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आत्महत्या से पहले अखिल ने कंट्रोल रूम किया था तीन बार फोन!
करनाल
Updated Sat, 15 Feb 2014 12:21 AM IST
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सामाजिक संस्था फाइट फॉर जस्टिस क्लब ऑफ इंडिया के चेयरमैन एडवोकेट हरीश आर्य ने दावा किया अखिल ने आत्महत्या से पहले तीन बार पुलिस कंट्रोल रूम में फोन किया था।
पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात पुलिस कर्मियों और अखिल के बीच निश्चित तौर पर प्रताड़ना संबंधित बातचीत हुई होगी। इसके बावजूद पुलिस ने अखिल के फोन को गंभीरता से नहीं लिया। एडवोकेट हरीश आर्य अखिल पक्ष की ओर से केस की पैरवी करने वाले एडवोकेट्स पैनल में शामिल हैं।
उन्होंने ज्यूरी सिस्टम लागू किए जाने की मांग करते हुए अखिल चौहान आत्महत्या मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाया है। उन्होंने कहा कि भविष्य में कोई भी अखिल की तरह पुलिस प्रताड़ना का शिकार न हो, इसके लिए प्रशासन को व्यवस्था में सुधार करना होगा।
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पंजाब पुलिस रुल्स का हवाला देते हुए एडवोकेट आर्य ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी को प्रतिदिन जांच अमल में लानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से मामले की जांच चल रही है, उससे नहीं लगता कि इंसाफ मिलेगा।
अखिल के वकील ने उठाए सवाल
अखिल चौहान पक्ष के वकील कर्ण सिंह राणा व एडवोकेट हरीश आर्य ने इस प्रकरण में कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने पहला सवाल उठाया कि अखिल के खिलाफ 10 सितंबर 2013 को थाना सिविल लाइन में लड़की के माता-पिता द्वारा केस दर्ज कराया गया था।
हाईकोर्ट अपने आदेश में स्पष्ट कर चुका है कि मुकदमा खत्म किया जाए। मुकदमे को पुलिस ने अब तक खारिज किया या नहीं। यदि नहीं तो क्यों? उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट के आदेशों पर अमल होता तो अखिल को जान नहीं देनी पड़ती। दूसरा सवाल उन्होंने उठाया कि आठ और 14 जनवरी 2013 को थाना सिविल लाइन में अखिल और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत जो केस दर्ज किए गए थे, क्या पुलिस ने मुकदमों की तफ्तीश पंजाब पुलिस नियमावली व दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार की? नियमानुसार मुकदमे की जांच रोजाना की जानी चाहिए थी। युवती ने हाईकोर्ट में शादी होने की बात कबूल की थी तो यह केस दर्ज ही नहीं होना चाहिए था। फिर भी जांच का ड्रामा किया गया।
एडवोकेट आर्य ने पुलिस के समक्ष तीसरा सवाल रखा कि मामलों के निस्तारण और पब्लिक की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए करनाल पुलिस द्वारा कम्युनिटी लाइजीनिंग पुलिस (सीएलजी) का गठन किया गया है। यह मामला सीएलजी को क्यों नहीं भेजा गया, जबिक सिविल लाइन थाना परिसर में ही सीएलजी का कार्यालय है।
चौथा प्रश्न है कि अखिल चौहान ने सुसाइड करने से पहले तीन बार कंट्रोल रूम (100) नंबर पर फोन किया। किस वहज से किया, क्या बात हुई और पुलिस हरकत में क्यों नहीं आई? पुलिस चाहती तो अखिल की जान बचा सकती थी। पुलिस कंट्रोल रूम, सेक्टर-13 चौकी व घटना स्थल के बीच कुछ ही दूरी है, फिर भी कोई प्रयास नहीं हुआ, जबकि नागरिकों ने परिजनों को सूचना दी, जिन्होंने बाद में अखिल को अस्पताल पहुंचाया। 16 जनवरी 2014 को आईजी से न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायत पत्र दिया गया था, उसे भी जांच में साक्ष्य के तौर पर क्यों नहीं रखा जा रहा है।
प्रिया वर्मा को न्यायिक हिरासत में भेजा जेल
करनाल। मामले की आरोपी और अखिल की पत्नी प्रिया वर्मा को पुलिस रिमांड खत्म होने से पहले ही शुक्रवार को अदालत में पेश कर दिया गया। प्रिया का पुलिस रिमांड 15 फरवरी को समाप्त होना था। पेश करने के सवाल पर पुलिस ने दलील दी कि प्रिया से पूछताछ पूरी हो चुकी है, इसलिए आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजा जाए। अदालत ने पुलिस की इस दलील को मानते हुए प्रिया वर्मा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
