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शख्सियत कभी मशहूर थी मेरी भी, आज गुमनाम रह रहा हूं...
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जागीर कम रही औलादों में शायद, बीच किश्तों में उनमें बंट रहा हूं, शख्सियत कभी मशहूर थी मेरी भी, आज गुमनाम रह रहा हूं...ये दर्द कैथल के वृद्ध आश्रम में रह रहे उन बुजुर्गों का है, जो घर-परिवार और अपनों के होते हुए यहां रहने को मजबूर हैं। कोई बहू से तंग है तो कोई बेटे के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर यहां पहुंचा है। विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस पर अमर उजाला ने उनका दर्द जानने का प्रयास किया तो अपनों से आहत होने के बावजूद अपनों के लिए बुजुर्गों की आंखें छलक पड़ी। किसी ने इसे समय का खेल बताया तो किसी ने नियति की मर्जी करार दी।
परिवार को आज तक नहीं बताया मैं कहां हूं
आश्रम में दो माह पहले आए एक बुजुर्ग ने बताया कि वे 36 साल तक हरियाणा सरकार में कर्मचारी रहे। पूरी जिंदगी सम्मान के साथ जीया है, लेकिन बच्चों के व्यवहार ने यहां आने पर मजबूर कर दिया। भाई हैं, बहन हैं, सभी हैं, लेकिन बच्चों के व्यवहार के कारण बिना बताए यहां चला आया हूं। दो में से एक बेटे ने ढूंढने का प्रयास किया। असिस्टेंट प्रोफेसर बेटी ने भी ढूंढने का प्रयास किया, लेकिन मैंने किसी को अपना पता नहीं बताया। मैं उनके अनुसार जिंदगी नहीं जी सकता। बताया कि बेटी की याद आ रही थी, उसे फोन करना चाह रहा था, लेकिन फिर पुराने दिन यादकर मोबाइल और सिम दोनों तोड़ दिया।
51 साल पहले हो गई थी पत्नी की मौत
वृद्धाश्रम में रह रहे एक बुजुर्ग ने बताया कि उसके तीन बेटे हैं। तीन बेटियां हैं। मॉडल टाउन में एक प्लाट भी था पर बेटों ने उसे बेच दिया। अब बेटों का लाखों का कारोबार है, लेकिन मेरे लिए नहीं है। इसी कारण मजबूरन यहां हूं। एक बेटे की फाइबर की दुकान है। दूसरे की परचून की तो तीसरे के पास मोबाइल की एजेंसी है। परिवार में केवल एक धेवती है, जो फोन करके हाल चाल पूछती है। इसके अलावा कोई मिलने नहीं आता। 51 साल पहले पत्नी की मौत के बाद बच्चों को माता-पिता दोनों का प्यार दिया, लेकिन अब उनकी बेरुखी झेलने को मजबूर हूं।
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विवाह नहीं किया, बुढ़ापे का सहरा नहीं
पीडब्ल्यूडी में कई साल तक बतौर टाइपिस्ट काम कर चुके एक बुजुर्ग की कहानी भी काफी दर्दनाक है। उसने बताया कि सर्विस में रहते हुए उसने भाइयों और उनके बच्चों के लिए सब कुछ किया, लेकिन अब बुढ़ापे में उसे संभालने वाला कोई नहीं है। यही कारण है कि वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर है।
बेटे की गाड़ी के लिए घर बेच दिया, बहू की बेरुखी ने पहुंचाया वृद्धाश्रम
पंजाब की रहने वाली एक बुजुर्ग माता अपनी दास्तां सुनाते हुए फफक पड़ी। उसने बताया कि पातड़ां में खुद का मकान छोटे बेटे की गाड़ी के लिए बेचना पड़ा। बाद में उसे जयपुर पुलिस ने नशे के मामले में गिरफ्तार कर लिया। दो पोते हैं, जो दादी को बहुत प्यार करते हैं। मैं भी उनके लिए तड़पती हूं, लेकिन बहू न खुद मिलने आती है, न पोतों को मिलने के लिए भेजती है। अब छोटे बेटे की जेल से रिहाई की उम्मीद है। विश्वास है कि वह जब बाहर आएगा तो यहां से ले जाएगा।
