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लोग बोले- जो खाद बताई जा रही, उसमें कांच, कैसे करें खेतों में प्रयोग
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58 कैथल। खुला दरबार में अपनी समस्याएं रखते किसान
- फोटो : Kaithal
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कैथल। खुराना रोड स्थित डंपिंग यार्ड पर रखी गई जनसुनवाई के दौरान लोगों की पीड़ा सामने आई और लोगों ने यहां किए जा रहे कचरा प्रबंधन की पोल खोल कर रख दी। लोगों ने बताया कि यहां बनाई गई जो खाद बताई जा रही है, उसमें कांच है। उसे खेतों में कैसे प्रयोग करें? वहीं शहरवासी ने डीसी डा. संगीता तेतरवाल को भी यह कहकर खूब सुनाई कि ये अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फैसले करते हैं। लोगों की कोई सुनवाई नहीं होती। डीसी को कहा कि आपने एक स्कूल में शौचालय गंदे मिलने पर चाय पीने से इंकार कर दिया था। अच्छी बात है। लेकिन यदि किसी स्कूल के सामने स्थायी तौर पर गोबर के ढेर लगे हों तो आप सोच सकती हैं कि उन बच्चों के साथ क्या बीतती होगी?
शुक्रवार को नगर परिषद व प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की ओर से खुराना रोड पर स्थित डंपिंग यार्ड में जनसुनवाई रखी गई थी। इसमें पहुंचे गांव खुराना के राधाकृष्ण शर्मा ने प्रश्नकाल में कहा कि वे इस डंपिंग यार्ड को पक्का करने की बात से वह सहमत नहीं है। इसे यहां से खत्म किया जाए। अन्यथा वे लोग आंदोलन करेंगे। गांव वासी शिव कुमार ने कहा कि यह मुख्य मार्ग है। यहां से दर्जनों गांवों का रास्ता है। यहां मरी हुई गाय व मुर्गों के कारण कुत्ते मांसाहारी हो गए हैं। वे लोगों को काटने दौड़ते हैं। कई बार काट भी लेते हैं। ट्रॉली को बिना ढके कचरा जाता है, जो पूरे रास्ते में बिखरा रहता है।
भारतीय किसान यूनियन के नेता बलजीत सिंह ने कहा कि वे एक माह का समय देते हैं, यदि इसे यहां से बंद नहीं किया तो यहां भाकियू धरना देगी। शैमरॉक स्कूल की प्रिंसिपल नीलम मौदगिल ने कहा कि लोगों का गुस्सा कहीं न कहीं जायज है। इस यार्ड के कारण मक्खी, मच्छर, बदबू हो है। साथ में यहां कुत्तों के झुंड घूमते हैं। डर लगता है कि बच्चों को साइकिल पर आते-जाते काट न लें। उनके देखते-देखते यहां हादसों में कई लोगों की जान जा चुकी है। तीन साल से यहां केवल कचरे को अलग किया जा रहा है। इस तरह से इसे खत्म करने में तो दो साल ओर लग जाएंगे। यह लोगों की जायज समस्या है। डीसी महोदया से निवेदन है कि इस समस्या को समाप्त किया जाए। इस रास्ते को डबल लेन का बनवाया जाए।
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खुराना के ईश्वर चंद नंबरदार ने कहा कि यहां जो खाद बनाई जा रही है, उसमें कांच है। यह खेतों में भी काम में नहीं लाया जा सकता। जिस कारण इसका कोई प्रयोग नहीं है। उनकी तो एक ही मांग है कि इस डंपिंग यार्ड को यहां से खत्म किया जाए। शहरवासी जगरूप ढुल ने कहा कि अधिकारी एसी कमरों में बैठकर मीठी-मीठी बातें करते हैं। आप इस कार्यक्रम के पंखे बंद करवा दीजिए, आपको लोगों की समस्या का पता चल जाएगा। मौके पर मक्खी लोगों को बैठने तक नहीं दे रही, क्यों? डीसी महोदया आपकी बात अच्छी लगी कि गंदगी में आपने चाय नहीं पी। लेकिन उन बच्चों व लोगों की स्थिति देखिए, जो गंदगी में रहने को मजबूर हैं। ढुल ने सीधा कहा कि किताबी बातें करते हैं? धरातल पर कुछ भी नहीं है।
गांव वासी रामचंद्र मलिक, सुभाष खुराना, कालू वाली गामड़ी से आजादपाल ने कहा कि यहां कुत्ते पशुओं को खाने के साथ-साथ आदमियों को काटते हैं। कोई सफाई नहीं होती। कहने को कुछ है, करने को कुछ। डेरों में बदबू से जीना मुश्किल हो गया। यहां मशीनें भी ठीक से काम नहीं कर रही।
खाद में कांच है तो चुप क्यों है अधिकारी?-सवाल उठता है कि 5.65 करोड़ रुपये खर्च करके इस कचरे को खत्म करते हुए खाद बनाई जा रही है। डीएमसी से लेकर नगर परिषद का अमला इस बात को लेकर चुप क्यों है? क्यों नहीं जांच करवाई जाती कि जो खाद बनाई जा रही है, वह किसानों के लिए प्रयोग लायक क्यों नहीं है? यदि खाद खेतों में प्रयोग लायक नहीं है तो इसका प्रयोग कहां हो रहा है? इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।
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कैथल। खुराना रोड स्थित डंपिंग यार्ड पर रखी गई जनसुनवाई के दौरान लोगों की पीड़ा सामने आई और लोगों ने यहां किए जा रहे कचरा प्रबंधन की पोल खोल कर रख दी। लोगों ने बताया कि यहां बनाई गई जो खाद बताई जा रही है, उसमें कांच है। उसे खेतों में कैसे प्रयोग करें? वहीं शहरवासी ने डीसी डा. संगीता तेतरवाल को भी यह कहकर खूब सुनाई कि ये अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फैसले करते हैं। लोगों की कोई सुनवाई नहीं होती। डीसी को कहा कि आपने एक स्कूल में शौचालय गंदे मिलने पर चाय पीने से इंकार कर दिया था। अच्छी बात है। लेकिन यदि किसी स्कूल के सामने स्थायी तौर पर गोबर के ढेर लगे हों तो आप सोच सकती हैं कि उन बच्चों के साथ क्या बीतती होगी?
