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वीजा लेना आसान, लेकिन ग्रांट लेना मुश्किल
ब्यूरो/अमर उजाला, कैथ्ाल
Updated Mon, 30 Jun 2014 12:02 AM IST
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कैथल। देश भर में महिलाओं को खुले में शौच से मुक्ति दिलवाने के लिए चलाए जा रहे निर्मल भारत अभियान के तहत शौचालय बनवाना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है।
अभियान के तहत शौचालय बनाने के लिए ग्रांट लेने के लिए जितनी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है, उतने में तो शायद अमेरिका का वीजा भी मिल जाएगा।
दरअसल, लंबी प्रक्रिया के बाद ग्रांट मिलेगी 4600 रुपये और इन्हें हासिल करने के लिए आवेदनकर्ता सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर काट-काट कर थक जाता है। कागजाें में शौचालयों का निर्माण धड़ल्ले से जारी है। ऐसे में इसकी जांच होगी या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन फिल्हाल महिलाओं को खुले में शौच जाने से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है। जिसका खामियाजा उन्हें सुरक्षा का रिस्क लेकर उठाना पड़ रहा है।
एडीसी कार्यालय के अनुसार. शौचालय बनवाने के लिए इस समय सरकार द्वारा 4600 रुपये की सहायता राशि निर्मल भारत अभियान के तहत दी जा रही है। इसे प्राप्त करने के लिए आवेदनकर्ता को एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
यह है पूरी प्रक्रिया
यदि किसी व्यक्ति को शौचालय के लिए आवेदन करना है तो सबसे पहले उसका नाम वर्ष 2012 में हुए बेसलाइन सर्वे में होना अनिवार्य है। इसके बाद उसे सरपंच के पास आवेदन करना होगा। सरपंच ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर बीडीपीओ कार्यालय में तैनात निर्मल भारत अभियान के तहत नियुक्त एबीपीओ को प्रस्ताव की नकल देगा। इसके बाद एबीपीओ इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए एडीसी कार्यालय में एडमिन अप्रूवल के लिए भेजेगा। जहां से आवेदनकर्ता का मनरेगा योजना के तहत जॉब कार्ड बनवाया जाएगा।
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इस जॉब कार्ड के बनने के बाद मसटररोल जारी होता है। इस मसटररोल के जारी होने के 15 दिनों के अंदर-अंदर आवेदनकर्ता को अपना पैसा खर्च करके शौचालय का निर्माण करवाना होगा। इसके बाद पंचायत विभाग में जेई उस काम की एमबी भरेगा। एमबी भरने के बाद फिर से इसे एबीपीओ को दिया जाएगा। एबीपीओ इस एमबी की रिकॉर्ड में एंट्री करके सरपंच को मसटररोल पूरा करने के लिए भेजेगा।
वहां से जब यह वापस आएगा तो फिर वेज लिस्ट बनाई जाएगी। इस वेज लिस्ट के बनने के बाद आवेदनकर्ता को अपना बैंक में खाता खुलवाना होगा। इस बैंक खाते में ही निर्मल भारत अभियान के तहत उसे 4600 रुपये की सहायता राशि मिलेगी।
मनरेगा के तहत भी हैं कई अड़चनें
इसके अलावा यदि मनरेगा के तहत दी जाने वाली 5400 रुपये की राशि भी लेनी हो तो वेजलिस्ट बनने के बाद ही मनरेगा से भी 5400 रुपये की राशि मिलती है, जिसमें कैथल में सामान्यत: ईंटें ही दी जाती हैं। क्योंकि मनरेगा की राशि में से 40 प्रतिशत सामान एवं 60 प्रतिशत राशि मजदूरी पर खर्च करनी पड़ती है। इस तरह से एक व्यक्ति को शौचालय की राशि प्राप्त करने के लिए उक्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके साथ-साथ आवास योजना के तहत जोड़कर जब यह राशि दी जाती है तो 81000 रुपये के अलावा 10000 रुपये और देकर कुल 91000 रुपये दिए जाते हैं।
चार योजनाओं को जोड़कर क्रियान्वयन
अधिकारी एक साथ चार-चार योजनाओं को जोड़कर क्रियान्वित कर रहे हैं। इसमें निर्मल भारत अभियान, इंदिरा गांधी आवास योजना, प्रियदर्शिनी आवास योजना एवं महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना। बेशक आवेदनकर्ता को आवेदन के अलावा इन योजनाओं की कागजी कार्रवाई से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन प्रशासनिक तौर पर मंजूरी के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया है कि आवेदनकर्ता तक लाभ पहुंचते-पहुंचते योजना का लाभ लगभग न के बराबर हो जाता है।
राजौंद में एक भी सामूहिक शौचालय नहीं
जिले के कई कस्बों एवं गांवाें में खुले में शौच की बड़ी समस्या है। पूरे राजौंद में एक भी सामूहिक शौचालय नहीं है। बस्तियों में लोगों ने अपने शौचालय तो बनवा लिए हैं, लेकिन बहुत से ऐसे गरीब व्यक्ति हैं, जिन्हें शौचालय निर्माण में सरकार की सहायता की दरकार है। ऐसा ही हाल कलायत, गुहला-चीका के कई बड़े गांवों में है। जहां शौचालय बनवाए जाने की आवश्यकता है। जिले में वर्ष 2013-14 में जिले भर में 3083 शौचालय बनाए गए हैं। जबकि निर्धारित लक्ष्य इस साल में 15000 शौचालय बनाने का है।
