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दस साल में सरकारी स्कूलों में घटे 14 हजार विद्यार्थी....
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अभिभावकों का रुझान घटने से दस साल में सरकारी स्कूलों में घटे 14 हजार विद्यार्थी
सरकारी स्कूलों का हाल हुआ बेहाल, आठवीं तक सबसे ज्यादा 27 हजार बच्चे हुए कम, 9वीं से 12वीं तक ही बढ़े
मिडिल तक सरकारी स्कूलों में नहीं ले रहे अभिभावक रुचि लगातार घट रही संख्या से खाली हो रहे हैं स्कूल
सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों की संख्या का घटना चिंता का विषय
फोटो नंबर-06 से 08
कमल बहल
कैथल। शिक्षा विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ पा रही है। पिछले दस सालों में जिले के सरकारी स्कूलों में 14 हजार बच्चे कम हुए हैं। सबसे ज्यादा बेहाल मिडिल तक है। जहां पूरे जिले में 27 हजार बच्चे कम हुए हैं। हालांकि आठवीं से बारहवीं करीब 13 हजार बच्चे बढ़े हैं। जिससे स्पष्ट है कि बड़ी कक्षाओं में तो बच्चे बढ़ रहे हैं, लेकिन मिडिल तक बच्चों की संख्या में तेजी से गिरावट जा रही है। अब पूरे जिले में अध्यापकों की संख्या पूरी हो चुकी है। उम्मीद है कि इस साल सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़े।
मिडिल तक आई ज्यादा गिरावट : शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार जिले में पहली से आठवीं कक्षा तक जिले में वर्ष 2009 से 2019 तक 27 हजार बच्चे कम हुए हैं। जिससे स्पष्ट है कि अभिभावकों का प्राथमिक स्कूलों में रुझान काफी कम हुआ है। सबसे ज्यादा बच्चे इन दस सालों में तीसरी कक्षा में 13 हजार से बच्चों की संख्या कम होकर 8 हजार रह गए हैं। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की लगातार गिरावट से आने वाले समय में बड़ी कक्षाओं में भी बच्चों की संख्या कम हो सकती है। पहली से लेकर आठवीं कक्षा में कुल 27 हजार से अधिक विद्यार्थियों की संख्या कम हुई है। जो वर्ष 2008 में 1 लाख 400 होती थी। 2018 के दिसंबर में 73 हजार 566 हो गई। कई प्राथमिक स्कूल तो खाली होने के कगार पर हैं। राजकीय प्राथमिक खुराना में पहली से पांचवीं कक्षा तक महज 24 बच्चे रह गए हैं। डेरा जबरा में स्कूल बंद हो चुका है। गोबिंदपुरा स्कूल में महज 25 बच्चे हैं। इस तरह अनेकों ऐसे स्कूल हैं, जहां बच्चे काफी कम संख्या में रह गए हैं।
8वीं से 12वीं तक राहत की बात, बारहवीं में बच्चों की संख्या हुई करीब दोगुनी : शिक्षा विभाग के लिए एक राहत की बात है कि कक्षा 8वीं से 12वीं तक बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ है। वहीं वर्ष 2008 में नौंवी से बारहवीं कक्षा में कुल 21 हजार 36 विद्यार्थी थे। जो दिसंबर 2018 तक बढ़कर 33 हजार 732 हुई है। बारहवीं में तो संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। यह लगभग 3 हजार से बढ़कर 5 हजार से अधिक हो गई है।
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सैकड़ों करोड़ रुपया हो चुका है खर्च : जिले में लगभग 4300 नियमित व 999 अतिथि अध्यापकों के यदि वेतन का ही मोटा सा अनुमान लगाया जाए तो यह राशि 1500 करोड़ रुपये से अधिक बनती है। औसतन एक नियमित अध्यापक का वेतन यदि 30 हजार रुपये मान लें, तो 4300 अध्यापकों को 120 महीने में लगभग 1500 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हो चुका है। इसी तरह से 999 अतिथि अध्यापकों के वेतन का अनुमान लगाया जाए तो यह भी 15000 की औसत से भी करीब 150 करोड़ रुपये से अधिक बनता है। इसके अलावा स्कूल भवनों, अधिकारियों व अन्य तरह के खर्च अलग हैं। यहां हम अध्यापकों को मिलने वाले वेतन का विरोध नहीं कर रहे, बस अनुमानित लागत देना चाहते हैं।
