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करनाल: 506 साल पूर्व कर्ण नगरी के ठठियारा मोहल्ले में आए थे गुरु नानक देव, दिया था जनकल्याण का संदेश
Fri, 19 Nov 2021 02:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
गगन तलवार, अमर उजाला ब्यूरो, करनाल (हरियाणा)
गगन तलवार, अमर उजाला ब्यूरो, करनाल (हरियाणा)
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 19 Nov 2021 02:30 AM IST
सार
गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, अपनी चार उदासी में से पहली उदासी (धार्मिक यात्रा) के अंतिम चरण में गुरु नानक देव जी श्यामन (शाम गढ़) से होते हुए सितंबर 1515 में करनाल पहुंचे थे। यहां वे ठठियारा मोहल्ले के उस बगीचे में रुके।
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गुरु नानक जयंती
- फोटो : Facebook/Shri Guru Nanak Dev ji
विस्तार
506 साल पहले सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव कर्ण नगरी (करनाल) आए थे। इस दौरान उन्होंने कई दिन तक ठठियारा मोहल्ले में प्रवास कर आम जन को जनकल्याण का संदेश दिया था। लोगों को शांति, सद्भाव कायम करने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की राह दिखाई।
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ठठियारा मोहल्ले के जिस बगीचे में गुरु जी ने डेरा डाला था, आज उसी जगह पर गुरुद्वारा मंजी साहिब पहली पातशाही बना है। सराफा बाजार स्थित यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा संगत की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र स्थल पर गुरु अमर दास, गुरु हरकिशन और बाबा बंदा बहादुर भी आ चुके हैं।
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गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी अमृतपाल सिंह और प्रधान बलकार सिंह के अनुसार, अपनी चार उदासी में से पहली उदासी (धार्मिक यात्रा) के अंतिम चरण में गुरु नानक देव जी श्यामन (शाम गढ़) से होते हुए सितंबर 1515 में करनाल पहुंचे थे। यहां वे ठठियारा मोहल्ले के उस बगीचे में रुके। उस समय करनाल पर अब्बू अली शाह कलंदर का काफी प्रभाव था। शहर के लोग गुरु नानक देव जी के दर्शनों को आने लगे।
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इस बात का सैय्यद मुबारक अली शाह को पता चला तो उसने अपने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को इसकी सूचना दी। गुरु नानक देव जी के प्रभाव की कहानी सुनकर वे तिलमिला गए और करामात करने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनकी करामातों का असर गुरु नानक देव पर नहीं हो रहा है तो वे अपनी करामातों को छोड़कर पैदल चलकर गुरु जी के पास आए। यहां गुरु नानक देव जी ने पीर अब्बू अली शाह कलंदर को भी उपदेश दिया और दुनिया की भलाई के लिए प्रेरित किया।
ऐतिहासिक कुएं से आज भी निकलता है पवित्र जल
अपने प्रवास के दौरान गुरु नानक देव जी ने बगीचे में स्थित एक खुई (कुएं) पर स्नान किया था। जोकि आज भी यहां बने गुरुद्वारा में विराजमान है। बोहली साहिब के नाम से जानी जाने वाली खुई को गुरु नानक देव जी की चरण छू प्राप्त है। इस कुएं से निकलने वाले पवित्र जल से श्रद्धालु स्नान करते हैं और मन की मुरादें पाते हैं। गुरुद्वारे में संगत के ठहरने की भी पूरी व्यवस्था है। दूर-दराज से संगत माथा टेकने पहुंचती है।
बाबा बंदा सिंह बहादुर ने यहीं से स्थापित किया था जमींदारा राज
गुरु नानक देव जी के बाद इस पवित्र स्थान पर गुरु हरकिशन साहिब दिल्ली जाते हुए 1663 ई. में आए थे। तीसरे पातशाह गुरु अमर दास जी भी इस पवित्र स्थान पर आ चुके हैं। 1709 ई. में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने करनाल शहर को फतेह करके यहां जमींदारा राज स्थापित किया था। प्रधान और हेडग्रंथी के अनुसार, सभी गुरुओं की याद में ही यहां गुरुद्वारा स्थापित हुआ। शहर के मुख्य बाजार में स्थापित गुरुद्वारा में सुबह शाम गुरबाणी का पाठ और कीर्तन होता है। रोजाना श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है।