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Kaithal News: महापर्व छठ की तैयारियां पूरी, आज नहाय-खाय से होगी शुरूआत

Tue, 05 Nov 2024 04:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Tue, 05 Nov 2024 04:10 AM IST
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Preparations for Mahaparva Chhath completed, today will start with Nahay-Khay
कैथल। शहर के बाबा शीतलपुरी घाट पर मनाए जाने वाले चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरूआत मंगलवार को नहाय खाय से होगी। इस महापर्व के तहत सात नंवबर को डूबते और आठ नवंबर की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ महिलाएं व्रत का समापन करेंगी। पर्व पूर्वांचल समाज की महिलाओं में काफी उत्साह है। नगर परिषद ने बाबा शीतलपुरी घाट की सफाई करा दी गई है। यहां पर लाइटों की व्यवस्था की जा रही है, जिससे महिलाओं को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। एक दिन पहले ही पूर्वांचल जनविकास सेवा समिति के सदस्यों ने तैयारियों पर जानकारी ली।
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सब्जी मंडी स्थित दुकानदार नवीन व रघुबीर ने बताया कि चार दिवसीय छठ महापर्व को लेकर सामान की ब्रिकी शुरू हो चुकी है। अब लगातार तीन दिन तक पूर्वांचल समाज के लोग व्रत से संबंधित पूजन सामग्री सहित अन्य सामान खरीदने के लिए आ रहे हैं। इसमें करीब 50 प्रकार की पूजन सामग्री शामिल है।
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व्रती महिलाएं रखती हैं पवित्रता का विशेष ध्यान-

पंडित मुकेश पांडे ने बताया कि छठ महापर्व में व्रत, पूजा और अर्घ्य की प्रक्रिया में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। घर में एक माह पहले से ही लहसुन प्याज का परित्याग कर दिया जाता है। जूता व चप्पल भी त्याग दिए जाते हैं। बताया कि छठ महापर्व मंगलवार को नहाय-खाय के साथ ही शुरू होगा। इस दिन व्रती महिलाएं पास की नदी या तालाब में स्नान करने के बाद घर पर कद्दू और चावल का ‘कद्दू भात’’ बनाएंगी। व्रत रखने वाली महिलाएं रात में जमीन पर सोती हैं और शाम को एक समय कुछ प्रसाद ग्रहण करेंगी। खरना छह नवंबर को मनाया जाएगा। सात नवंबर को निर्जला उपवास का दिन है। इस दिन व्रती महिलाएं डूबते सूर्य को शाम पांच बजकर 27 मिनट पर अर्घ्य देंगी। अर्घ्य देने के बाद प्रसाद सामग्री को घर लाया जाता है और रात में जागरण कर माता षष्ठी की कहानी सुनी जाती है।
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चार दिनों तक रहता है उल्लास
पंडित मुकेश पांडे ने बताया कि इस पर्व के शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक उल्लास का माहौल रहता है। सूर्यास्त और सूर्योदय पर अर्घ्य के समय नदी और तालाब के किनारे का दृश्य अद्भुत होता है। घाट किनारे भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए लोग इकट्ठा होते हैं। कई लोग घरों में गड्ढे खोदकर छठ मैया की पूजा करते हैं।

क्यों देते हैं डूबते सूरज को अर्घ्य
छठ पूजा के तीसरे दिन यानी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है। इस दिन शाम के समय किसी तालाब या नदी में कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि डूबते समय सूर्य देव अपनी दूसरी पत्नी प्रत्यूषा के साथ में होते हैं। इस समय इनको अर्घ्य देने से जीवन में चल रही हर प्रकार की समस्याएं दूर होती हैं। सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख और समृद्धि आती है।




36 घंटे तक बिना पानी पिये करती हैं व्रत
पूर्वांचल जनविकास सेवा समिति के प्रधान जयकिशन राय ने बताया कि इस पर्व के माध्यम से महिलाएं सूर्य देवता और षष्ठी मैया से अपने परिवार की खुशहाली और संतान की लंबी उम्र की कामना करते हैं। छठ पर्व के दौरान प्रकृति के विभिन्न तत्वों जैसे जल, सूर्य, चंद्रमा आदि की पूजा की जाती है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीका है और हमें प्रकृति के संरक्षण का महत्व सिखाता है। छठ का व्रत बहुत कठिन होता है। व्रतधारी 36 घंटे तक निर्जला व्रत करती हैं।
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