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लोहड़ी मनाने के लिए अफ्रीका से खिंचा चला आया परिवार
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Family pulled from Africa to celebrate Lohri
- फोटो : Kaithal
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कैथल। लोहड़ी पर्व खरीफ का सीजन समाप्त होने पर भगवान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और आपसी भाईचारा मजबूत करने के लिए सामूहिक रूप से मनाया जाता था। पर्व आज भी मनाया जाता है। लेकिन इसके मनाने के मायने बदल गए हैं। मौजूदा दौर में लोग घरों में ही लोहड़ी पर्व मनाते हैं। कुछ जगह ऐसी हैं, जहां लोहड़ी पर्व आज भी परिवार के लोगों द्वारा इकट्ठा होकर खुशी के साथ मनाया जाता है। जिले में पर्व को लेकर कितनी गर्मजोशी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक परिवार लोहड़ी की परंपरा का निर्वाह करने के लिए दक्षिण अफ्रीका से अपने शहर खिंचा चला आया है। वीरवार को लोहड़ी पर्व मनाया जा रहा है। इस संदर्भ में ‘अमर उजाला’ द्वारा महिलाओं से बातचीत की गई। जिसमें महिलाओं ने इस पर्व को मनाने के मायने तो बताए ही साथ ही कहा कि युवाओं को अपनी परंपरा से जोड़ने में यह पर्व मददगार साबित हो रहा है।
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से सेवानिवृत्त प्रिंसिपल जनक नरूला ने कहा कि पहले खरीफ का सीजन समाप्त होने के बाद भगवान के प्रति आभार जताने और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता लाते हुए आपसी भाईचारा बनाए रखने के लिए लोहड़ी का पर्व मनाया जाता था। पर्व आज भी मनाया जाता है। मायने वही हैं। लेकिन थोड़ा सा तरीका बदल गया है। पहले मोहल्ले के बच्चे एकत्रित होकर मूंगफली व रेवड़ी मांग कर एकत्रित करते थे। फिर सभी लोग अलाव जलाकर एक साथ बैठकर भांगड़ा करते हुए इन्हें खाते थे। ठंड में तिल से बनी मिठाइयां खाते थे। मकर संक्रांति पर बुजुर्गों को उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता था। आज भी बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है। हालांकि थोड़ी परंपराएं बदल गई हैं। बच्चे एकत्रित नहीं होते। समय में भी बदलाव आया है। लोग घरों में ही पर्व मनाते हैं। हमें एकत्रित होकर बेहतर जिंदगी के लिए भगवान का आभार जताने और भाईचारा को मजबूत बनाने के लिए पर्व मनाना चाहिए।
पंजाबी परंपरा के साथ पहली लोहड़ी मनाएंगे पराग व दीक्षा
कैथल। इनरव्हील क्लब से जुड़ी समाज सेवी रंजू मारवाह के परिवार में इस बार ऊपरवाले ने अलग ही खुशियां बख्शी हैं। उनके बेटे पराग व पुत्रवधू दीक्षा की इस बार पहली लोहड़ी है। रंजू मारवाह ने बताया कि हम पहले घरों में उत्साह के साथ लोहड़ी पर्व मनाते थे। इस बार उनके पुत्र व पुत्रवधू की पहली लोहड़ी है जो दक्षिण अफ्रीका से विशेष रूप से पहली लोहड़ी मनाने के लिए आए हुए हैं। इसके लिए एक रेस्तरां में पंजाबी परंपरा के साथ कार्यक्रम प्लान किया गया है। जिसमें ढोल, पंजाबी खाना, पंजाबी रहन-सहन संबंधी साज-सज्जा मौके पर की जा रही है। वीरवार को परिवार के लोगों के साथ बेटे और बहू की लोहड़ी मनाई जाएगी। इसमें परिवार के सभी बड़े लोग दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देंगे। भांगड़ा डालेंगे। लोहड़ी के गीत गाए जाएंगे। कोविड नियमों का पालन करते हुए इस बार लोहड़ी पर्व मनाया जाएगा। उनके बेटे पराग दक्षिण अफ्रीका में व्यवसाय करते हैं। लोहड़ी पर्व पर उनके आने से पूरे परिवार में जश्न का माहौल है।
