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शिष्य का समर्पण ही गुरु की सच्ची आरती : प्रीति
Mon, 09 Jun 2025 02:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Mon, 09 Jun 2025 02:42 AM IST
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कैथल। दिव्या ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आरकेएसडी कॉलेज के सामने स्थित प्रोफेसर कॉलोनी आश्रम में साप्ताहिक आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर साध्वी प्रीति भारती ने आशुतोष महाराज के तत्वज्ञान को सरल एवं भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि एक सच्चा शिष्य जब अपने सतगुरु के चरणों में समर्पित होता है, तो उसके हृदय से जो भाव प्रकट होते हैं, वे किसी भी बाह्य पूजा-पद्धति से कहीं अधिक श्रेष्ठ होते हैं। शिष्य का समर्पण ही गुरु की सच्ची आरती है।
वह कहता है कि हे गुरुदेव, मैं आपकी आरती करना चाहता हूं, परंतु वह दीपक कहां से लाऊं जो आपके भीतर विद्यमान करोड़ों सूर्य के प्रकाश से तुलनीय हो सके। यह भाव दर्शाता है कि जब गुरु स्वयं ब्रह्मज्ञान स्वरूप हों, तो उनके पूजन की परंपरागत विधियां भी सीमित प्रतीत होती हैं।
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साध्वी ने कहा कि एक समर्पित शिष्य के लिए उसका जीवन ही गुरु की सेवा में अर्पित होता है। उसके कर्मों में यदि कोई प्रेरणा है तो वह गुरु की आज्ञा है, उसके विचारों में यदि कोई आदर्श है तो वह गुरु के विचार हैं।
उसकी हर सांस गुरु के स्मरण में बीतती है। वह अपने जीवन के हर क्षण में अपने गुरु को ही महसूस करता है – उसके रुदन में, भक्ति में, प्रेम में, और वियोग में भी।
उन्होंने बताया कि सतगुरु अपने शिष्य के भीतर छिपी सभी दुर्बलताओं को समाप्त कर उसे आत्मबोध कराकर परमात्मा से मिलाने का कार्य करते हैं। वे शिष्य के सच्चे मार्गदर्शक और मित्र होते हैं। कार्यक्रम के अंत में साध्वी कुलदेवी भारती ने भजनों की प्रस्तुति दी। संवाद
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उन्होंने कहा कि एक सच्चा शिष्य जब अपने सतगुरु के चरणों में समर्पित होता है, तो उसके हृदय से जो भाव प्रकट होते हैं, वे किसी भी बाह्य पूजा-पद्धति से कहीं अधिक श्रेष्ठ होते हैं। शिष्य का समर्पण ही गुरु की सच्ची आरती है।
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वह कहता है कि हे गुरुदेव, मैं आपकी आरती करना चाहता हूं, परंतु वह दीपक कहां से लाऊं जो आपके भीतर विद्यमान करोड़ों सूर्य के प्रकाश से तुलनीय हो सके। यह भाव दर्शाता है कि जब गुरु स्वयं ब्रह्मज्ञान स्वरूप हों, तो उनके पूजन की परंपरागत विधियां भी सीमित प्रतीत होती हैं।
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साध्वी ने कहा कि एक समर्पित शिष्य के लिए उसका जीवन ही गुरु की सेवा में अर्पित होता है। उसके कर्मों में यदि कोई प्रेरणा है तो वह गुरु की आज्ञा है, उसके विचारों में यदि कोई आदर्श है तो वह गुरु के विचार हैं।
उसकी हर सांस गुरु के स्मरण में बीतती है। वह अपने जीवन के हर क्षण में अपने गुरु को ही महसूस करता है – उसके रुदन में, भक्ति में, प्रेम में, और वियोग में भी।
उन्होंने बताया कि सतगुरु अपने शिष्य के भीतर छिपी सभी दुर्बलताओं को समाप्त कर उसे आत्मबोध कराकर परमात्मा से मिलाने का कार्य करते हैं। वे शिष्य के सच्चे मार्गदर्शक और मित्र होते हैं। कार्यक्रम के अंत में साध्वी कुलदेवी भारती ने भजनों की प्रस्तुति दी। संवाद