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Kaithal News: आधुनिक बर्तनों के बीच फीकी पड़ी मिट्टी के सामान की चमक

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 27 Oct 2026 12:11 AM IST
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The luster of earthenware, dimmed amidst modern-day kitchenware
त्योहारों के लिए भट्ठी में पकाने से पहले रखे कच्चे मिट्टी के बर्तन। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
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राजौंद। त्योहारों का सीजन होने के बावजूद कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार की रौनक फीकी पड़ती जा रही है। अहोई-अष्टमी और दीपावली पर कभी मिट्टी के चुगड़े, झाकरी, कुज्जी, ठूठी और दीपकों की खूब मांग रहती थी, लेकिन अब स्टील, प्लास्टिक और चीनी मिट्टी के आकर्षक बर्तनों ने इनकी जगह लेनी शुरू कर दी है। पारंपरिक सामान की घटती मांग और बढ़ती लागत के कारण कुम्हार परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है।
कुम्हार समुदाय से जुड़े कृष्ण प्रजापत, जंगशेर, शेर सिंह, काला, लखविंद्र सिंह, विकास, बाबू, जोगेंद्र, विक्रम, बलबीर और शमशेर ने बताया कि पहले त्योहारों से कई दिन पहले ही घरों में तैयारियां शुरू हो जाती थीं। परिवार के सभी सदस्य मिट्टी जुटाने, बर्तन बनाने, उन्हें सुखाने, रंगाई करने और भट्ठी में पकाने में जुट जाते थे। त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में मिट्टी के बर्तनों और दीपकों की मांग बढ़ जाती थी, जिससे परिवारों को अच्छी आमदनी हो जाती थी।
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उन्होंने बताया कि अब बाजार में पारंपरिक मिट्टी के सामान की मांग पहले जैसी नहीं रही। इससे कई परिवारों ने पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरे व्यवसाय अपना लिए हैं। कुछ कुम्हार खुद बर्तन बनाने के बजाय बाहर से तैयार सामान लाकर बेचने लगे हैं। उनका कहना है कि मिट्टी जुटाने से लेकर बर्तन तैयार करने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने में खर्च लगातार बढ़ रहा है। भट्ठी के लिए ईंधन भी महंगा हो गया है, जबकि बिक्री से होने वाली आमदनी मेहनत और लागत के अनुरूप नहीं है।
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परंपरागत कला पर भी मंडरा रहा संकट
कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के बर्तन केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा हैं। त्योहारों पर मिट्टी के दीपक जलाने और पारंपरिक बर्तनों का इस्तेमाल करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। कारोबार कमजोर होने से नई पीढ़ी भी इस काम से दूर हो रही है, जिससे पुश्तैनी कला के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। उन्होंने सरकार से कुम्हार परिवारों को आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण उपलब्ध करवाने की मांग की। साथ ही लोगों से अपील की कि त्योहारों पर मिट्टी के बर्तन और दीपक खरीदकर स्थानीय कारीगरों की आजीविका को सहारा दें।
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