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मीठी सी कर दे री मां कोथली, जाऊंगा बेबे के देश
अमर उजाला ब्यूरो/कैथ्ाल
Updated Sun, 28 Jun 2015 11:50 PM IST
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करीब 150 साल पहले एक हलवाई द्वारा शुरू किया गया फिरनी बनाने का काम आज एक व्यवसाय बन गया है। सावन से पहले जैसे-जैसे मानसून की फुहारें बढ़ती हैं, वैसे-वैसे फिरनी की मिठास भी बढ़ती जाती है। इन तीन माह में यह पूरे जिले में 5000 से अधिक प्रत्यक्ष तो हजारों ही परिवारों के लिए प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार का साधन बन जाती है। इस बार भी करीब महीने भर से इसे बनाया जा रहा है।
लोग बाजारों में इसकी मिठास का आनंद ले रहे हैं। पूंडरी में बनाई जा रही छोटे साइज की फिरनी को तो हाथों हाथ लिया जा रहा है। हरियाणा के साथ-साथ पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश तक भी मांग बढ़ती जा रही है। हरियाणवी संस्कृति में सावन माह में तीज के अवसर पर बहनों के यहां विशेष उपहार दिए जाते हैं। जिसे हरियाणवी बोली में कोथली कहा जाता है..उसमें फिरनी की विशेष जगह होती है। फिरनी के बिना कोथली का उपहार अधूरा रहता है।
150 साल पहले कोई हलवाई शुरू की थी फिरनी बनानी
कैथल में फिरनी के प्रमुख विक्रेता माई सिंह ने छोटी सी उम्र में फिरनी बनानी शुरू की थी। माईसिंह ने बताया कि उन्हें उस समय हलवाई बताते थे कि 100 साल से पहले एक हलवाई ने इसे कैथल में बनाना शुरू किया था। जिसे धीरे-धीरे लोगों ने सीखना शुरू कर दिया। उस समय को आज 150 से भी ज्यादा का समय हो चुका है। उन्होंने 6 रुपये प्रति किलो फिरनी बेची हुई है। जिसकी कीमत आज बढ़कर 120 रुपये प्रति किलो हो गई है।
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सावन से दो माह पहले शुरू हो जाती है फिरनी-सावन से दो माह पहले ही इसे बनाना शुरू कर दिया जाता है। सावन में इतनी मांग हो जाती है कि लोगों की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो जाता है। पूंडरी में प्रमुख मिठाई विक्रेता रघुबीर सिंह का कहना है कि बरसात से पहले ही हलवाई इसके निर्माण की तैयारी कर देते हैं। जैसे-जैसे बरसात होती है, वैसे-वैसे इसकी मांग बढ़ती जाती है।
फीकी फिरनी का होता है ज्यादा कारोबार
कैथल चूंकि फिरनी बनाने के लिए प्रसिद्ध है। इसीलिए यहां फीकी फिरनी का ज्यादा कारोबार होता है। पंजाब, हिमाचल, दिल्ली सहित बाहर से व्यापारी यहां से फीकी फिरनी खरीद कर ले जाते हैं। बाद में मीठे की चासनी चढ़ाकर बाजारों में बेचते हैं। कैथल में करोड़ों रुपये में फिरनी का कारोबार होता है।
साइज घटता गया, पसंद बढ़ती गई
चंदाना गेट पर हलवाई शमशेर सिंह, बलकार सिंह ने बताया कि पहले फिरनी का एक पीस काफी बड़ा होता था। लेकिन अब इसका साईज कम हो रहा है और मांग बढ़ती जा रही है।
ऐसे बनती है फिरनी
स्वीट शॉप चला रहे संजय कुमार ने बताया कि फिरनी बनाने के लिए घी एवं मैदा का मिश्रण बनाकर पहले तीन-चार बार लंबाई में खींचा जाता है। इसके बाद इसकी गांठे लगाई जाती हैं। इन गांठों को तोड़कर चपटा करते हुए भट्ठी में पकाया जाता है। इसे ठंडा करके इसमें मीठे की चासनी चढ़ाई जाती है। इसके बाद यह खाने के लिए तैयार होती है। पहले मिश्रण को तैयार करने के लिए मैदा को पैरों से मथा जाता था। लेकिन इसमें सफाई की कमी रहती थी। इसीलिए अब अधिकतर हलवाई मैथे को मथने के लिए मशीनें ले आए हैं। जिसके चलते अब इसे काफी साफ-सुथरे तरीके से बनाया जाता है।
5000 से ज्यादा परिवारों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार
जेठ (मई)में फिरनी बनानी शुरू कर दी जाती है। इसके बाद इसे आषाढ़ (जून-जुलाई) एवं सावन (जुलाई अगस्त)माह के बाद तक भी बनाया जाता है। तीज के बाद इसे बनाना कम कर दिया जाता है। इस समय एक दिन में करीब 100 क्विंटल से ज्यादा फिरनी बिक रही है। इसे बनाने एवं बेचने के अलावा बाहर भेजने में 5000 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष तो इससे भी अधिक लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल रहा है।
महिलाओं को भी मिला हुआ है रोजगार
