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बेसहारा लोगों के जख्मों में पड़े कीड़ों को अपने हाथों से साफ कर 42 लोगों को जीवन दान दे चुका है अपना आशियाना
Updated Sat, 09 Jun 2018 06:47 PM IST
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बेसहारा लोगों के जख्मों में पड़े कीड़ों को अपने हाथों से साफ कर 42 लोगों को जीवन दान दे चुका है अपना आशियाना
- 2016 में बनाया अपना आशियाना आश्रम, 1994 में राजकुमार की आंखों के सामने ही एक बेसहारा व्यक्ति की चली गई थी जान
- जो लोग जीने की आस ही छोड़ गए थे आज मौज-मस्ती कर रहे हैं आश्रम में, टाइम टेबल के अनुसार खाना-पीना और टीवी देखते हैं लोग
फोटो 13 से 17
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
जब किसी व्यक्ति के जख्मों में कीड़े पड़ जाते हैं तो अपने भी उनसे पीछा छुड़वा लेेते हैं, लेकिन कर्ण नगरी में एक सामाजिक संस्था ऐसी है जो अपने नहीं बेसहारा उन लोगों को जीवन दान दे रही है जो नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर थे। यह संस्था सड़क और रेलवे लाइन के किनारे पड़े बेसहारा मंदबुद्धि, जख्मी और लाचार लोगों को सहारा दे रहे हैं। इस संस्था में 42 ऐसे लोगों को जीवनदान दिया है, जो जीवन जीना ही भूल गए थे। यह संस्था उन्हें अपना आशियाना आश्रम में लेकर आई और उनका इलाज कराया। आज वे खुशी-खुशी जीवन जी रहे हैं। इन में से तीन लोगों को उनके परिजनों से भी मिलवाया है और वे अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। अपना आशियाना आश्रम के संस्थापक राजकुमार ने बताया कि वह फेसबुक और व्हाट्सअप पर सूचना मिलने पर वह इस तरह के लोगों को अपने आश्रम में लेकर आते हैं। यदि इस तरह के व्यक्ति किसी को दिखाई दें तो 9416110073 पर फोन कर सूचना दे सकते हैं।
रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी और टीचर करते हैं इन लोगों की देखभाल
अपना आशियाना आश्रम से राजकुमार, चरणजीत बाली के साथ, सीएसएसआरआई में रिटायर्ड लैब टेक्नीशियन जगमेलपाल, एनडीआरआई से रिटायर्ड असिस्टेंट शिव कुमार, मार्केटिंग बोर्ड से रिटायर्ड कर्मचारी सतीश डाबला, रिटायर्ड एक्सईएन महेंद्र कुमार, ओपीएस विद्या मंदिर की हिंदी अध्यापिका अनु मदान, रमेश वर्मा व सुदर्शन जुड़े हुए हैं। हिंदी टीचर स्कूल से आने के बाद हर रोज आश्रम में रहने वाले इन लोगों की पट्टी चेंज करती हैं।
सुबह नहाने से लेकर रात को सोने तक हर चीज का बना है टाइम टेबल
आश्रम में रहने वाले सभी लोगों के लिए टाइम टेबल बनाया हुआ है। वे इस टाइम टेबल के अनुसार सुबह 6 बजे जागते हैं और फिर नहाते हैं, हल्का योगा करते हैं, नाश्ता करते हैं, टीवी देखते हैं, लंच करते हैं फिर टीवी देखते हैं, आराम करते हैं, उन्हें दवा दी जाती है और भगवान के समक्ष प्रार्थना की जाती है, रात को खाना दिया जाता है। इन सभी का समय बनाया हुआ है।
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ऐसे शुरू हुआ अपना आशियाना
करनाल इंदिरा कॉलोनी, जुंडला गेट के सामने अपना आशियाना आश्रम को खड़ा करने वाले चचेरे दो भाई हैं। इसमें चरणजीत सिंह बाली और राजकुमार है। करनाल चांद चमन निवासी राजकुमार सन 1994 में गवर्नमेंट कॉलेज में बी कॉम में पढ़ता था। घर से कॉलेज आते व जाते समय वह हर रोज सनातन धर्म मंदिर के सामने पड़े एक बेसहारा बुजुर्ग को देखता था, एक दिन उसकी मौत हो गई। बस वहीं से राजकुमार ने सोचा की इंसान, इंसान के काम नहीं आता। उसे इन बेसहारा लोगों के लिए ही कुछ करना है। राजकुमार, एम कॉम व बीएड है और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में असिस्टेंट पद पर कार्यरत है। जॉब लगने पर आधी सेल उसने इन बेसहारा लोगों को खाना खिलाने व उन्हें दवा दिलाने पर खर्च की और वह जॉब करते हुए हर रोज शाम को सड़क फ्लाईओवर, रेलवे लाइन पर चक्कर लगाता और बेसहारा लोगों की सहायता करना। इसके बाद 2016 में उसने अपना आशियाना आश्रम तैयार किया।
