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मंडी में पंखा लगाने को लेकर विवाद, मिलर्स ने दी हड़ताल की चेतावनी
Updated Fri, 05 Oct 2018 11:57 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
करनाल । एक अक्टूबर से शुरू हुए धान सीजन को लेकर लगातार मंडियों में विवाद सामने आ रहे हैं। पहले जहां किसानों और आढ़तियों की शिकायत थी कि खरीद सुचारू रूप से नहीं हो रही है और किसानों को पूरा रेट नहीं मिल रहा है। अब धान पर पंखा लगाने को लेकर विवाद शुरू हो गया है। शुक्रवार को दिनभर पंखे को लेकर आढ़ती और मिलर्स आमने-सामने नजर आए। हालांकि, बताया ये गया कि मजदूरों ने पंखा लगाने से इनकार कर दिया। उधर, सुबह से ही मिलर्स ने भी पंखा लगाने की मांग करते हुए हड़ताल की चेतावनी दे डाली। हड़ताल की सूचना मिलते ही प्रशासन की सांसें फूल गई और आनन फानन में आढ़तियों और मिलर्स के साथ बैठक की। दिनभर धान की खरीद बंद के बराबर रही, इसके बाद शाम को सहमति होने के बाद खरीद सुचारु हुई।
शुक्रवार सुबह मजदूरों ने धान पर पंखा लगाने से इनकार कर दिया। उधर, मिलर्स धान पर पंखा लगाने पर अड़ गए। धान की खरीद शुरू होने से पहले ही विवाद होने के कारण किसान परेशान हो गए। दोपहर तक मामले ने तूल पकड़ लिया और आढ़ती और मिलर्स आमने सामने हो गए। एक तरफ किसान और आढ़तियों ने कहा कि पंखा नहीं लगना चाहिए, इससे किसान और आढ़ती दोनों को नुकसान होता है। साथ ही मजदूरों को भी इससे परेशानी उठानी पड़ती है। उधर, राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान विनोद गोयल की अध्यक्षता में मिलर्स ने बैठक करके हड़ताल की चेतावनी दी और खरीद नहीं की। हड़ताल की सूचना मिलते ही प्रशासनिक अधिकारियों के पसीने छूटने लगे। बाद में मार्केट कमेटी सचिव सुरेंद्र सिंह, डीएफएससी कुशल बूरा ने मिलर्स और आढ़तियों के साथ बैठक करके समाधान की कोशिश की। शाम तक मिलर्स और मजदूरों को समझाया और धान की खरीद सुचारु कराई। हालांकि, शुक्रवार को दिनभर खरीद काफी कम रही। कुछेक ही राइस मिलर्स ने ही धान खरीदा।
क्या है पंखा विवाद
मंडी में किसान धान लाते हैं और इस पर मजदूर पंखा लगाकर सफाई करते हैं। इसमें किसानों को नुकसान होता है और भूसे के साथ साथ किसानों के धान भी कम हो जाता है। दूसरा इस प्रोसेस में मजदूरों को परेशानी होती है और इसके बदले मजदूरों को पैसे मिलते हैं, 3 रुपये 40 पैसे प्रति क्विंटल मिलते हैं। इसके अलावा, आढ़ती भी नहीं चाहते कि धान पर पंखा लगे। दूसरी ओर, मिलर्स इसका विरोध करते हैं और कहते हैं कि धान को वे साफ करके ही लेंगे। मिलर्स का कहना होता है कि एक क्विंटल धान के बदले सरकार को 67 किलोग्राम धान देना होता है। इसलिए वे धान के साथ कूड़ा नहीं खरीद सकते।
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राइस मिल में मिला बिहार के धान का स्टाक, हड़कंप
800 कट्टों को सील करने के आदेश, बड़ी गड़बड़ी की आशंका
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। धान सीजन शुरू होने से पहले ही मिलर्स दूसरे प्रदेशों से चावल लाकर मिलों में स्टाक करने लगे हैं। इसका खुलासा एसडीएम की छापेमारी के दौरान हुआ। गऊशाला रोड स्थित गोबिंद फूड्स पर जब एसडीएम नरेंद्र मलिक ने जांच की तो मिल के अंदर बिहार की मुहर लगे चावल के 800 बैग बरामद किए। इसके बाद टीम ने सभी बैगों को सील कर दिया। साथ ही मामले की जांच के आदेश दिए। उधर, प्रशासन की इस रेड से अन्य मिलर्स में हड़कंप मच गया।
