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35 वर्ष पहले बेटियों को खेलने के लिए नहीं भेजते थे अभिभावक
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कैथल। बेटियां किसी भी क्षेत्र में बेटों से कम नहीं हैं, इस बात को सार्थक कर दिखाया है कैथल की जिला खेल अधिकारी सुधा भासीन ने। अपने माता-पिता की इकलौती बेटी होते हुए भी उन्होंने अपने परिजनों को कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि उनका कोई बेटा नहीं है और न ही माता-पिता ने कभी बेटी को बेटे से कम नहीं समझा। हमेशा अपनी बेटी को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वह भी 35 साल पहले के उस दौर में जब बेटियाें को खेलों में कम मौका दिया जाता था। खेलों के प्रति बेटियों की रुचि भी कम थी। सुुधा की अपनी मेहनत और परिजनों के सहयोग का परिणाम है कि आज वह खेल अधिकारी के पद पर तैनात है।
सुधा भासीन ने बताया कि उनका जन्म स्थान अंबाला शहर है। उनके पिता आर्मी में थे। वह माता-पिता की इकलौती बेटी हैं। उन्होंने बीए अंबाला के देव समाज कॉलेज से और एमए एसके जैन कॉलेज अंबाला से अर्थशास्त्र विषय से किया। इसके बाद बीएड किया। 1991 में उन्होंने एनआईएस एथलेक्टिस का पटियाला से डिप्लोमा किया और उसके बाद खेल प्रशिक्षण की पंक्ति में आई। इसमें उनके परिवार भी उनका पूरा सहयोग किया। यह वह दौर था जब लड़कियों को खेलों में कम मौका दिया जाता था। इसके बावजूद परिवार ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
एनआईएस करते समय वे लगातार पांच साल तक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहीं। सुधा ने 100 और 200 मीटर की दौड़, लंबीकूद में खेलते हुए तीनों खेलों में राष्ट्रीय पदक प्राप्त किए हैं। 100 मीटर की दौड़ में कांस्य और 200 मीटर दौड़, लंबी कूद में रजत पदक विजेता हैं। 1992 में उनकी एथलेटिक्स कोच के रूप में नियुक्ति हुई। इससे पहले पुलिस में एएसआई व रेलवे की तरफ से भी नियुक्ति का ऑफर आया, लेकिन खेल में रुचि होने के कारण उन्होंने इस क्षेत्र को चुना। एनआईएस करते समय उनकी माता का निधन हो गया था। फिर पिता के सहयोग से वे लगातार आगे बढ़तीं रहीं। बेटियों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि बेटियां पढ़ाई के साथ मेहनत से खेलें। सरकार भी खेलों को बढ़ावा दे रही हैं। माता-पिता भी बेटियों को आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग करें। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी पलक भी फुटबॉल में और बेटा सौरभ शॉटपुट में राष्ट्र स्तर के खिलाड़ी हैं।
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सुधा भासीन ने बताया कि उनका जन्म स्थान अंबाला शहर है। उनके पिता आर्मी में थे। वह माता-पिता की इकलौती बेटी हैं। उन्होंने बीए अंबाला के देव समाज कॉलेज से और एमए एसके जैन कॉलेज अंबाला से अर्थशास्त्र विषय से किया। इसके बाद बीएड किया। 1991 में उन्होंने एनआईएस एथलेक्टिस का पटियाला से डिप्लोमा किया और उसके बाद खेल प्रशिक्षण की पंक्ति में आई। इसमें उनके परिवार भी उनका पूरा सहयोग किया। यह वह दौर था जब लड़कियों को खेलों में कम मौका दिया जाता था। इसके बावजूद परिवार ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
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एनआईएस करते समय वे लगातार पांच साल तक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहीं। सुधा ने 100 और 200 मीटर की दौड़, लंबीकूद में खेलते हुए तीनों खेलों में राष्ट्रीय पदक प्राप्त किए हैं। 100 मीटर की दौड़ में कांस्य और 200 मीटर दौड़, लंबी कूद में रजत पदक विजेता हैं। 1992 में उनकी एथलेटिक्स कोच के रूप में नियुक्ति हुई। इससे पहले पुलिस में एएसआई व रेलवे की तरफ से भी नियुक्ति का ऑफर आया, लेकिन खेल में रुचि होने के कारण उन्होंने इस क्षेत्र को चुना। एनआईएस करते समय उनकी माता का निधन हो गया था। फिर पिता के सहयोग से वे लगातार आगे बढ़तीं रहीं। बेटियों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि बेटियां पढ़ाई के साथ मेहनत से खेलें। सरकार भी खेलों को बढ़ावा दे रही हैं। माता-पिता भी बेटियों को आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग करें। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी पलक भी फुटबॉल में और बेटा सौरभ शॉटपुट में राष्ट्र स्तर के खिलाड़ी हैं।
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