जानिए इन चार लोगों की कहानी
पहली : छाती के गहरे जख्म में पड़े हुए थे कीड़े, कर्ण पार्क में तड़प रहा था
करनाल के गांव गोंदर निवासी 60 वर्षीय मंगु ने दिमागी रूप से परेशान था। उसकी छाती में गहरे जख्म बने हुए थे और उसकी छाती में कीड़े भी पड़े हुए थे। वह कर्ण पार्क में अपने जख्मों के कारण तड़प रहा था। अपना आशियाना आश्रम को सूचना मिली तो वे नवंबर 2017 में उसे आश्रम लेकर आए और उन्होंने डॉक्टर पर उसका इलाज कराया। आज वह मंगु पूरी तरह स्वस्थ है और उसके जख्म भी भर गए हैं, लेकिन अब वह अपने घर नहीं जाना चाहता। आश्रम ही उसका परिवार बन गया है।
दूसरी:
पैरालाइज के कारण पड़ा था सड़क पर
झज्जर के बेरी गांव निवासी 70 वर्षीय हरीश को आश्रम में दिसंबर 2017 में लाया गया। हरिश को पैरालाइज होने के कारण उसके शरीर के पर जितने भी जख्म थे, उसमें कीड़े पड़े हुए थे और भूख के मारे वह तड़प रहा था। आश्रम के व्यक्ति उसे झज्जर से आश्रम में लेकर आए और उसका इलाज कराया। अब हरीश इंसान दिखाई देता है।
तीसरा : भूख में मरे हुए जानवरों का खाता था मांस
यमुनानगर में हड्डी रोडा की जमीन पर मरे हुए जानवरों को रखा जाता था, वहां दिमागी रूप से परेशान सिरसावा निवासी बलविंद्र अपने नाखूनों से जानवरों का मांस उखाड़कर खाता था। संस्था को जब इसका पता चला तो वे उसे आश्रम में लेकर आए और उसका मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर से इलाज कराया। अब वह बलविंद्र आश्रम में काम कराता है।
चौथा : मानसिक रूप से बीमार था, आज ठीक है
राजू को आश्रम के सदस्य पानीपत से लेकर आए थे। उस दौरान उसकी दोनों टांगों के जख्मों में कीड़े पड़े हुए थे और वह भूख में अपने मलमूत्र को ही खाता था। क्योंकि वह मानसिक रूप से परेशान था। आश्रम के लोगों ने उसका मनोरोग विशेषज्ञ से इलाज कराया तो अब वह ठीक है और सभी के साथ मिलकर खना खाता है।
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- 2016 में बनाया अपना आशियाना आश्रम, 1994 में राजकुमार की आंखों के सामने ही एक बेसहारा व्यक्ति की चली गई थी जान
- जो लोग जीने की आस ही छोड़ गए थे आज मौज-मस्ती कर रहे हैं आश्रम में, टाइम टेबल के अनुसार खाना-पीना और टीवी देखते हैं लोग
फोटो 13 से 17
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
जब किसी व्यक्ति के जख्मों में कीड़े पड़ जाते हैं तो अपने भी उनसे पीछा छुड़वा लेेते हैं, लेकिन कर्ण नगरी में एक सामाजिक संस्था ऐसी है जो अपने नहीं बेसहारा उन लोगों को जीवन दान दे रही है जो नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर थे। यह संस्था सड़क और रेलवे लाइन के किनारे पड़े बेसहारा मंदबुद्धि, जख्मी और लाचार लोगों को सहारा दे रहे हैं। इस संस्था में 42 ऐसे लोगों को जीवनदान दिया है, जो जीवन जीना ही भूल गए थे। यह संस्था उन्हें अपना आशियाना आश्रम में लेकर आई और उनका इलाज कराया। आज वे खुशी-खुशी जीवन जी रहे हैं। इन में से तीन लोगों को उनके परिजनों से भी मिलवाया है और वे अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। अपना आशियाना आश्रम के संस्थापक राजकुमार ने बताया कि वह फेसबुक और व्हाट्सअप पर सूचना मिलने पर वह इस तरह के लोगों को अपने आश्रम में लेकर आते हैं। यदि इस तरह के व्यक्ति किसी को दिखाई दें तो 9416110073 पर फोन कर सूचना दे सकते हैं।
रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी और टीचर करते हैं इन लोगों की देखभाल