शुक्रवार को नगर परिषद व प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की ओर से खुराना रोड पर स्थित डंपिंग यार्ड में जनसुनवाई रखी गई थी। इसमें पहुंचे गांव खुराना के राधाकृष्ण शर्मा ने प्रश्नकाल में कहा कि वे इस डंपिंग यार्ड को पक्का करने की बात से वह सहमत नहीं है। इसे यहां से खत्म किया जाए। अन्यथा वे लोग आंदोलन करेंगे। गांव वासी शिव कुमार ने कहा कि यह मुख्य मार्ग है। यहां से दर्जनों गांवों का रास्ता है। यहां मरी हुई गाय व मुर्गों के कारण कुत्ते मांसाहारी हो गए हैं। वे लोगों को काटने दौड़ते हैं। कई बार काट भी लेते हैं। ट्रॉली को बिना ढके कचरा जाता है, जो पूरे रास्ते में बिखरा रहता है।
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भारतीय किसान यूनियन के नेता बलजीत सिंह ने कहा कि वे एक माह का समय देते हैं, यदि इसे यहां से बंद नहीं किया तो यहां भाकियू धरना देगी। शैमरॉक स्कूल की प्रिंसिपल नीलम मौदगिल ने कहा कि लोगों का गुस्सा कहीं न कहीं जायज है। इस यार्ड के कारण मक्खी, मच्छर, बदबू हो है। साथ में यहां कुत्तों के झुंड घूमते हैं। डर लगता है कि बच्चों को साइकिल पर आते-जाते काट न लें। उनके देखते-देखते यहां हादसों में कई लोगों की जान जा चुकी है। तीन साल से यहां केवल कचरे को अलग किया जा रहा है। इस तरह से इसे खत्म करने में तो दो साल ओर लग जाएंगे। यह लोगों की जायज समस्या है। डीसी महोदया से निवेदन है कि इस समस्या को समाप्त किया जाए। इस रास्ते को डबल लेन का बनवाया जाए।
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खुराना के ईश्वर चंद नंबरदार ने कहा कि यहां जो खाद बनाई जा रही है, उसमें कांच है। यह खेतों में भी काम में नहीं लाया जा सकता। जिस कारण इसका कोई प्रयोग नहीं है। उनकी तो एक ही मांग है कि इस डंपिंग यार्ड को यहां से खत्म किया जाए। शहरवासी जगरूप ढुल ने कहा कि अधिकारी एसी कमरों में बैठकर मीठी-मीठी बातें करते हैं। आप इस कार्यक्रम के पंखे बंद करवा दीजिए, आपको लोगों की समस्या का पता चल जाएगा। मौके पर मक्खी लोगों को बैठने तक नहीं दे रही, क्यों? डीसी महोदया आपकी बात अच्छी लगी कि गंदगी में आपने चाय नहीं पी। लेकिन उन बच्चों व लोगों की स्थिति देखिए, जो गंदगी में रहने को मजबूर हैं। ढुल ने सीधा कहा कि किताबी बातें करते हैं? धरातल पर कुछ भी नहीं है।
गांव वासी रामचंद्र मलिक, सुभाष खुराना, कालू वाली गामड़ी से आजादपाल ने कहा कि यहां कुत्ते पशुओं को खाने के साथ-साथ आदमियों को काटते हैं। कोई सफाई नहीं होती। कहने को कुछ है, करने को कुछ। डेरों में बदबू से जीना मुश्किल हो गया। यहां मशीनें भी ठीक से काम नहीं कर रही।
खाद में कांच है तो चुप क्यों है अधिकारी?-सवाल उठता है कि 5.65 करोड़ रुपये खर्च करके इस कचरे को खत्म करते हुए खाद बनाई जा रही है। डीएमसी से लेकर नगर परिषद का अमला इस बात को लेकर चुप क्यों है? क्यों नहीं जांच करवाई जाती कि जो खाद बनाई जा रही है, वह किसानों के लिए प्रयोग लायक क्यों नहीं है? यदि खाद खेतों में प्रयोग लायक नहीं है तो इसका प्रयोग कहां हो रहा है? इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।