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430 वर्ष पुराने बाबा शीतलपुरी के डेरे में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
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historical place
- फोटो : Kaithal
शहर में स्थित डेरा बाबा शीतलपुरी की जिले के साथ-साथ प्रदेश व देशभर में मान्यता है। बाबा के डेरे में हर दिन श्रद्धालु पूजा अर्चना के लिए पहुंचते हैं। करीब 430 वर्ष पुराने इस डेरे में पूजा-अर्चना करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। शहर में पिहोवा चौक के पास बनी बाबा शाह कमाल लाल दयाल की दरगाह के साथ भी डेरे का संबंध है। माना जाता है कि बाबा शीतलपुरी और बाबा शाह कमाल में घनिष्ठ मित्रता थी, जिनकी दोस्ती के आज भी चर्चे हैं। बाबा शाह कमाल लाल दयाल की दरगाह पर लगने वाले सालाना उर्स मेले में पहली चादर डेरे की ओर से चढ़ाई जाती है। ऐसे ही डेरे में लगने वाले मेले में भी सबसे पहले दरगाह की ओर से बाबा शीतलपुरी की प्रतिमा पर पगड़ी पहनाई जाती है। यही परंपरा शुरूआत से लेकर अब तक ज्यों की त्यों जारी है। बाबा शीतलपुरी के डेरे में बाबा की समाधि के निकट बाबा शाह कमाल की ज्योति जलाई जाती है।
ये है डेरे का इतिहास : डेरा बाबा राजपुरी बाबा लदाना के महंत बाबा दूजपुरी ने बताया कि आज से करीब 430 वर्ष पहले बाबा शाह कमाल बगदाद में खलीफा थे। उनका सामान कैथल से होकर वहां जाता था। एक बार जब कैथल से उनका सामान जा रहा था तो बाबा शीतलपुरी ने सारा सामान यहीं रोक लिया और साधुओं को भोजन करवाने में लगा दिया। जब बाबा शाह कमाल को इस बात का पता चला तो वे तुरंत वहां से शेर पर सवार होकर और हाथ में सर्प का कोड़ा लेकर बाबा शीतलपुरी से मुकाबला करने कैथल पहुंचे। बाबा शीतलपुरी एक दीवार पर बैठे दातुन कर रहे थे। उन्होंने दीवार से कहा कि ये फकीर इतनी दूर से चलकर आए हैं तो चार कदम तुम भी इनकी ओर चल पड़ो। जैसे ही दीवार चार कदम आगे बढ़ी तो बाबा शाह कमाल कादरी इसे देखकर दंग रह गए और उन्होंने बाबा शीतलपुरी से प्रभावित होकर उनसे मित्रता कर ली। जब उन्होंने अपने शेर को छोड़ने और सांप के कोड़े को रखने के लिए जगह पूछी तो बाबा शीलपुरी ने अपनी चरती हुई गायों के बीच शेर को छोड़ दिया और सांप के कोड़े को खूंटी पर लटका दिया। हालांकि बाबा शाह कमाल को भय था कि कहीं शेर गायों को न खा जाए, लेकिन हुआ इसके उल्टा। गायें शेर को खाने लगी और खूंटी सांप को। तब बाबा शाह कमाल के कहने पर बाबा शीतलपुरी ने गायों और खूंटी को कहा कि वे शेर और सांप को छोड़ दें। ऐसे में गायों ने शेर को और खूंटी से सांप को छोड़ दिया। तब से वे दोनों मित्र आपस में मिलजुल कर अपने पशुओं को चराने लगे। बाबा शाह कमाल ने भी बगदाद वापस जाने से मना कर दिया।
दोनों जगहों पर पूजा करते हैं श्रद्धालु: डेरे में पूजा करने के लिए पहुंचे श्रद्धालु पवन कुमार ने बताया कि डेरे की मान्यता प्राचीन समय से ही है। बाबा शीतलपुरी का डेरा और बाबा शाह कमाल की दरगाह हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं। उनके पूर्वजों से लेकर वे अब तक यहां पूजा करने के लिए आते हैं। दोनों जगहों पर पूजा-पाठ करके मन्नतें मांगते हैं।
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ये है डेरे का इतिहास : डेरा बाबा राजपुरी बाबा लदाना के महंत बाबा दूजपुरी ने बताया कि आज से करीब 430 वर्ष पहले बाबा शाह कमाल बगदाद में खलीफा थे। उनका सामान कैथल से होकर वहां जाता था। एक बार जब कैथल से उनका सामान जा रहा था तो बाबा शीतलपुरी ने सारा सामान यहीं रोक लिया और साधुओं को भोजन करवाने में लगा दिया। जब बाबा शाह कमाल को इस बात का पता चला तो वे तुरंत वहां से शेर पर सवार होकर और हाथ में सर्प का कोड़ा लेकर बाबा शीतलपुरी से मुकाबला करने कैथल पहुंचे। बाबा शीतलपुरी एक दीवार पर बैठे दातुन कर रहे थे। उन्होंने दीवार से कहा कि ये फकीर इतनी दूर से चलकर आए हैं तो चार कदम तुम भी इनकी ओर चल पड़ो। जैसे ही दीवार चार कदम आगे बढ़ी तो बाबा शाह कमाल कादरी इसे देखकर दंग रह गए और उन्होंने बाबा शीतलपुरी से प्रभावित होकर उनसे मित्रता कर ली। जब उन्होंने अपने शेर को छोड़ने और सांप के कोड़े को रखने के लिए जगह पूछी तो बाबा शीलपुरी ने अपनी चरती हुई गायों के बीच शेर को छोड़ दिया और सांप के कोड़े को खूंटी पर लटका दिया। हालांकि बाबा शाह कमाल को भय था कि कहीं शेर गायों को न खा जाए, लेकिन हुआ इसके उल्टा। गायें शेर को खाने लगी और खूंटी सांप को। तब बाबा शाह कमाल के कहने पर बाबा शीतलपुरी ने गायों और खूंटी को कहा कि वे शेर और सांप को छोड़ दें। ऐसे में गायों ने शेर को और खूंटी से सांप को छोड़ दिया। तब से वे दोनों मित्र आपस में मिलजुल कर अपने पशुओं को चराने लगे। बाबा शाह कमाल ने भी बगदाद वापस जाने से मना कर दिया।
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दोनों जगहों पर पूजा करते हैं श्रद्धालु: डेरे में पूजा करने के लिए पहुंचे श्रद्धालु पवन कुमार ने बताया कि डेरे की मान्यता प्राचीन समय से ही है। बाबा शीतलपुरी का डेरा और बाबा शाह कमाल की दरगाह हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं। उनके पूर्वजों से लेकर वे अब तक यहां पूजा करने के लिए आते हैं। दोनों जगहों पर पूजा-पाठ करके मन्नतें मांगते हैं।
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