अपना आशियाना आश्रम से राजकुमार, चरणजीत बाली के साथ, सीएसएसआरआई में रिटायर्ड लैब टेक्नीशियन जगमेलपाल, एनडीआरआई से रिटायर्ड असिस्टेंट शिव कुमार, मार्केटिंग बोर्ड से रिटायर्ड कर्मचारी सतीश डाबला, रिटायर्ड एक्सईएन महेंद्र कुमार, ओपीएस विद्या मंदिर की हिंदी अध्यापिका अनु मदान, रमेश वर्मा व सुदर्शन जुड़े हुए हैं। हिंदी टीचर स्कूल से आने के बाद हर रोज आश्रम में रहने वाले इन लोगों की पट्टी चेंज करती हैं।
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सुबह नहाने से लेकर रात को सोने तक हर चीज का बना है टाइम टेबल
आश्रम में रहने वाले सभी लोगों के लिए टाइम टेबल बनाया हुआ है। वे इस टाइम टेबल के अनुसार सुबह 6 बजे जागते हैं और फिर नहाते हैं, हल्का योगा करते हैं, नाश्ता करते हैं, टीवी देखते हैं, लंच करते हैं फिर टीवी देखते हैं, आराम करते हैं, उन्हें दवा दी जाती है और भगवान के समक्ष प्रार्थना की जाती है, रात को खाना दिया जाता है। इन सभी का समय बनाया हुआ है।
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ऐसे शुरू हुआ अपना आशियाना
करनाल इंदिरा कॉलोनी, जुंडला गेट के सामने अपना आशियाना आश्रम को खड़ा करने वाले चचेरे दो भाई हैं। इसमें चरणजीत सिंह बाली और राजकुमार है। करनाल चांद चमन निवासी राजकुमार सन 1994 में गवर्नमेंट कॉलेज में बी कॉम में पढ़ता था। घर से कॉलेज आते व जाते समय वह हर रोज सनातन धर्म मंदिर के सामने पड़े एक बेसहारा बुजुर्ग को देखता था, एक दिन उसकी मौत हो गई। बस वहीं से राजकुमार ने सोचा की इंसान, इंसान के काम नहीं आता। उसे इन बेसहारा लोगों के लिए ही कुछ करना है। राजकुमार, एम कॉम व बीएड है और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में असिस्टेंट पद पर कार्यरत है। जॉब लगने पर आधी सेल उसने इन बेसहारा लोगों को खाना खिलाने व उन्हें दवा दिलाने पर खर्च की और वह जॉब करते हुए हर रोज शाम को सड़क फ्लाईओवर, रेलवे लाइन पर चक्कर लगाता और बेसहारा लोगों की सहायता करना। इसके बाद 2016 में उसने अपना आशियाना आश्रम तैयार किया।
जानिए इन चार लोगों की कहानी
पहली : छाती के गहरे जख्म में पड़े हुए थे कीड़े, कर्ण पार्क में तड़प रहा था
करनाल के गांव गोंदर निवासी 60 वर्षीय मंगु ने दिमागी रूप से परेशान था। उसकी छाती में गहरे जख्म बने हुए थे और उसकी छाती में कीड़े भी पड़े हुए थे। वह कर्ण पार्क में अपने जख्मों के कारण तड़प रहा था। अपना आशियाना आश्रम को सूचना मिली तो वे नवंबर 2017 में उसे आश्रम लेकर आए और उन्होंने डॉक्टर पर उसका इलाज कराया। आज वह मंगु पूरी तरह स्वस्थ है और उसके जख्म भी भर गए हैं, लेकिन अब वह अपने घर नहीं जाना चाहता। आश्रम ही उसका परिवार बन गया है।
दूसरी:
पैरालाइज के कारण पड़ा था सड़क पर
झज्जर के बेरी गांव निवासी 70 वर्षीय हरीश को आश्रम में दिसंबर 2017 में लाया गया। हरिश को पैरालाइज होने के कारण उसके शरीर के पर जितने भी जख्म थे, उसमें कीड़े पड़े हुए थे और भूख के मारे वह तड़प रहा था। आश्रम के व्यक्ति उसे झज्जर से आश्रम में लेकर आए और उसका इलाज कराया। अब हरीश इंसान दिखाई देता है।
तीसरा : भूख में मरे हुए जानवरों का खाता था मांस
यमुनानगर में हड्डी रोडा की जमीन पर मरे हुए जानवरों को रखा जाता था, वहां दिमागी रूप से परेशान सिरसावा निवासी बलविंद्र अपने नाखूनों से जानवरों का मांस उखाड़कर खाता था। संस्था को जब इसका पता चला तो वे उसे आश्रम में लेकर आए और उसका मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर से इलाज कराया। अब वह बलविंद्र आश्रम में काम कराता है।
चौथा : मानसिक रूप से बीमार था, आज ठीक है
राजू को आश्रम के सदस्य पानीपत से लेकर आए थे। उस दौरान उसकी दोनों टांगों के जख्मों में कीड़े पड़े हुए थे और वह भूख में अपने मलमूत्र को ही खाता था। क्योंकि वह मानसिक रूप से परेशान था। आश्रम के लोगों ने उसका मनोरोग विशेषज्ञ से इलाज कराया तो अब वह ठीक है और सभी के साथ मिलकर खना खाता है।