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Kaithal News: आधुनिकता के बीच फीकी नहीं पड़ी संस्कृति की चमक

Tue, 23 Sep 2025 02:14 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Tue, 23 Sep 2025 02:14 AM IST
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The brilliance of culture has not faded amidst modernity.
11 सीवन में बनाई गई मां दुर्गा सांझी
संवाद न्यूज एजेंसी
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सीवन/कलायत। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच आज भी भारतीय संस्कृति से जुड़ी प्राचीन परंपराओं की चमक-धमक फीकी नहीं पड़ी है। नवरात्रों में घर-घर सांझी माता की पूजा का विशेष स्थान है। महिलाएं सांझी माता की मूर्तियां कई सप्ताह पहले से ही बनानी शुरू कर देती हैं।

नवरात्रों की पूर्व संध्या पर नगर और गांवों के आंगन भक्ति, श्रद्धा और उल्लास से जगमगाते दिखाई दिए। पारंपरिक लोक आस्था के प्रतीक सांझी की सजावट ने पूरे वातावरण को धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग दिया। गृहिणी संतोष रानी ने बताया कि सांझी उत्तर भारत की लोकभक्ति का जीवंत रूप है।
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नवरात्र शुरू होने से एक दिन पहले कन्याएं गोबर, मिट्टी और रंगों से दीवारों पर मां दुर्गा के स्वरूप व पौराणिक आकृतियां बनाती हैं। इन्हें फूलों, रंगीन कागज और रेशमी सजावट से संवारकर देवी के स्वागत की तैयारी की जाती है। संतोष रानी ने कहा कि सांझी बनाना केवल पूजा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह हमारी बेटियों की श्रद्धा, रचनात्मकता और भक्ति का प्रतीक है।
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नवरात्रों के नौ दिनों तक घर-घर में दीपक जलते हैं और भजनों की गूंज से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। स्त्रियां और बच्चियां मिलकर लोकगीत व भजन गाती हैं, जिससे आंगन भक्ति और उल्लास का केंद्र बन जाता है। गांवों और कस्बों में सांझी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक मेल-जोल का माध्यम भी है। बड़ी बहनें और माताएं छोटी बच्चियों को सांझी बनाने की परंपरा सिखाती हैं, जिससे यह कला और संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। कन्याओं की कल्पनाशक्ति और उत्साह से बनी सांझी को परिवारजन सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं। दशहरे के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के बाद सांझी का पवित्र जल में विसर्जन किया जाता है।
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