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कैथल। लायंस क्लब के धन सचदेवा ने कहा कि लोहड़ी पंजाबी वर्ग का पारंपरिक पर्व है। दुल्हन के घर आने पर आए लोहड़ी पर्व या फिर बच्चा होने पर आए लोहड़ी पर्व को तो और अधिक खुशियों के साथ मनाया जाता है। तिल व फूलिए को अलाव में फेंक कर पर्व इसीलिए मनाते हैं कि इस दिन के बाद मौसम बदलना शुरू हो जाता है और तिल-तिल करके दिन बढ़ना शुरू हो जाता है। अनाज घर आने और मौसम में परिवर्तन को लेकर भी यह पर्व मनाया जाता है।
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राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से सेवानिवृत्त प्रिंसिपल जनक नरूला ने कहा कि पहले खरीफ का सीजन समाप्त होने के बाद भगवान के प्रति आभार जताने और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता लाते हुए आपसी भाईचारा बनाए रखने के लिए लोहड़ी का पर्व मनाया जाता था। पर्व आज भी मनाया जाता है। मायने वही हैं। लेकिन थोड़ा सा तरीका बदल गया है। पहले मोहल्ले के बच्चे एकत्रित होकर मूंगफली व रेवड़ी मांग कर एकत्रित करते थे। फिर सभी लोग अलाव जलाकर एक साथ बैठकर भांगड़ा करते हुए इन्हें खाते थे। ठंड में तिल से बनी मिठाइयां खाते थे। मकर संक्रांति पर बुजुर्गों को उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता था। आज भी बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है। हालांकि थोड़ी परंपराएं बदल गई हैं। बच्चे एकत्रित नहीं होते। समय में भी बदलाव आया है। लोग घरों में ही पर्व मनाते हैं। हमें एकत्रित होकर बेहतर जिंदगी के लिए भगवान का आभार जताने और भाईचारा को मजबूत बनाने के लिए पर्व मनाना चाहिए।
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पंजाबी परंपरा के साथ पहली लोहड़ी मनाएंगे पराग व दीक्षा
कैथल। इनरव्हील क्लब से जुड़ी समाज सेवी रंजू मारवाह के परिवार में इस बार ऊपरवाले ने अलग ही खुशियां बख्शी हैं। उनके बेटे पराग व पुत्रवधू दीक्षा की इस बार पहली लोहड़ी है। रंजू मारवाह ने बताया कि हम पहले घरों में उत्साह के साथ लोहड़ी पर्व मनाते थे। इस बार उनके पुत्र व पुत्रवधू की पहली लोहड़ी है जो दक्षिण अफ्रीका से विशेष रूप से पहली लोहड़ी मनाने के लिए आए हुए हैं। इसके लिए एक रेस्तरां में पंजाबी परंपरा के साथ कार्यक्रम प्लान किया गया है। जिसमें ढोल, पंजाबी खाना, पंजाबी रहन-सहन संबंधी साज-सज्जा मौके पर की जा रही है। वीरवार को परिवार के लोगों के साथ बेटे और बहू की लोहड़ी मनाई जाएगी। इसमें परिवार के सभी बड़े लोग दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देंगे। भांगड़ा डालेंगे। लोहड़ी के गीत गाए जाएंगे। कोविड नियमों का पालन करते हुए इस बार लोहड़ी पर्व मनाया जाएगा। उनके बेटे पराग दक्षिण अफ्रीका में व्यवसाय करते हैं। लोहड़ी पर्व पर उनके आने से पूरे परिवार में जश्न का माहौल है।
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कैथल। लायंस क्लब के धन सचदेवा ने कहा कि लोहड़ी पंजाबी वर्ग का पारंपरिक पर्व है। दुल्हन के घर आने पर आए लोहड़ी पर्व या फिर बच्चा होने पर आए लोहड़ी पर्व को तो और अधिक खुशियों के साथ मनाया जाता है। तिल व फूलिए को अलाव में फेंक कर पर्व इसीलिए मनाते हैं कि इस दिन के बाद मौसम बदलना शुरू हो जाता है और तिल-तिल करके दिन बढ़ना शुरू हो जाता है। अनाज घर आने और मौसम में परिवर्तन को लेकर भी यह पर्व मनाया जाता है।