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महाभारत काल में थे चार वन, 5 नदियां गुजरती थीं कैथल से

Sun, 21 Apr 2019 12:23 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 21 Apr 2019 12:23 AM IST
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महाभारत काल में थे चार वन, 5 नदियां गुजरती थीं कैथल से
कैथल। प्राचीन कपिस्थल आज जो कैथल के नाम से जाना जाता है, इतिहास के झरोखों में विश्व के हृदयस्थली कुरुक्षेत्र की 48 कोस की परिधि का दिल यदि किसी को कहा जाए तो यह कैथल है। कैथल में 48 कोस की परिधि के 7 में से 4 वन कैथल में हैं। जिनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं। यहीं पर रावण के नाना महर्षि पोलस्थ का आश्रम पोलड़ में हैं, यहीं पर महर्षि कश्यप की तपोस्थली है, यहीं पर नवग्रह कुंड हैं। यहीं पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी जी महाराज हुए हैं। कुछ इस तरह से विशेषज्ञों ने शनिवार को आरकेएसडी संध्याकालीन कॉलेज में आयोजित वैदिक कपिस्थल से कैथल तक विचार गोष्ठी में तथ्य रखे। जिन्हें जानकार गोष्ठी में भाग लेने के लिए आए लोग हैरान रह गए।
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इस गोष्ठी का आयोजन कैथल इतिहास संकलन समिति द्वारा समिति के संस्थापक डॉ. दामोदर वशिष्ठ की स्मृति में किया गया। प्रो. दामोदर वशिष्ठ आरकेएसडी कॉलेज के संस्थापक प्राध्यापकों में से एक थे। जिन्होंने कैथल के स्थानीय साहित्यकारों को खोजकर उनकी रचनाओं को पुस्तकों को रूप दिलवाया। उन्होंने कैथल इतिहास संकलन समिति का गठन किया और कैथल के इतिहास पर कई पुस्तकें लिखीं। गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. श्रेयांश द्विवेदी ने भाग लिया। जबकि अध्यक्षता आरकेएसडी कॉलेज प्रबंधक समिति एवं आरवीएस के प्रधान साकेत मंगल एडवोकेट ने की। वहीं विशिष्ट अतिथि के तौर पर संध्याकालीन कॉलेज के प्रधान नवनीत गोयल, प्रो. बीबी भारद्वाज, प्रो. पीसी मित्तल, सरस्वती विकास बोर्ड के सदस्य शशिपाल सेठ, बीएड कॉलेज के प्रधान सुनील चौधरी ने भाग लिया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रो. दामोदर वशिष्ठ के पुत्र हरेश वशिष्ठ, दीपक वशिष्ठ एवं न्यायाधीश चंद्रशेखर वशिष्ठ भी पहुंचे। मुख्य अतिथि डॉ. श्रेयांश द्विवेदी ने कहा कि इतिहास के बिना भारतीय संस्कृति कि कल्पना असंभव है। भारत की भूमि अर्पण व तर्पण की भूमि है। इतिहास को अगर अच्छे से जानना है तो हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति पर लौटना होगा। स्कूलों में भारतीय संस्कृति की शिक्षा देने के लिए आगे आना होगा। उन्होंने प्रो. दामोदर वशिष्ठ को भी नमन किया। मंच संचालन इतिहास संकलन समिति के अध्यक्ष कमलेश शर्मा ने किया। संचालन डॉ. चतुर्भुज बंसल ने अपनी कविताओं से किया। प्रो. बीबी भारद्वाज ने वैदिक कपिस्थल से लेकर वर्तमान कैथल के इतिहास के बारे में विस्तार से बताया। गोष्ठी में पहुंचे अतिथियों का स्वागत समिति के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक अत्रि व डॉ. हरीश झंडई ने किया। संध्याकालीन कॉलेज के प्रधान नवनीत गोयल ने प्रो. दामोदर वशिष्ठ से सीखी गई बातों का उल्लेख किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष साकेत मंगल ने कहा कि इतिहास देश ही नहीं बल्कि विश्व से जोड़ता है। इससे पूर्व प्रो. बीबी भारद्वाज द्वारा लिखी गई पुस्तक कपिस्थल का विमोचन भी किया गया। इस मौके पर प्रिंसिपल संजय कुमार गोयल, नवनीत गोयल, प्रो. पीसी मित्तल, प्रो. बीडी गुप्ता, ब्रह्म कल्याण समिति के प्रधान रतन लाल शर्मा, चेयरमैन कृष्ण कौशिक, सोहन लाल गुप्ता भी उपस्थित थे।
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