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जिला उपभोक्ता आयोग ने इंश्योरेंस कंपनी को दिया इलाज का भुगतान करने का आदेश
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जिला उपभोक्ता आयोग ने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी रेलीगेयर के खिलाफ उपभोक्ता के इलाज में खर्च हुए 19 हजार रुपए 9 प्रतिशत ब्याज सहित देने का फैसला सुनाया है। इसके साथ-साथ इंश्योरेंस कंपनी पर 5 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है। जुर्माने की राशि उपभोक्ता को हर्जाने के रूप में देने की बात कही गई है।
संदीप कुमार निवासी नंदकरण माजरा ने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी रेलीगेयर से स्वयं, अपनी पत्नी व बच्चे के नाम पर एक ऑनलाइन पेमेंट करके हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी। संदीप कुमार ने पत्नी के बीमारी होने पर उसे शाह अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया था। उसके इलाज पर 19 हजार रुपये खर्चा आया था। उपभोक्ता ने अस्पताल से बिल व अन्य कागजात लेकर जब हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी में भुगतान के लिए आवेदन किया तो कंपनी ने यह कहते हुए राशि देने से मना कर दिया कि महिला की बीमारी उसकी पॉलिसी के अंतर्गत आती है। इसके बाद संदीप ने इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी कि इंश्योरेंस कंपनी ने उसके साथ धोखा किया है। उक्त मामले की सुनवाई के दौरान जिला उपभोक्ता फोरम प्रधान डीएन अरोड़ा, सदस्य सुमन राणा व राजबीर सिंह ने फैसला सुनाया है कि महिला को अस्पताल में दाखिल करवाने से पहले सभी टेस्ट किए गए और उसके बाद उसकी बीमारी की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल में इलाज किया गया। इंश्योरेंस कंपनी को कांट्रेक्ट अनुसार उपभोक्ता को बिलों की अदायगी करनी थी, जो उसने नहीं की। फोरम ने कहा कि रेलीगेयर इंश्योरेंस कंपनी को उपभोक्ता संदीप कुमार को 19 हजार रुपये इलाज का खर्चा, 19 हजार रुपये का 9 प्रतिशत ब्याज और 5 हजार रुपये हर्जाने के तौर पर उपभोक्ता को देने होंगे।
उपभोक्ता फोरम ने रिजेक्ट की 20 लाख रुपये के क्लेम की याचिका
कैथल। उपभोक्ता फोरम ने एक महिला की 20 लाख रुपये के क्लेम की याचिका को उपयुक्त सुबूतों के अभाव में खारिज कर दिया है। कैथल निवासी रीना ने याचिका में बताया था कि उसके पति का एसबीआई में खाता धारक होने पर एक हजार रुपये सालाना पॉलिसी के आधार पर 20 लाख रुपये का बीमा किया था। 14 दिसंबर 2019 को उसके पति की घर में फिसल कर गिरने से मौत हो गई। उसे शाह अस्पताल लेकर गए। जहां मृत घोषित किए जाने पर वे उन्हें जिला अस्पताल लेकर गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने हृदय गति रुकने की आशंका जताई। इसके बाद जब उसने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस में क्लेम के लिए आवेदन किया तो उसका क्लेम रिजेक्ट कर दिया। इसी कारण फोरम की शरण ली थी। उपभोक्ता फोरम ने इस मामले में दायर याचिका को रिजेक्ट कर दिया और कहा कि मौत के कारण के संबंध में याचिकाकर्ता स्पष्ट जानकारी नहीं दे पाईं। जिस कारण जनता का पैसा इस तरह से देने के आदेश नहीं दिए जा सकते।
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संदीप कुमार निवासी नंदकरण माजरा ने हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी रेलीगेयर से स्वयं, अपनी पत्नी व बच्चे के नाम पर एक ऑनलाइन पेमेंट करके हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी। संदीप कुमार ने पत्नी के बीमारी होने पर उसे शाह अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया था। उसके इलाज पर 19 हजार रुपये खर्चा आया था। उपभोक्ता ने अस्पताल से बिल व अन्य कागजात लेकर जब हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी में भुगतान के लिए आवेदन किया तो कंपनी ने यह कहते हुए राशि देने से मना कर दिया कि महिला की बीमारी उसकी पॉलिसी के अंतर्गत आती है। इसके बाद संदीप ने इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी कि इंश्योरेंस कंपनी ने उसके साथ धोखा किया है। उक्त मामले की सुनवाई के दौरान जिला उपभोक्ता फोरम प्रधान डीएन अरोड़ा, सदस्य सुमन राणा व राजबीर सिंह ने फैसला सुनाया है कि महिला को अस्पताल में दाखिल करवाने से पहले सभी टेस्ट किए गए और उसके बाद उसकी बीमारी की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल में इलाज किया गया। इंश्योरेंस कंपनी को कांट्रेक्ट अनुसार उपभोक्ता को बिलों की अदायगी करनी थी, जो उसने नहीं की। फोरम ने कहा कि रेलीगेयर इंश्योरेंस कंपनी को उपभोक्ता संदीप कुमार को 19 हजार रुपये इलाज का खर्चा, 19 हजार रुपये का 9 प्रतिशत ब्याज और 5 हजार रुपये हर्जाने के तौर पर उपभोक्ता को देने होंगे।
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उपभोक्ता फोरम ने रिजेक्ट की 20 लाख रुपये के क्लेम की याचिका
कैथल। उपभोक्ता फोरम ने एक महिला की 20 लाख रुपये के क्लेम की याचिका को उपयुक्त सुबूतों के अभाव में खारिज कर दिया है। कैथल निवासी रीना ने याचिका में बताया था कि उसके पति का एसबीआई में खाता धारक होने पर एक हजार रुपये सालाना पॉलिसी के आधार पर 20 लाख रुपये का बीमा किया था। 14 दिसंबर 2019 को उसके पति की घर में फिसल कर गिरने से मौत हो गई। उसे शाह अस्पताल लेकर गए। जहां मृत घोषित किए जाने पर वे उन्हें जिला अस्पताल लेकर गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने हृदय गति रुकने की आशंका जताई। इसके बाद जब उसने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस में क्लेम के लिए आवेदन किया तो उसका क्लेम रिजेक्ट कर दिया। इसी कारण फोरम की शरण ली थी। उपभोक्ता फोरम ने इस मामले में दायर याचिका को रिजेक्ट कर दिया और कहा कि मौत के कारण के संबंध में याचिकाकर्ता स्पष्ट जानकारी नहीं दे पाईं। जिस कारण जनता का पैसा इस तरह से देने के आदेश नहीं दिए जा सकते।
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