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Kaithal News: दुसेरपुर में 300 साल से नहीं मनाई जा रही होली
Mon, 25 Mar 2024 03:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Mon, 25 Mar 2024 03:18 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
गुहला-चीका। दुसेरपुर गांव में होली के दिन रंग नहीं चलता। गांव वालों के मुताबिक, करीब 300 साल से गांव में होली का पर्व नहीं मनाया जा रहा। गांव में इस संबंध में बोर्ड लिखकर भी होली न मनाने की बात कही गई है।
ग्रामीणों के मुताबिक, एक साधु की ओर से दिए गए श्राप के कारण यहां पर होली पर्व पर न तो कोई खुशी मनाई जाती और न ही किसी प्रकार का रंग गुलाल उड़ाया जाता है। प्रत्येक वर्ष होली पर यही माहौल होता है।
गांव के ज्ञान नंबरदार ने बताया कि यहां के ग्रामीण एक साधु के श्राप से भयभीत होकर होली नहीं खेलते हैं। होली न मनाए जाने को लेकर ग्राम पंचायत की तरफ से गांव में एक सूचना पट्ट भी लगाया गया है। इस पर होली न मनाने को लेकर सूचना दी गई है। ग्रामीणों के अनुसार करीब 200 साल पहले गांव में एक छोटे कद का साधु रहता था। साधु स्नेही राम ने होली के दिन ग्रामीणों के सामने कोई मांग रखी थी, जिसे ग्रामीण पूरा नहीं कर पाए थे। अपनी मांग पूरी ना होने से गुस्साए बाबा स्नेही राम ने होली के दिन समाधि ले अपने प्राण त्याग दिए थे।
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दूसरी कथा यह भी प्रचलित है कि लोगों ने मिल जुलकर एक स्थान पर होलिका दहन के लिए सुखी लकड़ियां, उपले व अन्य समान इकट्ठा किया था, लेकिन दहन के निश्चित समय से पहले गांव के ही कुछ युवकों को शरारत में समय से पहले ही होलिका दहन किया। इस पर बाबा स्नेही दास ने उन्हें समय से पहले होलिका दहन करने से रोका, लेकिन वह नहीं रुके। बताया जाता है कि उन युवकों ने बाबा के छोटे कद का मजाक उड़ाते हुए समय से पहले ही होली का दहन कर दिया। युवाओं के इस कार्य से बाबा गुस्से से भर उठे और जलती होली में कूद पड़े।
बताया जाता है कि होलिका में जलते-जलते बाबा ने ग्रामीणों को श्राप भी दे दिया कि आज के बाद इस गांव में होली का त्योहार नहीं मनाया जाएगा और यदि किसी ने होली का पर्व मनाने का प्रयास किया तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उस समय बाबा से युवकों की गलती के लिए माफी मांगी थी, परंतु बाबा ने माफी देने से तो इनकार कर दिया, लेकिन गांव वालों को श्राप से मुक्त होने का वरदान देते हुए कहा था कि होली के दिन गांव में किसी भी ग्रामीण की गाय को बछड़ा व उसी दिन गांव की ही किसी महिला के यहां यदि लड़का पैदा होता है तो उन्हें श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।
फिलहाल पिछले 200 वर्षों में होली के दिन गांव में यह संयोग नहीं बना। अपने बुजुर्गों द्वारा बताई गई रीतों का पालन करते हुए जहां कुछ ग्रामीण आज भी मीठी रोटी बनाकर बाबा स्नेही दास की समाधि पर पूजा करते हैं। वहीं, कुछ लोग बाबा की याद में केवल एक दीपक जलाते हैं।
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गुहला-चीका। दुसेरपुर गांव में होली के दिन रंग नहीं चलता। गांव वालों के मुताबिक, करीब 300 साल से गांव में होली का पर्व नहीं मनाया जा रहा। गांव में इस संबंध में बोर्ड लिखकर भी होली न मनाने की बात कही गई है।
ग्रामीणों के मुताबिक, एक साधु की ओर से दिए गए श्राप के कारण यहां पर होली पर्व पर न तो कोई खुशी मनाई जाती और न ही किसी प्रकार का रंग गुलाल उड़ाया जाता है। प्रत्येक वर्ष होली पर यही माहौल होता है।
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गांव के ज्ञान नंबरदार ने बताया कि यहां के ग्रामीण एक साधु के श्राप से भयभीत होकर होली नहीं खेलते हैं। होली न मनाए जाने को लेकर ग्राम पंचायत की तरफ से गांव में एक सूचना पट्ट भी लगाया गया है। इस पर होली न मनाने को लेकर सूचना दी गई है। ग्रामीणों के अनुसार करीब 200 साल पहले गांव में एक छोटे कद का साधु रहता था। साधु स्नेही राम ने होली के दिन ग्रामीणों के सामने कोई मांग रखी थी, जिसे ग्रामीण पूरा नहीं कर पाए थे। अपनी मांग पूरी ना होने से गुस्साए बाबा स्नेही राम ने होली के दिन समाधि ले अपने प्राण त्याग दिए थे।
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दूसरी कथा यह भी प्रचलित है कि लोगों ने मिल जुलकर एक स्थान पर होलिका दहन के लिए सुखी लकड़ियां, उपले व अन्य समान इकट्ठा किया था, लेकिन दहन के निश्चित समय से पहले गांव के ही कुछ युवकों को शरारत में समय से पहले ही होलिका दहन किया। इस पर बाबा स्नेही दास ने उन्हें समय से पहले होलिका दहन करने से रोका, लेकिन वह नहीं रुके। बताया जाता है कि उन युवकों ने बाबा के छोटे कद का मजाक उड़ाते हुए समय से पहले ही होली का दहन कर दिया। युवाओं के इस कार्य से बाबा गुस्से से भर उठे और जलती होली में कूद पड़े।
बताया जाता है कि होलिका में जलते-जलते बाबा ने ग्रामीणों को श्राप भी दे दिया कि आज के बाद इस गांव में होली का त्योहार नहीं मनाया जाएगा और यदि किसी ने होली का पर्व मनाने का प्रयास किया तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उस समय बाबा से युवकों की गलती के लिए माफी मांगी थी, परंतु बाबा ने माफी देने से तो इनकार कर दिया, लेकिन गांव वालों को श्राप से मुक्त होने का वरदान देते हुए कहा था कि होली के दिन गांव में किसी भी ग्रामीण की गाय को बछड़ा व उसी दिन गांव की ही किसी महिला के यहां यदि लड़का पैदा होता है तो उन्हें श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।
फिलहाल पिछले 200 वर्षों में होली के दिन गांव में यह संयोग नहीं बना। अपने बुजुर्गों द्वारा बताई गई रीतों का पालन करते हुए जहां कुछ ग्रामीण आज भी मीठी रोटी बनाकर बाबा स्नेही दास की समाधि पर पूजा करते हैं। वहीं, कुछ लोग बाबा की याद में केवल एक दीपक जलाते हैं।