एक नहीं कई कारण हैं बच्चों की संख्या कम होने के : अध्यापक संघ के जिला अध्यक्ष सतबीर गोयत का कहना है कि बच्चों की संख्या कम होने का कोई एक कारण नहीं है। सरकार की अव्यवस्थित नीतियों के कारण बच्चों की संख्या कम हो रही है। अध्यापकों को केवल पढ़ाने का ही काम लिया जाए तो किसी भी सूरत में संख्या कम नहीं हो सकती। लेकिन विभाग द्वारा अध्यापकों से पढ़ाने के अलावा अन्य सभी तरह के काम लिए जा रहे हैं। हर रोज नए-नए फरमानों के कारण अध्यापक को पढ़ाने का समय नहीं मिल रहा। परीक्षाओं से पहले 15-15 दिनों के शेड्यूल आते हैं कि पढ़ाई हो न हो, कार्यक्रम होने चाहिए। इसलिए पढ़ाई प्रभावित हो रही है। अध्यापक संघ की मांग है कि स्टेट बजट का 25 प्रतिशत, जीडीपी का 10 प्रतिशत केंद्र का शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। इस समय ढाई प्रतिशत तो केंद्र का व राज्य का करीब 10 प्रतिशत खर्च हो रहा है। सरकार को बजट बढ़ाना होगा। अध्यापक संघ द्वारा हर साल लोगों को प्रेरित किया जाता है कि वे सरकारी स्कूलों में बच्चों को दाखिल करवाएं।
विभाग का कहना, दाखिले के लिए अध्यापक चलाएंगे अभियान : विद्यार्थियों की कम हुई संख्या पर जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी शमशेर सिरोही ने कहा कि शिक्षा विभाग की ओर से विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देेने के लिए अनूठी स्कीम चलाई गई है। जिस भी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या कम हुई हैं। उन कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या को बढ़ाने के लिए अध्यापकों द्वारा अभियान चलाकर अभिभावकों को सरकारी स्कूलों में उनके बच्चों को दाखिला दिलाने के प्रेरित किया जाएगा।
पिछले 10 वर्षों के यह है आंकड़े :
कक्षा विद्यार्थी 2008 में विद्यार्थी 2018 में
पहली 13439 8798
दूसरी 13154 8421
तीसरी 13384 8088
चौथी 13547 8653
पांचवीं 12427 9272
छठी 11807 10118
सातवीं 10886 10030
आठवीं 11756 10186
नौंवी 6390 12203
दसवीं 7368 11072
ग्यारहवीं 4279 5095
बारहवीं 2999 5362
कुल 121436 107298
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सरकारी स्कूलों का हाल हुआ बेहाल, आठवीं तक सबसे ज्यादा 27 हजार बच्चे हुए कम, 9वीं से 12वीं तक ही बढ़े
मिडिल तक सरकारी स्कूलों में नहीं ले रहे अभिभावक रुचि लगातार घट रही संख्या से खाली हो रहे हैं स्कूल
सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों की संख्या का घटना चिंता का विषय
फोटो नंबर-06 से 08
कमल बहल
कैथल। शिक्षा विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ पा रही है। पिछले दस सालों में जिले के सरकारी स्कूलों में 14 हजार बच्चे कम हुए हैं। सबसे ज्यादा बेहाल मिडिल तक है। जहां पूरे जिले में 27 हजार बच्चे कम हुए हैं। हालांकि आठवीं से बारहवीं करीब 13 हजार बच्चे बढ़े हैं। जिससे स्पष्ट है कि बड़ी कक्षाओं में तो बच्चे बढ़ रहे हैं, लेकिन मिडिल तक बच्चों की संख्या में तेजी से गिरावट जा रही है। अब पूरे जिले में अध्यापकों की संख्या पूरी हो चुकी है। उम्मीद है कि इस साल सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़े।
मिडिल तक आई ज्यादा गिरावट : शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार जिले में पहली से आठवीं कक्षा तक जिले में वर्ष 2009 से 2019 तक 27 हजार बच्चे कम हुए हैं। जिससे स्पष्ट है कि अभिभावकों का प्राथमिक स्कूलों में रुझान काफी कम हुआ है। सबसे ज्यादा बच्चे इन दस सालों में तीसरी कक्षा में 13 हजार से बच्चों की संख्या कम होकर 8 हजार रह गए हैं। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की लगातार गिरावट से आने वाले समय में बड़ी कक्षाओं में भी बच्चों की संख्या कम हो सकती है। पहली से लेकर आठवीं कक्षा में कुल 27 हजार से अधिक विद्यार्थियों की संख्या कम हुई है। जो वर्ष 2008 में 1 लाख 400 होती थी। 2018 के दिसंबर में 73 हजार 566 हो गई। कई प्राथमिक स्कूल तो खाली होने के कगार पर हैं। राजकीय प्राथमिक खुराना में पहली से पांचवीं कक्षा तक महज 24 बच्चे रह गए हैं। डेरा जबरा में स्कूल बंद हो चुका है। गोबिंदपुरा स्कूल में महज 25 बच्चे हैं। इस तरह अनेकों ऐसे स्कूल हैं, जहां बच्चे काफी कम संख्या में रह गए हैं।