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पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात पुलिस कर्मियों और अखिल के बीच निश्चित तौर पर प्रताड़ना संबंधित बातचीत हुई होगी। इसके बावजूद पुलिस ने अखिल के फोन को गंभीरता से नहीं लिया। एडवोकेट हरीश आर्य अखिल पक्ष की ओर से केस की पैरवी करने वाले एडवोकेट्स पैनल में शामिल हैं।
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उन्होंने ज्यूरी सिस्टम लागू किए जाने की मांग करते हुए अखिल चौहान आत्महत्या मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाया है। उन्होंने कहा कि भविष्य में कोई भी अखिल की तरह पुलिस प्रताड़ना का शिकार न हो, इसके लिए प्रशासन को व्यवस्था में सुधार करना होगा।
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पंजाब पुलिस रुल्स का हवाला देते हुए एडवोकेट आर्य ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी को प्रतिदिन जांच अमल में लानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से मामले की जांच चल रही है, उससे नहीं लगता कि इंसाफ मिलेगा।
अखिल के वकील ने उठाए सवाल
अखिल चौहान पक्ष के वकील कर्ण सिंह राणा व एडवोकेट हरीश आर्य ने इस प्रकरण में कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने पहला सवाल उठाया कि अखिल के खिलाफ 10 सितंबर 2013 को थाना सिविल लाइन में लड़की के माता-पिता द्वारा केस दर्ज कराया गया था।
हाईकोर्ट अपने आदेश में स्पष्ट कर चुका है कि मुकदमा खत्म किया जाए। मुकदमे को पुलिस ने अब तक खारिज किया या नहीं। यदि नहीं तो क्यों? उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट के आदेशों पर अमल होता तो अखिल को जान नहीं देनी पड़ती। दूसरा सवाल उन्होंने उठाया कि आठ और 14 जनवरी 2013 को थाना सिविल लाइन में अखिल और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत जो केस दर्ज किए गए थे, क्या पुलिस ने मुकदमों की तफ्तीश पंजाब पुलिस नियमावली व दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार की? नियमानुसार मुकदमे की जांच रोजाना की जानी चाहिए थी। युवती ने हाईकोर्ट में शादी होने की बात कबूल की थी तो यह केस दर्ज ही नहीं होना चाहिए था। फिर भी जांच का ड्रामा किया गया।
एडवोकेट आर्य ने पुलिस के समक्ष तीसरा सवाल रखा कि मामलों के निस्तारण और पब्लिक की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए करनाल पुलिस द्वारा कम्युनिटी लाइजीनिंग पुलिस (सीएलजी) का गठन किया गया है। यह मामला सीएलजी को क्यों नहीं भेजा गया, जबिक सिविल लाइन थाना परिसर में ही सीएलजी का कार्यालय है।
चौथा प्रश्न है कि अखिल चौहान ने सुसाइड करने से पहले तीन बार कंट्रोल रूम (100) नंबर पर फोन किया। किस वहज से किया, क्या बात हुई और पुलिस हरकत में क्यों नहीं आई? पुलिस चाहती तो अखिल की जान बचा सकती थी। पुलिस कंट्रोल रूम, सेक्टर-13 चौकी व घटना स्थल के बीच कुछ ही दूरी है, फिर भी कोई प्रयास नहीं हुआ, जबकि नागरिकों ने परिजनों को सूचना दी, जिन्होंने बाद में अखिल को अस्पताल पहुंचाया। 16 जनवरी 2014 को आईजी से न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायत पत्र दिया गया था, उसे भी जांच में साक्ष्य के तौर पर क्यों नहीं रखा जा रहा है।
प्रिया वर्मा को न्यायिक हिरासत में भेजा जेल
करनाल। मामले की आरोपी और अखिल की पत्नी प्रिया वर्मा को पुलिस रिमांड खत्म होने से पहले ही शुक्रवार को अदालत में पेश कर दिया गया। प्रिया का पुलिस रिमांड 15 फरवरी को समाप्त होना था। पेश करने के सवाल पर पुलिस ने दलील दी कि प्रिया से पूछताछ पूरी हो चुकी है, इसलिए आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजा जाए। अदालत ने पुलिस की इस दलील को मानते हुए प्रिया वर्मा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।