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बेटी के जन्म पर कुआं पूजन कर गांव में डाली नई परंपरा
ब्यूरो कैथल
Updated Mon, 07 Nov 2016 12:04 AM IST
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बेटी के जन्म पर सभी रस्में निभाई
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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समाज में नित्य बदलाव लाने के लिए एक आदर्श के रूप में स्थापित होती जा रही है गांव खरक पांडवा की बहू पूनम। प्रदीप कुमार के साथ सात फेरे लेने वाली पूनम को पहली संतान के रूप में बेटी मिली तो वे सब रस्में पूरी की गई जो बेटा पैदा होने पर की जाती हैं। थाली बजाना, खुशियां मनाना, मिठाई बांटने जैसे रिवाज निभाई गई। बेटी के जन्म पर कुआं पूजन की रस्म को निभा कर पूनम ने गांव में एक नई परंपरा व बेटियों के जन्म के प्रति एक नई सोच को जन्म दिया है। कुआं पूजन पर बैंड बाजे के साथ महिलाओं ने नाच गाकर इस नई परंपरा में अपनी प्रतिभागिता दर्ज करवाई।
पूनम ने बताया कि वह 2015 में गांव खरक पांडवा में ब्याह कर आई थी। गांव का माहौल, उसपर हरिजन परिवार, केवल बंदिशें ही बंदिशें। जो बंदिश उनको सबसे अधिक खलती थी, वह थी परदा प्रथा। विवाह के साथ ही उसने निर्णय लिया कि वह परदा नहीं करेंगी और अन्य महिलाओं को भी इसके लिए प्रेरित करेंगी। शुरू में उन पर इस बात को लेकर दबाव बनाया गया कि बिना परदा वे घर से बाहर न निकले। पर पूनम को परदा स्वीकार ही नहीं था। इस कार्य में उनके पति प्रदीप कुमार व ससुर धुलिया राम ने उसका पूरा सहयोग किया। पूनम का कहना है कि परदे का मतलब बुजुर्गों से शर्म है तो वह घूंघट से बाहर निकल कर भी की जा सकती है। उनका कहना है कि शर्म बेटी व बहू की आंखों व कृत्य में होनी चाहिए। लड़की विवाह के बाद अपने परिवार को छोड़ कर दूसरे परिवार में उस सदस्य के रूप में आती है जो पूरे परिवार का जिम्मा अपने कंधों पर उठाती है।
बेटी के जन्म से अभिभूत पूनम व प्रदीप का कहना है कि उनका सपना था की उनके घर पहली संतान बेटी ही जन्म ले। प्रिशा के रूप में उनके घर पर पहली बेटी के जन्म पर पूरा परिवार शगुन मना रहा है। प्रदीप का कहना है कि सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना रूट लेवल तक तभी सफल होगी जब हम अपनी सोच को बदलेंगे तथा बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं समझेंगे। आज हुए कुआं पूजन समारोह से गांव खरक पांडवा में एक नई परंपरा को जन्म दिया है।
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पूनम ने बताया कि वह 2015 में गांव खरक पांडवा में ब्याह कर आई थी। गांव का माहौल, उसपर हरिजन परिवार, केवल बंदिशें ही बंदिशें। जो बंदिश उनको सबसे अधिक खलती थी, वह थी परदा प्रथा। विवाह के साथ ही उसने निर्णय लिया कि वह परदा नहीं करेंगी और अन्य महिलाओं को भी इसके लिए प्रेरित करेंगी। शुरू में उन पर इस बात को लेकर दबाव बनाया गया कि बिना परदा वे घर से बाहर न निकले। पर पूनम को परदा स्वीकार ही नहीं था। इस कार्य में उनके पति प्रदीप कुमार व ससुर धुलिया राम ने उसका पूरा सहयोग किया। पूनम का कहना है कि परदे का मतलब बुजुर्गों से शर्म है तो वह घूंघट से बाहर निकल कर भी की जा सकती है। उनका कहना है कि शर्म बेटी व बहू की आंखों व कृत्य में होनी चाहिए। लड़की विवाह के बाद अपने परिवार को छोड़ कर दूसरे परिवार में उस सदस्य के रूप में आती है जो पूरे परिवार का जिम्मा अपने कंधों पर उठाती है।
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बेटी के जन्म से अभिभूत पूनम व प्रदीप का कहना है कि उनका सपना था की उनके घर पहली संतान बेटी ही जन्म ले। प्रिशा के रूप में उनके घर पर पहली बेटी के जन्म पर पूरा परिवार शगुन मना रहा है। प्रदीप का कहना है कि सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना रूट लेवल तक तभी सफल होगी जब हम अपनी सोच को बदलेंगे तथा बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं समझेंगे। आज हुए कुआं पूजन समारोह से गांव खरक पांडवा में एक नई परंपरा को जन्म दिया है।
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