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हरियाणा बनने के बाद से लेकर अब तक खाद्यान्न उत्पादन में 7 गुना बढ़ोतरी
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प्रदेश के अन्न दाता की मेहनत के बल पर एक नवंबर 1966 से लेकर अब तक हरियाणा ने कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व तरक्की की है। आज हरियाणा अपने साथ-साथ देश में कई ऐसे क्षेत्रों का पेट भर रहा है, जहां खाद्यान्न उत्पादन कम होता है। केंद्रीय पूल में हर साल हरियाणा का बड़ा योगदान रहता है। खाद्यान्न उत्पादन हरियाणा गठन के समय जो 25.92 लाख एमटी था। वह आज बढ़कर 1.84 करोड़ एमटी हो गया है। इसी प्रकार से तेलों के उत्पादन में भी करीब 12 गुणा वृद्धि की है। जो 92 हजार एमटी से बढ़कर 12.77 लाख एमटी हो गया है। गन्ना उत्पादन लगभग दोगुना हुआ है।
हरित क्रांति में हरियाणा के किसान ने पेश किया उदाहरण
हरियाणा में किसानों ने इतनी मेहनत की कि खाद्यान्न के क्षेत्र में न केवल प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाया। बल्कि चावल, गेहूं व अन्य खाद्यान्न में देश के अनेकों क्षेत्रों में अन्न भेजकर वहां के लोगों की भूख मिटा रहा है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में 1966-67 में खाद्यान्न के लिए 35.20 लाख हेक्टेयर का कृषि क्षेत्र था। अब 47.03 लाख हेक्टेयर में प्रदेश का किसान फसलें उगाता है। औसत उत्पादन उस समय महज 7.36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। जो आज बढ़कर 39.16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है। खाद्य तेलों का एरिया 2.12 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.25 लाख हेक्टेयर हो गया है। ऑयल सीड में औसत उत्पादन में 4.34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 20.43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक तरक्की हासिल की है।
कृषि विभाग में डिप्टी डायरेक्टर रहे इस समय कैथल में डीडीए का काम देख रहे डा. कर्मचंद ने खाद्यान्न क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व तरक्की का श्रेय प्रदेश के अन्नदाता व सरकार की नीतियों को दिया। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के दौरान हरियाणा का किसान आगे आया और परिवर्तन को स्वीकार करके आगे बढ़ा। जिसका परिणाम है कि आज पूरा प्रदेश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ केंद्रीय पूल में 17 प्रतिशत का बड़ा योगदान रहता है। यहां के चावल ने विदेशों करीब-करीब हर देश में अपनी खुशबू बिखेरी है।
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हरित क्रांति में हरियाणा के किसान ने पेश किया उदाहरण
हरियाणा में किसानों ने इतनी मेहनत की कि खाद्यान्न के क्षेत्र में न केवल प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाया। बल्कि चावल, गेहूं व अन्य खाद्यान्न में देश के अनेकों क्षेत्रों में अन्न भेजकर वहां के लोगों की भूख मिटा रहा है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में 1966-67 में खाद्यान्न के लिए 35.20 लाख हेक्टेयर का कृषि क्षेत्र था। अब 47.03 लाख हेक्टेयर में प्रदेश का किसान फसलें उगाता है। औसत उत्पादन उस समय महज 7.36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। जो आज बढ़कर 39.16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है। खाद्य तेलों का एरिया 2.12 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.25 लाख हेक्टेयर हो गया है। ऑयल सीड में औसत उत्पादन में 4.34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 20.43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक तरक्की हासिल की है।
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कृषि विभाग में डिप्टी डायरेक्टर रहे इस समय कैथल में डीडीए का काम देख रहे डा. कर्मचंद ने खाद्यान्न क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व तरक्की का श्रेय प्रदेश के अन्नदाता व सरकार की नीतियों को दिया। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के दौरान हरियाणा का किसान आगे आया और परिवर्तन को स्वीकार करके आगे बढ़ा। जिसका परिणाम है कि आज पूरा प्रदेश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ केंद्रीय पूल में 17 प्रतिशत का बड़ा योगदान रहता है। यहां के चावल ने विदेशों करीब-करीब हर देश में अपनी खुशबू बिखेरी है।
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