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चाचा के साथ मिलकर लड़ी लड़ाई
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16-कैथल। राजेश हवलदार।
- फोटो : Kaithal
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भूतपूर्व सैनिक राजेश ढुल ने कारगिल की लड़ाई में दुश्मन से जमकर लोहा लिया। उन्होंने बताया कि जब भी कारगिल की बात होती है तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंनेे बताया कि उसके परिवार के 14 सदस्य सेना से जुड़े हुए हैं। इनमें से छह बार्डर पर तैनात हैं। उन्होंने कहा कि कारगिल की लड़ाई उनके चाचा सूबेदार रणदीर सिंह के साथ मिलकर लड़ी है। हमारे सैनिकों को कोई जवाब नहीं है।
पाकिस्तान हो या चीन, हम शत्रु पर भारी पड़ते हैं। कारगिल की लड़ाई में साथियों की शहादत को याद करते हुए बताया कि शत्रु की चाल को विफल करने में आत्म बलिदान दिया। उन्होंने बताया कि वह 20 मार्च 1996 को सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1998 में बंगाल इंजीनियर ग्रुप सेंटर रुड़की में ट्रेनिंग के बाद वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में उतार दिए गए थे। वह 16 कोर ग्रुप में तैनात थे।
सेना में था राजेश ढुल का माइंस बनाने का काम
उसने बताया कि वह सेंटर के तौर पर सेना में भर्ती हुआ था, वह कोरशॉप इंजीनियर जवान था। इनका काम माइंस बनाना था, या कहीं बाढ़ आती है तो वहां पर पुल बनाना होता था। कारगिल युद्ध में उन्होंने एलओसी पर माइंस बिछा दी थी, ताकि दुश्मन हिंदुस्तान की सीमा में घुसपैठ न कर सके। उसने बताया कि माइंस एक ऐसा धोखे का फंदा होता है, जो आदमी को दुर्घटना होने के बाद ही पता चलता था कि यहां पर माइंस बिछी हुई है। माइंस अंडर ग्राउंड रहती है।
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कई-कई महीनों बाद पहुंचती थी चिट्ठी
उन्होंने बताया कि वह मोर्चे पर था, उस समय मोबाइल फोन नहीं होते थे, घर वालों की चिट्ठी ही पहुंचती थी, वो भी कई-कई महीनों बाद। लड़ाई के दौरान उनके पिता नरसिंह ढुल की चिट्ठी मिली। इसमें उन्होंने लिखा, बेटा तुम भारत मां की रक्षा कर रहे हो, अगर बलिदान भी देना पड़े तो पीछे नहीं हटना। पिता की इस चिट्ठी के बाद मेरा प्रण और भी पक्का हो गया था।
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पाकिस्तान हो या चीन, हम शत्रु पर भारी पड़ते हैं। कारगिल की लड़ाई में साथियों की शहादत को याद करते हुए बताया कि शत्रु की चाल को विफल करने में आत्म बलिदान दिया। उन्होंने बताया कि वह 20 मार्च 1996 को सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1998 में बंगाल इंजीनियर ग्रुप सेंटर रुड़की में ट्रेनिंग के बाद वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में उतार दिए गए थे। वह 16 कोर ग्रुप में तैनात थे।
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सेना में था राजेश ढुल का माइंस बनाने का काम
उसने बताया कि वह सेंटर के तौर पर सेना में भर्ती हुआ था, वह कोरशॉप इंजीनियर जवान था। इनका काम माइंस बनाना था, या कहीं बाढ़ आती है तो वहां पर पुल बनाना होता था। कारगिल युद्ध में उन्होंने एलओसी पर माइंस बिछा दी थी, ताकि दुश्मन हिंदुस्तान की सीमा में घुसपैठ न कर सके। उसने बताया कि माइंस एक ऐसा धोखे का फंदा होता है, जो आदमी को दुर्घटना होने के बाद ही पता चलता था कि यहां पर माइंस बिछी हुई है। माइंस अंडर ग्राउंड रहती है।
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कई-कई महीनों बाद पहुंचती थी चिट्ठी
उन्होंने बताया कि वह मोर्चे पर था, उस समय मोबाइल फोन नहीं होते थे, घर वालों की चिट्ठी ही पहुंचती थी, वो भी कई-कई महीनों बाद। लड़ाई के दौरान उनके पिता नरसिंह ढुल की चिट्ठी मिली। इसमें उन्होंने लिखा, बेटा तुम भारत मां की रक्षा कर रहे हो, अगर बलिदान भी देना पड़े तो पीछे नहीं हटना। पिता की इस चिट्ठी के बाद मेरा प्रण और भी पक्का हो गया था।