{"_id":"69ebbc7478cea443c00b89a5","slug":"the-harappan-mound-of-balu-village-is-facing-neglect-kaithal-news-c-245-1-kht1013-148383-2026-04-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kaithal News: उपेक्षा की मार झेल रहा बालू गांव का हड़प्पाकालीन टीला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kaithal News: उपेक्षा की मार झेल रहा बालू गांव का हड़प्पाकालीन टीला
Sat, 25 Apr 2026 12:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sat, 25 Apr 2026 12:24 AM IST
विज्ञापन
टीले पर लगा एकमात्र सूचना बोर्ड
संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। बालू गांव प्राचीन धरोहर को अपने भीतर समेटे हुए है, लेकिन पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण यह विरासत अब खंडहर में तब्दील होती नजर आ रही है। सारण गांव की ओर जाने वाली सड़क के पास 24 एकड़ क्षेत्र में फैला हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेषों वाला टीला आज बदहाली का शिकार है।
इस टीले पर सबसे पहले वर्ष 1976 में पुरातत्व विभाग की नजर पड़ी थी, जिसके बाद यहां खोदाई और शोध कार्य शुरू हुआ। इससे पहले ग्रामीण इस स्थान को ‘थेह खेड़ा’ के रूप में जानते थे, जो उजड़ी हुई सभ्यता का प्रतीक माना जाता है।
वर्ष 1979 में हुई खोदाई में हड़प्पाकालीन और उससे भी प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण मिले। खोदाई के दौरान बर्तन, मिट्टी की ईंटों से बनी संरचनाएं, भट्ठियां, मोती, चूड़ियां और तांबे की वस्तुएं प्राप्त हुईं, जिन्हें वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संग्रहालय में संरक्षित और सुरक्षित रखा गया है।
विज्ञापन
बोर्ड लगाकर पूरी की जिम्मेदारी : टीले की मौजूदा स्थिति पुरातत्व विभाग की संवेदनहीनता को उजागर करती है। यहां केवल एक सूचना पट्ट लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई है, जबकि जमीनी स्तर पर संरक्षण के कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। विभाग की ओर से खुदाई, निर्माण और आवाजाही पर प्रतिबंध के नियम तो लिखे गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां अवैध कब्जे और खनन का सिलसिला जारी है। टीला कंटीली झाड़ियों से घिरा हुआ है और चारों ओर गंदगी व कचरे का अंबार लगा हुआ है, जिससे इसकी ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे मिटती जा रही है।
ग्रामीण संदीप कुमार के अनुसार, ऐतिहासिक महत्व के बावजूद देखरेख के अभाव में यह स्थान असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा है। वहीं गुरदेव सिंह ने प्रशासन से मांग की कि टीले की चहारदीवारी कराकर इसका संरक्षण किया जाए।
ग्राम पंचायत बालू गादड़ा पट्टी के सरपंच दिनेश कुमार ने बताया कि यह भूमि पुरातत्व विभाग के अधीन है, फिर भी पंचायत ने प्रशासन को पत्र लिखकर इसके संरक्षण की मांग की है।
विज्ञापन
कैथल। बालू गांव प्राचीन धरोहर को अपने भीतर समेटे हुए है, लेकिन पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण यह विरासत अब खंडहर में तब्दील होती नजर आ रही है। सारण गांव की ओर जाने वाली सड़क के पास 24 एकड़ क्षेत्र में फैला हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेषों वाला टीला आज बदहाली का शिकार है।
इस टीले पर सबसे पहले वर्ष 1976 में पुरातत्व विभाग की नजर पड़ी थी, जिसके बाद यहां खोदाई और शोध कार्य शुरू हुआ। इससे पहले ग्रामीण इस स्थान को ‘थेह खेड़ा’ के रूप में जानते थे, जो उजड़ी हुई सभ्यता का प्रतीक माना जाता है।
विज्ञापन
वर्ष 1979 में हुई खोदाई में हड़प्पाकालीन और उससे भी प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण मिले। खोदाई के दौरान बर्तन, मिट्टी की ईंटों से बनी संरचनाएं, भट्ठियां, मोती, चूड़ियां और तांबे की वस्तुएं प्राप्त हुईं, जिन्हें वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संग्रहालय में संरक्षित और सुरक्षित रखा गया है।
विज्ञापन
बोर्ड लगाकर पूरी की जिम्मेदारी : टीले की मौजूदा स्थिति पुरातत्व विभाग की संवेदनहीनता को उजागर करती है। यहां केवल एक सूचना पट्ट लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई है, जबकि जमीनी स्तर पर संरक्षण के कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। विभाग की ओर से खुदाई, निर्माण और आवाजाही पर प्रतिबंध के नियम तो लिखे गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां अवैध कब्जे और खनन का सिलसिला जारी है। टीला कंटीली झाड़ियों से घिरा हुआ है और चारों ओर गंदगी व कचरे का अंबार लगा हुआ है, जिससे इसकी ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे मिटती जा रही है।
ग्रामीण संदीप कुमार के अनुसार, ऐतिहासिक महत्व के बावजूद देखरेख के अभाव में यह स्थान असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा है। वहीं गुरदेव सिंह ने प्रशासन से मांग की कि टीले की चहारदीवारी कराकर इसका संरक्षण किया जाए।
ग्राम पंचायत बालू गादड़ा पट्टी के सरपंच दिनेश कुमार ने बताया कि यह भूमि पुरातत्व विभाग के अधीन है, फिर भी पंचायत ने प्रशासन को पत्र लिखकर इसके संरक्षण की मांग की है।

टीले पर लगा एकमात्र सूचना बोर्ड