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निजी स्कूलों की किताबों व दाखिले में मनमर्जी के खिलाफ अभिभावकों में रोष
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 15 Apr 2016 12:12 AM IST
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- फोटो : कैथल
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कलायत। पुस्तकों व दाखिलों के नाम पर चल रहे गोरखधंधों को लेकर अभिभावकों में रोष है। अनेक अभिभावकों ने इस मामले में मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री व डीसी को पत्र भेज कर लूट पर लगाम लगाने की मांग की है। जिला निगरानी कमेटी के सदस्य श्याम लाल शर्मा, प्रदीप, मनोज कुमार, सुरेंद्र, रामनिवास, पवन कुमार, संजीव कुमार ने आरोप लगाया कि खंड कलायत के निजी स्कूलों ने स्कूलों में दाखिले व छात्रों की पुस्तकों को लेकर निजी स्कूलों की खूब मनमर्जी चल रही है।
निजी स्कूलों ने एक रणनीति को अपनाते हुए केवल एक ही दुकान को अधिग्रहित कर रखा है जहां से पुस्तकें मिलती हैं। सिलेबस के नाम पर अनेक पुस्तकें जबरदस्ती लगवाई जा रही हैं जिनकी आवश्यकता ही नहीं है। एक ही दुकान पर मिलने वाली अनेक स्कूलों की पुस्तकों को प्रिंट मूल्य पर बेचा जा रहा है। जो अभिभावक पुस्तकों का बिल मांगते हैं उन्हें पुस्तकें दी ही नहीं जाती। श्याम लाल शर्मा ने कहा कि हालात इतने खराब हैं कि पुस्तकों की खरीद के नाम पर सरेआम अभिभावकों को लूटा जा रहा है।
केजी, एलकेजी, पहली, दूसरी कक्षाओं की किताबों का बिल 2500 से लेकर 3000 तक वसूला जा रहा है। स्कूल में हर वर्ष नई किताबें लगवा दी जाती हैं जिसके कारण से हर वर्ष अभिभावकों को नई पुस्तकों पर पैसा खर्च करना पड़ता है। मनोज कुमार ने कहा कि पांचवीं कक्षा तक के एडमिशन, पुस्तकों, बस्ते, जूते व ड्रेस के नाम पर के नाम पर ही एक अभिभावक के दस हजार से ऊपर रुपये खर्च हो जाते हैं जो एक गरीब आदमी कहां से दे सकते है।
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राजबीर, सुरेंद्र ने कहा कि पुस्तकों के लिए केवल एक दुकान का निर्धारण करना सीधे तौर पर अभिभावकों को ठगना ही है। स्कूलों में सीधे तौर पर अभिभावकों को निर्धारित दुकान का पता दे दिया जाता है तथा यदि अभिभावक और कहीं ढूंढे तो उनको पुस्तकें मिल ही नही पाती। वीरवार को अभिभावकों का एक प्रतिनिधि मंडल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के पास अपनी शिकायत लेकर भी गया पर अवकाश होने के कारण से कार्यालय बंद थे। शर्मा ने कहा कि इस मामले में सभी अभिभावकों की ओर से सीएम व शिक्षामंत्री को पत्र लिख कर शिकायत की गई है। उन्होंने कहा कि मंगलवार को मुख्यमंत्री के ओएसडी अमरेंद्र सिंह के सामने सारा मामला रखा जाएगा ताकि अभिभावकों को लुटने से बचाया जा सके।
इस बारे निजी स्कूल के संचालकों से बात की गई तो उन्होंने कहा कि स्कूलों द्वारा किसी भी विक्रेता अनुबंध नही करता है। स्कूल प्रशासन द्वारा अभिभावक को किताबों की लिस्ट दे दी जाती है। वह चाहे कलायत से ले या फिर कैथल से। हर साल लगने वाली नई किताबों के बारे में उनका कहना था कि सातवीं तक पब्लिशर की किताबें स्कूलों में लगती हैं उसके बाद एनसीआरटी की किताबें सिलेबस में लगती है। पब्लिशर अपनी पुस्तकें बेचने के लिए हर बार किताबों में बदलाव कर देते हैं जिसके कारण से किताबें बदलनी पड़ती है।
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निजी स्कूलों ने एक रणनीति को अपनाते हुए केवल एक ही दुकान को अधिग्रहित कर रखा है जहां से पुस्तकें मिलती हैं। सिलेबस के नाम पर अनेक पुस्तकें जबरदस्ती लगवाई जा रही हैं जिनकी आवश्यकता ही नहीं है। एक ही दुकान पर मिलने वाली अनेक स्कूलों की पुस्तकों को प्रिंट मूल्य पर बेचा जा रहा है। जो अभिभावक पुस्तकों का बिल मांगते हैं उन्हें पुस्तकें दी ही नहीं जाती। श्याम लाल शर्मा ने कहा कि हालात इतने खराब हैं कि पुस्तकों की खरीद के नाम पर सरेआम अभिभावकों को लूटा जा रहा है।
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केजी, एलकेजी, पहली, दूसरी कक्षाओं की किताबों का बिल 2500 से लेकर 3000 तक वसूला जा रहा है। स्कूल में हर वर्ष नई किताबें लगवा दी जाती हैं जिसके कारण से हर वर्ष अभिभावकों को नई पुस्तकों पर पैसा खर्च करना पड़ता है। मनोज कुमार ने कहा कि पांचवीं कक्षा तक के एडमिशन, पुस्तकों, बस्ते, जूते व ड्रेस के नाम पर के नाम पर ही एक अभिभावक के दस हजार से ऊपर रुपये खर्च हो जाते हैं जो एक गरीब आदमी कहां से दे सकते है।
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राजबीर, सुरेंद्र ने कहा कि पुस्तकों के लिए केवल एक दुकान का निर्धारण करना सीधे तौर पर अभिभावकों को ठगना ही है। स्कूलों में सीधे तौर पर अभिभावकों को निर्धारित दुकान का पता दे दिया जाता है तथा यदि अभिभावक और कहीं ढूंढे तो उनको पुस्तकें मिल ही नही पाती। वीरवार को अभिभावकों का एक प्रतिनिधि मंडल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के पास अपनी शिकायत लेकर भी गया पर अवकाश होने के कारण से कार्यालय बंद थे। शर्मा ने कहा कि इस मामले में सभी अभिभावकों की ओर से सीएम व शिक्षामंत्री को पत्र लिख कर शिकायत की गई है। उन्होंने कहा कि मंगलवार को मुख्यमंत्री के ओएसडी अमरेंद्र सिंह के सामने सारा मामला रखा जाएगा ताकि अभिभावकों को लुटने से बचाया जा सके।
इस बारे निजी स्कूल के संचालकों से बात की गई तो उन्होंने कहा कि स्कूलों द्वारा किसी भी विक्रेता अनुबंध नही करता है। स्कूल प्रशासन द्वारा अभिभावक को किताबों की लिस्ट दे दी जाती है। वह चाहे कलायत से ले या फिर कैथल से। हर साल लगने वाली नई किताबों के बारे में उनका कहना था कि सातवीं तक पब्लिशर की किताबें स्कूलों में लगती हैं उसके बाद एनसीआरटी की किताबें सिलेबस में लगती है। पब्लिशर अपनी पुस्तकें बेचने के लिए हर बार किताबों में बदलाव कर देते हैं जिसके कारण से किताबें बदलनी पड़ती है।