बेटा मास्टर है, बहू झगड़ा करती है
एक अन्य बुजुर्ग महिला ने कहा कि बेटा प्राइवेट टीचर है। उसकी बहू झगड़ा करती है। यहां पहले कुछ समय रहने के बाद घर चली गई थी, लेकिन बहू ने एक महीना रखने के बाद पेंशन के पैसे मांगें। झगड़ा करने लगी और फिर कहने लगी कि अपना झोला उठा और चली जा। फिर मजबूरन यहां आ गईं। अब यहां कोई अपना मिलने नहीं आता, लेकिन आश्रम में तीनों समय का खाना, चाय व अन्य सभी सुविधाएं मिल रही हैं। यहां कोई दिक्कत नहीं है। कमी है तो बस परिवार की।
ससुराल में सास तो मायके में भाई और भाभी को लगने लगी थी बोझ
एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि विवाह के कुछ समय बाद ही सास के साथ झगड़े के कारण मायके में रहने लगी थी, जहां माता पिता के जीवित रहते तो कोई दिक्कत नहीं थी। उनके बाद भाई-भाभी व अन्य को बोझ लगने लगी तो यहां आ गई। अपनी बहन के पास कुछ समय रही। बहन अपने साथ रखना चाहती थी, लेकिन बहन के घर रहने में शर्म आती है। इस कारण यहां आ गई। अब यहां मन लग गया है।
बहू झगड़ा करती थी...बेटा कहता था जहर पी लूंगा
एक बुजुर्ग माता ने कहा कि बेटा पीटता था। बहू को कुछ नहीं कहता था। बहू अक्सर झगड़ा करती थी। कभी कहता था कि इस झगड़े के कारण जहर पी लेगा। वह इस डर में यहां चली आई कि यदि वह मर गया तो उसके तीन बच्चों को कौन पालेगा? यहां कोई परेशानी नहीं हैं।
प्रधान बोले-बच्चों की तरह करनी चाहिए बुजुर्गों की देखभाल
मंदिर सभा के प्रधान रविभूषण गर्ग ने कहा कि समाज में बुजुर्गों को पूरी संवेदना व अपनेपन के साथ रखना चाहिए। उन्हें बच्चों जैसी देखभाल की जरूरत होती है। मंदिर सभा द्वारा प्रयास किया जाता है कि यहां बुजुर्गों को कोई परेशानी न हो। इन बुजुर्गों की पेंशन व अन्य आय से आश्रम को कोई लेना देना नहीं। आश्रम जनसहयोग से चल रहा है।
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परिवार को आज तक नहीं बताया मैं कहां हूं
आश्रम में दो माह पहले आए एक बुजुर्ग ने बताया कि वे 36 साल तक हरियाणा सरकार में कर्मचारी रहे। पूरी जिंदगी सम्मान के साथ जीया है, लेकिन बच्चों के व्यवहार ने यहां आने पर मजबूर कर दिया। भाई हैं, बहन हैं, सभी हैं, लेकिन बच्चों के व्यवहार के कारण बिना बताए यहां चला आया हूं। दो में से एक बेटे ने ढूंढने का प्रयास किया। असिस्टेंट प्रोफेसर बेटी ने भी ढूंढने का प्रयास किया, लेकिन मैंने किसी को अपना पता नहीं बताया। मैं उनके अनुसार जिंदगी नहीं जी सकता। बताया कि बेटी की याद आ रही थी, उसे फोन करना चाह रहा था, लेकिन फिर पुराने दिन यादकर मोबाइल और सिम दोनों तोड़ दिया।
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51 साल पहले हो गई थी पत्नी की मौत
वृद्धाश्रम में रह रहे एक बुजुर्ग ने बताया कि उसके तीन बेटे हैं। तीन बेटियां हैं। मॉडल टाउन में एक प्लाट भी था पर बेटों ने उसे बेच दिया। अब बेटों का लाखों का कारोबार है, लेकिन मेरे लिए नहीं है। इसी कारण मजबूरन यहां हूं। एक बेटे की फाइबर की दुकान है। दूसरे की परचून की तो तीसरे के पास मोबाइल की एजेंसी है। परिवार में केवल एक धेवती है, जो फोन करके हाल चाल पूछती है। इसके अलावा कोई मिलने नहीं आता। 51 साल पहले पत्नी की मौत के बाद बच्चों को माता-पिता दोनों का प्यार दिया, लेकिन अब उनकी बेरुखी झेलने को मजबूर हूं।