फिरनी बनाने में महिलाओं को भी काफी रोजगार मिला हुआ है। फिरनी को बनाने में श्रम काफी होता है। इसके बनाने के करीब 6 से 7 चरणों के लिए अलग-अलग कारीगरों की आवश्यकता होती है। जिस कारण महिलाओं के लिए भी यह रोजगार का सृजन कर रही है। शहर में लगभग प्रत्येक हलवाई की दुकान के साथ-साथ नौता राम चौक, करनाल रोड, भगत सिंह चौक, निरवानिया बिल्डिंग में पूरी तरह से तैयार फिरनी बिक रही है। वहीं भगत सिंह चौक, छात्रावास रोड, चंदाना गेट के इलाके में इसे थोक में बनाने में इस समय हलवाई जुटे हुए हैं।
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लोग बाजारों में इसकी मिठास का आनंद ले रहे हैं। पूंडरी में बनाई जा रही छोटे साइज की फिरनी को तो हाथों हाथ लिया जा रहा है। हरियाणा के साथ-साथ पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश तक भी मांग बढ़ती जा रही है। हरियाणवी संस्कृति में सावन माह में तीज के अवसर पर बहनों के यहां विशेष उपहार दिए जाते हैं। जिसे हरियाणवी बोली में कोथली कहा जाता है..उसमें फिरनी की विशेष जगह होती है। फिरनी के बिना कोथली का उपहार अधूरा रहता है।
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150 साल पहले कोई हलवाई शुरू की थी फिरनी बनानी
कैथल में फिरनी के प्रमुख विक्रेता माई सिंह ने छोटी सी उम्र में फिरनी बनानी शुरू की थी। माईसिंह ने बताया कि उन्हें उस समय हलवाई बताते थे कि 100 साल से पहले एक हलवाई ने इसे कैथल में बनाना शुरू किया था। जिसे धीरे-धीरे लोगों ने सीखना शुरू कर दिया। उस समय को आज 150 से भी ज्यादा का समय हो चुका है। उन्होंने 6 रुपये प्रति किलो फिरनी बेची हुई है। जिसकी कीमत आज बढ़कर 120 रुपये प्रति किलो हो गई है।
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सावन से दो माह पहले शुरू हो जाती है फिरनी-सावन से दो माह पहले ही इसे बनाना शुरू कर दिया जाता है। सावन में इतनी मांग हो जाती है कि लोगों की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो जाता है। पूंडरी में प्रमुख मिठाई विक्रेता रघुबीर सिंह का कहना है कि बरसात से पहले ही हलवाई इसके निर्माण की तैयारी कर देते हैं। जैसे-जैसे बरसात होती है, वैसे-वैसे इसकी मांग बढ़ती जाती है।
फीकी फिरनी का होता है ज्यादा कारोबार
कैथल चूंकि फिरनी बनाने के लिए प्रसिद्ध है। इसीलिए यहां फीकी फिरनी का ज्यादा कारोबार होता है। पंजाब, हिमाचल, दिल्ली सहित बाहर से व्यापारी यहां से फीकी फिरनी खरीद कर ले जाते हैं। बाद में मीठे की चासनी चढ़ाकर बाजारों में बेचते हैं। कैथल में करोड़ों रुपये में फिरनी का कारोबार होता है।
साइज घटता गया, पसंद बढ़ती गई
चंदाना गेट पर हलवाई शमशेर सिंह, बलकार सिंह ने बताया कि पहले फिरनी का एक पीस काफी बड़ा होता था। लेकिन अब इसका साईज कम हो रहा है और मांग बढ़ती जा रही है।
ऐसे बनती है फिरनी
स्वीट शॉप चला रहे संजय कुमार ने बताया कि फिरनी बनाने के लिए घी एवं मैदा का मिश्रण बनाकर पहले तीन-चार बार लंबाई में खींचा जाता है। इसके बाद इसकी गांठे लगाई जाती हैं। इन गांठों को तोड़कर चपटा करते हुए भट्ठी में पकाया जाता है। इसे ठंडा करके इसमें मीठे की चासनी चढ़ाई जाती है। इसके बाद यह खाने के लिए तैयार होती है। पहले मिश्रण को तैयार करने के लिए मैदा को पैरों से मथा जाता था। लेकिन इसमें सफाई की कमी रहती थी। इसीलिए अब अधिकतर हलवाई मैथे को मथने के लिए मशीनें ले आए हैं। जिसके चलते अब इसे काफी साफ-सुथरे तरीके से बनाया जाता है।
5000 से ज्यादा परिवारों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार
जेठ (मई)में फिरनी बनानी शुरू कर दी जाती है। इसके बाद इसे आषाढ़ (जून-जुलाई) एवं सावन (जुलाई अगस्त)माह के बाद तक भी बनाया जाता है। तीज के बाद इसे बनाना कम कर दिया जाता है। इस समय एक दिन में करीब 100 क्विंटल से ज्यादा फिरनी बिक रही है। इसे बनाने एवं बेचने के अलावा बाहर भेजने में 5000 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष तो इससे भी अधिक लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल रहा है।
महिलाओं को भी मिला हुआ है रोजगार
फिरनी बनाने में महिलाओं को भी काफी रोजगार मिला हुआ है। फिरनी को बनाने में श्रम काफी होता है। इसके बनाने के करीब 6 से 7 चरणों के लिए अलग-अलग कारीगरों की आवश्यकता होती है। जिस कारण महिलाओं के लिए भी यह रोजगार का सृजन कर रही है। शहर में लगभग प्रत्येक हलवाई की दुकान के साथ-साथ नौता राम चौक, करनाल रोड, भगत सिंह चौक, निरवानिया बिल्डिंग में पूरी तरह से तैयार फिरनी बिक रही है। वहीं भगत सिंह चौक, छात्रावास रोड, चंदाना गेट के इलाके में इसे थोक में बनाने में इस समय हलवाई जुटे हुए हैं।