बता दें कि इससे पहले भी प्रशासन के पास शिकायत पहुंची थी कि सीजन से पहले ही मिलर्स पंजाब, यूपी व बिहार से चावल लाकर मिलों में स्टाक कर रहे हैं। इससे बड़े घोटाले की आशंका पनप रही है। शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करते हुए एसडीएम नरेंद्र मलिक ने गऊशाला रोड पर गोबिंद फूडस पर छापेमारी की। जांच के दौरान मिल के अंदर बिहार के चावल के 800 कट्टे मिले। इस पर एसडीएम ने डीएफएससी को मौके पर बुलाया और बैग को सील करने के निर्देश दिए। इस बारे में डीएफएससी कुशल बूरा ने कहा कि जांच के दौरान मिल के अंदर 800 चावल के कट्टे मिले हैं। कट्टों पर बिहार मैन्युफेचरिंग की मुहर लगी है। अगर कहीं पर और भी शिकायत आती है तो वहां पर भी जांच की जाएगी। किसी को भी पहले से स्टाक नहीं करने दिया जाएगा।
यूं होती है गड़बड़ी
बता दें कि मोटा धान किसानों से सरकार खरीदती है। सरकार इस धान को मिलर्स को दे देती है और इसके बाद मिलर्स को सरकार 100 किलोग्राम धान में से 67 किलोग्राम चावल देना होता है। कुछ मिलर्स पहले से ही सस्ते दामों पर यूपी, बिहार व पंजाब आदि राज्यों से चावल खरीद लेते हैं और पहले ही स्टाक कर लेते हैं। यही चावल वे सरकार को वापस करते हैं और इसके बदले सरकार ने सरकारी रेट वसूल करते हैं। इसके बाद सरकार से लिए धान से बने चावल को दूसरे प्रदेशों में महंगे दामों पर बेच देते हैं। कई मिलर्स ऐसे भी हैं, जो सरकार से धान तो ले लेते हैं,लेकिन करोड़ों रुपये का चावल सरकार का वापस नहीं देतेे हैं। करनाल के करीब 25 राइस मिलर्स ऐसे हैं, जिन पर करीब 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारी है।
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करनाल । एक अक्टूबर से शुरू हुए धान सीजन को लेकर लगातार मंडियों में विवाद सामने आ रहे हैं। पहले जहां किसानों और आढ़तियों की शिकायत थी कि खरीद सुचारू रूप से नहीं हो रही है और किसानों को पूरा रेट नहीं मिल रहा है। अब धान पर पंखा लगाने को लेकर विवाद शुरू हो गया है। शुक्रवार को दिनभर पंखे को लेकर आढ़ती और मिलर्स आमने-सामने नजर आए। हालांकि, बताया ये गया कि मजदूरों ने पंखा लगाने से इनकार कर दिया। उधर, सुबह से ही मिलर्स ने भी पंखा लगाने की मांग करते हुए हड़ताल की चेतावनी दे डाली। हड़ताल की सूचना मिलते ही प्रशासन की सांसें फूल गई और आनन फानन में आढ़तियों और मिलर्स के साथ बैठक की। दिनभर धान की खरीद बंद के बराबर रही, इसके बाद शाम को सहमति होने के बाद खरीद सुचारु हुई।
शुक्रवार सुबह मजदूरों ने धान पर पंखा लगाने से इनकार कर दिया। उधर, मिलर्स धान पर पंखा लगाने पर अड़ गए। धान की खरीद शुरू होने से पहले ही विवाद होने के कारण किसान परेशान हो गए। दोपहर तक मामले ने तूल पकड़ लिया और आढ़ती और मिलर्स आमने सामने हो गए। एक तरफ किसान और आढ़तियों ने कहा कि पंखा नहीं लगना चाहिए, इससे किसान और आढ़ती दोनों को नुकसान होता है। साथ ही मजदूरों को भी इससे परेशानी उठानी पड़ती है। उधर, राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान विनोद गोयल की अध्यक्षता में मिलर्स ने बैठक करके हड़ताल की चेतावनी दी और खरीद नहीं की। हड़ताल की सूचना मिलते ही प्रशासनिक अधिकारियों के पसीने छूटने लगे। बाद में मार्केट कमेटी सचिव सुरेंद्र सिंह, डीएफएससी कुशल बूरा ने मिलर्स और आढ़तियों के साथ बैठक करके समाधान की कोशिश की। शाम तक मिलर्स और मजदूरों को समझाया और धान की खरीद सुचारु कराई। हालांकि, शुक्रवार को दिनभर खरीद काफी कम रही। कुछेक ही राइस मिलर्स ने ही धान खरीदा।