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विवाह नहीं किया, बुढ़ापे का सहरा नहीं
पीडब्ल्यूडी में कई साल तक बतौर टाइपिस्ट काम कर चुके एक बुजुर्ग की कहानी भी काफी दर्दनाक है। उसने बताया कि सर्विस में रहते हुए उसने भाइयों और उनके बच्चों के लिए सब कुछ किया, लेकिन अब बुढ़ापे में उसे संभालने वाला कोई नहीं है। यही कारण है कि वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर है।
बेटे की गाड़ी के लिए घर बेच दिया, बहू की बेरुखी ने पहुंचाया वृद्धाश्रम
पंजाब की रहने वाली एक बुजुर्ग माता अपनी दास्तां सुनाते हुए फफक पड़ी। उसने बताया कि पातड़ां में खुद का मकान छोटे बेटे की गाड़ी के लिए बेचना पड़ा। बाद में उसे जयपुर पुलिस ने नशे के मामले में गिरफ्तार कर लिया। दो पोते हैं, जो दादी को बहुत प्यार करते हैं। मैं भी उनके लिए तड़पती हूं, लेकिन बहू न खुद मिलने आती है, न पोतों को मिलने के लिए भेजती है। अब छोटे बेटे की जेल से रिहाई की उम्मीद है। विश्वास है कि वह जब बाहर आएगा तो यहां से ले जाएगा।
बेटा मास्टर है, बहू झगड़ा करती है
एक अन्य बुजुर्ग महिला ने कहा कि बेटा प्राइवेट टीचर है। उसकी बहू झगड़ा करती है। यहां पहले कुछ समय रहने के बाद घर चली गई थी, लेकिन बहू ने एक महीना रखने के बाद पेंशन के पैसे मांगें। झगड़ा करने लगी और फिर कहने लगी कि अपना झोला उठा और चली जा। फिर मजबूरन यहां आ गईं। अब यहां कोई अपना मिलने नहीं आता, लेकिन आश्रम में तीनों समय का खाना, चाय व अन्य सभी सुविधाएं मिल रही हैं। यहां कोई दिक्कत नहीं है। कमी है तो बस परिवार की।
ससुराल में सास तो मायके में भाई और भाभी को लगने लगी थी बोझ
एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि विवाह के कुछ समय बाद ही सास के साथ झगड़े के कारण मायके में रहने लगी थी, जहां माता पिता के जीवित रहते तो कोई दिक्कत नहीं थी। उनके बाद भाई-भाभी व अन्य को बोझ लगने लगी तो यहां आ गई। अपनी बहन के पास कुछ समय रही। बहन अपने साथ रखना चाहती थी, लेकिन बहन के घर रहने में शर्म आती है। इस कारण यहां आ गई। अब यहां मन लग गया है।
बहू झगड़ा करती थी...बेटा कहता था जहर पी लूंगा
एक बुजुर्ग माता ने कहा कि बेटा पीटता था। बहू को कुछ नहीं कहता था। बहू अक्सर झगड़ा करती थी। कभी कहता था कि इस झगड़े के कारण जहर पी लेगा। वह इस डर में यहां चली आई कि यदि वह मर गया तो उसके तीन बच्चों को कौन पालेगा? यहां कोई परेशानी नहीं हैं।
प्रधान बोले-बच्चों की तरह करनी चाहिए बुजुर्गों की देखभाल
मंदिर सभा के प्रधान रविभूषण गर्ग ने कहा कि समाज में बुजुर्गों को पूरी संवेदना व अपनेपन के साथ रखना चाहिए। उन्हें बच्चों जैसी देखभाल की जरूरत होती है। मंदिर सभा द्वारा प्रयास किया जाता है कि यहां बुजुर्गों को कोई परेशानी न हो। इन बुजुर्गों की पेंशन व अन्य आय से आश्रम को कोई लेना देना नहीं। आश्रम जनसहयोग से चल रहा है।