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अभियान के तहत शौचालय बनाने के लिए ग्रांट लेने के लिए जितनी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है, उतने में तो शायद अमेरिका का वीजा भी मिल जाएगा।
दरअसल, लंबी प्रक्रिया के बाद ग्रांट मिलेगी 4600 रुपये और इन्हें हासिल करने के लिए आवेदनकर्ता सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर काट-काट कर थक जाता है। कागजाें में शौचालयों का निर्माण धड़ल्ले से जारी है। ऐसे में इसकी जांच होगी या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन फिल्हाल महिलाओं को खुले में शौच जाने से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है। जिसका खामियाजा उन्हें सुरक्षा का रिस्क लेकर उठाना पड़ रहा है।
एडीसी कार्यालय के अनुसार. शौचालय बनवाने के लिए इस समय सरकार द्वारा 4600 रुपये की सहायता राशि निर्मल भारत अभियान के तहत दी जा रही है। इसे प्राप्त करने के लिए आवेदनकर्ता को एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
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यह है पूरी प्रक्रिया
यदि किसी व्यक्ति को शौचालय के लिए आवेदन करना है तो सबसे पहले उसका नाम वर्ष 2012 में हुए बेसलाइन सर्वे में होना अनिवार्य है। इसके बाद उसे सरपंच के पास आवेदन करना होगा। सरपंच ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर बीडीपीओ कार्यालय में तैनात निर्मल भारत अभियान के तहत नियुक्त एबीपीओ को प्रस्ताव की नकल देगा। इसके बाद एबीपीओ इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए एडीसी कार्यालय में एडमिन अप्रूवल के लिए भेजेगा। जहां से आवेदनकर्ता का मनरेगा योजना के तहत जॉब कार्ड बनवाया जाएगा।
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इस जॉब कार्ड के बनने के बाद मसटररोल जारी होता है। इस मसटररोल के जारी होने के 15 दिनों के अंदर-अंदर आवेदनकर्ता को अपना पैसा खर्च करके शौचालय का निर्माण करवाना होगा। इसके बाद पंचायत विभाग में जेई उस काम की एमबी भरेगा। एमबी भरने के बाद फिर से इसे एबीपीओ को दिया जाएगा। एबीपीओ इस एमबी की रिकॉर्ड में एंट्री करके सरपंच को मसटररोल पूरा करने के लिए भेजेगा।
वहां से जब यह वापस आएगा तो फिर वेज लिस्ट बनाई जाएगी। इस वेज लिस्ट के बनने के बाद आवेदनकर्ता को अपना बैंक में खाता खुलवाना होगा। इस बैंक खाते में ही निर्मल भारत अभियान के तहत उसे 4600 रुपये की सहायता राशि मिलेगी।
मनरेगा के तहत भी हैं कई अड़चनें
इसके अलावा यदि मनरेगा के तहत दी जाने वाली 5400 रुपये की राशि भी लेनी हो तो वेजलिस्ट बनने के बाद ही मनरेगा से भी 5400 रुपये की राशि मिलती है, जिसमें कैथल में सामान्यत: ईंटें ही दी जाती हैं। क्योंकि मनरेगा की राशि में से 40 प्रतिशत सामान एवं 60 प्रतिशत राशि मजदूरी पर खर्च करनी पड़ती है। इस तरह से एक व्यक्ति को शौचालय की राशि प्राप्त करने के लिए उक्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके साथ-साथ आवास योजना के तहत जोड़कर जब यह राशि दी जाती है तो 81000 रुपये के अलावा 10000 रुपये और देकर कुल 91000 रुपये दिए जाते हैं।
चार योजनाओं को जोड़कर क्रियान्वयन
अधिकारी एक साथ चार-चार योजनाओं को जोड़कर क्रियान्वित कर रहे हैं। इसमें निर्मल भारत अभियान, इंदिरा गांधी आवास योजना, प्रियदर्शिनी आवास योजना एवं महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना। बेशक आवेदनकर्ता को आवेदन के अलावा इन योजनाओं की कागजी कार्रवाई से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन प्रशासनिक तौर पर मंजूरी के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया है कि आवेदनकर्ता तक लाभ पहुंचते-पहुंचते योजना का लाभ लगभग न के बराबर हो जाता है।
राजौंद में एक भी सामूहिक शौचालय नहीं
जिले के कई कस्बों एवं गांवाें में खुले में शौच की बड़ी समस्या है। पूरे राजौंद में एक भी सामूहिक शौचालय नहीं है। बस्तियों में लोगों ने अपने शौचालय तो बनवा लिए हैं, लेकिन बहुत से ऐसे गरीब व्यक्ति हैं, जिन्हें शौचालय निर्माण में सरकार की सहायता की दरकार है। ऐसा ही हाल कलायत, गुहला-चीका के कई बड़े गांवों में है। जहां शौचालय बनवाए जाने की आवश्यकता है। जिले में वर्ष 2013-14 में जिले भर में 3083 शौचालय बनाए गए हैं। जबकि निर्धारित लक्ष्य इस साल में 15000 शौचालय बनाने का है।