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8वीं से 12वीं तक राहत की बात, बारहवीं में बच्चों की संख्या हुई करीब दोगुनी : शिक्षा विभाग के लिए एक राहत की बात है कि कक्षा 8वीं से 12वीं तक बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ है। वहीं वर्ष 2008 में नौंवी से बारहवीं कक्षा में कुल 21 हजार 36 विद्यार्थी थे। जो दिसंबर 2018 तक बढ़कर 33 हजार 732 हुई है। बारहवीं में तो संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। यह लगभग 3 हजार से बढ़कर 5 हजार से अधिक हो गई है।
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सैकड़ों करोड़ रुपया हो चुका है खर्च : जिले में लगभग 4300 नियमित व 999 अतिथि अध्यापकों के यदि वेतन का ही मोटा सा अनुमान लगाया जाए तो यह राशि 1500 करोड़ रुपये से अधिक बनती है। औसतन एक नियमित अध्यापक का वेतन यदि 30 हजार रुपये मान लें, तो 4300 अध्यापकों को 120 महीने में लगभग 1500 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हो चुका है। इसी तरह से 999 अतिथि अध्यापकों के वेतन का अनुमान लगाया जाए तो यह भी 15000 की औसत से भी करीब 150 करोड़ रुपये से अधिक बनता है। इसके अलावा स्कूल भवनों, अधिकारियों व अन्य तरह के खर्च अलग हैं। यहां हम अध्यापकों को मिलने वाले वेतन का विरोध नहीं कर रहे, बस अनुमानित लागत देना चाहते हैं।
एक नहीं कई कारण हैं बच्चों की संख्या कम होने के : अध्यापक संघ के जिला अध्यक्ष सतबीर गोयत का कहना है कि बच्चों की संख्या कम होने का कोई एक कारण नहीं है। सरकार की अव्यवस्थित नीतियों के कारण बच्चों की संख्या कम हो रही है। अध्यापकों को केवल पढ़ाने का ही काम लिया जाए तो किसी भी सूरत में संख्या कम नहीं हो सकती। लेकिन विभाग द्वारा अध्यापकों से पढ़ाने के अलावा अन्य सभी तरह के काम लिए जा रहे हैं। हर रोज नए-नए फरमानों के कारण अध्यापक को पढ़ाने का समय नहीं मिल रहा। परीक्षाओं से पहले 15-15 दिनों के शेड्यूल आते हैं कि पढ़ाई हो न हो, कार्यक्रम होने चाहिए। इसलिए पढ़ाई प्रभावित हो रही है। अध्यापक संघ की मांग है कि स्टेट बजट का 25 प्रतिशत, जीडीपी का 10 प्रतिशत केंद्र का शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। इस समय ढाई प्रतिशत तो केंद्र का व राज्य का करीब 10 प्रतिशत खर्च हो रहा है। सरकार को बजट बढ़ाना होगा। अध्यापक संघ द्वारा हर साल लोगों को प्रेरित किया जाता है कि वे सरकारी स्कूलों में बच्चों को दाखिल करवाएं।
विभाग का कहना, दाखिले के लिए अध्यापक चलाएंगे अभियान : विद्यार्थियों की कम हुई संख्या पर जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी शमशेर सिरोही ने कहा कि शिक्षा विभाग की ओर से विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देेने के लिए अनूठी स्कीम चलाई गई है। जिस भी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या कम हुई हैं। उन कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या को बढ़ाने के लिए अध्यापकों द्वारा अभियान चलाकर अभिभावकों को सरकारी स्कूलों में उनके बच्चों को दाखिला दिलाने के प्रेरित किया जाएगा।
पिछले 10 वर्षों के यह है आंकड़े :
कक्षा विद्यार्थी 2008 में विद्यार्थी 2018 में
पहली 13439 8798
दूसरी 13154 8421
तीसरी 13384 8088
चौथी 13547 8653
पांचवीं 12427 9272
छठी 11807 10118
सातवीं 10886 10030
आठवीं 11756 10186
नौंवी 6390 12203
दसवीं 7368 11072
ग्यारहवीं 4279 5095
बारहवीं 2999 5362
कुल 121436 107298