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क्या है पंखा विवाद
मंडी में किसान धान लाते हैं और इस पर मजदूर पंखा लगाकर सफाई करते हैं। इसमें किसानों को नुकसान होता है और भूसे के साथ साथ किसानों के धान भी कम हो जाता है। दूसरा इस प्रोसेस में मजदूरों को परेशानी होती है और इसके बदले मजदूरों को पैसे मिलते हैं, 3 रुपये 40 पैसे प्रति क्विंटल मिलते हैं। इसके अलावा, आढ़ती भी नहीं चाहते कि धान पर पंखा लगे। दूसरी ओर, मिलर्स इसका विरोध करते हैं और कहते हैं कि धान को वे साफ करके ही लेंगे। मिलर्स का कहना होता है कि एक क्विंटल धान के बदले सरकार को 67 किलोग्राम धान देना होता है। इसलिए वे धान के साथ कूड़ा नहीं खरीद सकते।
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राइस मिल में मिला बिहार के धान का स्टाक, हड़कंप
800 कट्टों को सील करने के आदेश, बड़ी गड़बड़ी की आशंका
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। धान सीजन शुरू होने से पहले ही मिलर्स दूसरे प्रदेशों से चावल लाकर मिलों में स्टाक करने लगे हैं। इसका खुलासा एसडीएम की छापेमारी के दौरान हुआ। गऊशाला रोड स्थित गोबिंद फूड्स पर जब एसडीएम नरेंद्र मलिक ने जांच की तो मिल के अंदर बिहार की मुहर लगे चावल के 800 बैग बरामद किए। इसके बाद टीम ने सभी बैगों को सील कर दिया। साथ ही मामले की जांच के आदेश दिए। उधर, प्रशासन की इस रेड से अन्य मिलर्स में हड़कंप मच गया।
बता दें कि इससे पहले भी प्रशासन के पास शिकायत पहुंची थी कि सीजन से पहले ही मिलर्स पंजाब, यूपी व बिहार से चावल लाकर मिलों में स्टाक कर रहे हैं। इससे बड़े घोटाले की आशंका पनप रही है। शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करते हुए एसडीएम नरेंद्र मलिक ने गऊशाला रोड पर गोबिंद फूडस पर छापेमारी की। जांच के दौरान मिल के अंदर बिहार के चावल के 800 कट्टे मिले। इस पर एसडीएम ने डीएफएससी को मौके पर बुलाया और बैग को सील करने के निर्देश दिए। इस बारे में डीएफएससी कुशल बूरा ने कहा कि जांच के दौरान मिल के अंदर 800 चावल के कट्टे मिले हैं। कट्टों पर बिहार मैन्युफेचरिंग की मुहर लगी है। अगर कहीं पर और भी शिकायत आती है तो वहां पर भी जांच की जाएगी। किसी को भी पहले से स्टाक नहीं करने दिया जाएगा।
यूं होती है गड़बड़ी
बता दें कि मोटा धान किसानों से सरकार खरीदती है। सरकार इस धान को मिलर्स को दे देती है और इसके बाद मिलर्स को सरकार 100 किलोग्राम धान में से 67 किलोग्राम चावल देना होता है। कुछ मिलर्स पहले से ही सस्ते दामों पर यूपी, बिहार व पंजाब आदि राज्यों से चावल खरीद लेते हैं और पहले ही स्टाक कर लेते हैं। यही चावल वे सरकार को वापस करते हैं और इसके बदले सरकार ने सरकारी रेट वसूल करते हैं। इसके बाद सरकार से लिए धान से बने चावल को दूसरे प्रदेशों में महंगे दामों पर बेच देते हैं। कई मिलर्स ऐसे भी हैं, जो सरकार से धान तो ले लेते हैं,लेकिन करोड़ों रुपये का चावल सरकार का वापस नहीं देतेे हैं। करनाल के करीब 25 राइस मिलर्स ऐसे हैं, जिन पर करीब 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारी है।