तक व्रत से जुड़े कई नियमों का पालन किया जाता है। नहाय-खाय के दिन व्रती सात्विक आहार ग्रहण कर खुद को पावन और पवित्र छठ पूजा के लिए तैयार करते हैं।
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मिट्टी के चूल्हे पर बनेगा खरना का प्रसाद
खरना का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से साठी-चावल दूध और गुड़ से तैयार किया जाएगा। प्रसाद को सूर्य देव को भोग लगाकर ग्रहण किया जाएगा। इसके बाद वीरवार को पूरा दिन व रात अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। इसके अगले दिन वीरवार की सुबह से लेकर दिन भर अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे और सांयकालीन अस्त होते सूर्य को तालाब या नदी में अर्घ्य देंगे। अर्घ्य में प्रसाद के रूप में ठेंकूवा, ईख, गुना, मौसमी फल, सीताफल, मूली, हल्दी, अदरक, सोने-चांदी, पीतल एवं बांस के छाज-सूप आदि में रखकर अर्घ्य देंगे।