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ेश की एकता में हिंदी भविष्य में भी बड़ी भूमिका निभा रही
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देश को एकसूत्र में पिरोता है हिंदी : डॉ. हुकुम चंद
हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय एकता के विविध स्वर विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
फोटो नंबर-26
अमर उजाला ब्यूरो
पूंडरी। डीएवी कालेज पूंडरी में शनिवार को उच्चतर शिक्षा विभाग के वित्तीय अनुदान से हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय एकता के विविध स्वर विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। जिसमें पंजाबी युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. हुकुम चंद राजपाल मुख्यातिथि के रूप में मौजूद रहे।
उन्होंने बताया कि हिंदी साहित्य देश को एकसूत्र में पिरोता है। उन्होंने समकालीन काव्य चेतना के अनेक उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की आत्मा इनमें जीवंत है। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. पूर्णमल गौड़ ने कहा कि देश की एकता में हिंदी भविष्य में भी बड़ी भूमिका निभाएगी। उन्होंने देशभक्ति की अनेक काव्य पंक्तियों का उदाहरण दिया। जैसे ‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना फेंक, जिस पथ पर शीश चढ़ाने जाएं वीर अनेक’। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. लालचंद गुप्त ‘मंगल’, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग व अधिष्ठाता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र ने अपने व्याख्यान में कहा ‘तुम्हारे अजमो इस्तकवाल पर सबकी निगाहें हैं, वतन के गम गुजारो वतन के जां निसारो तुम सो न जाना’। इतिहासकार डॉ. रामेश्वर ने राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को बताते हुए भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के दार्शनिक व सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया। डॉ. अशोक भाटिया ने भारत की एकता में धर्म और जाति की बाधाओं को रेखांकित करते हुए हिंदी कथा साहित्य से अनेक उदाहरण दिए।
संगोष्ठी के संरक्षक डॉ. सुभाष तंवर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सफल आयोजन के लिए आयोजन समिति को बधाई दी। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. रविंद्र गासो ने बताया कि इस संगोष्ठी में प्रिंसिपल डॉ. ऋषिपाल बेदी, प्रिंसिपल डॉ. विकास आनंद, प्रिंसिपल डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. कृष्ण कुमार, मटक माजरी, डॉ. ऋषिपाल कौल, डॉ. ईश्वर सिंह सागवाल कौल, डॉ. सबीर सिंह करनाल, डॉ. संजय जैन करनाल, डॉ. रामफल मौन कैथल, डॉ. राजेंद्र बड़गूजर कैथल, डॉ. किरण शर्मा, यमुनानगर, डॉ. मलकीत सिंह आनंदपुर साहिब, डॉ. चंद्रप्रकाश पटियाला, डॉ. जयकुमार करनाल, डॉ. हरिओम फूलिया, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, डॉ. सुनील दत्त करनाल, डॉ. शर्मिला यादव पानीपत, डॉ. बलजीत सेरधा, अंबाला शहर प्रसिद्ध साहित्यकार रामकुमार आत्रेय, हरपाल शर्मा फरल, बलदेव सिंह महरोक सहित दर्जनों विद्वानों ने संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी की और अपने विचार रखे। डॉ. कृष्ण चंद रल्हाण ने संगोष्ठी का सारांश प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों का व स्टाफ के सभी सदस्यों का धन्यवाद किया।
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हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय एकता के विविध स्वर विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
फोटो नंबर-26
अमर उजाला ब्यूरो
पूंडरी। डीएवी कालेज पूंडरी में शनिवार को उच्चतर शिक्षा विभाग के वित्तीय अनुदान से हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय एकता के विविध स्वर विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। जिसमें पंजाबी युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. हुकुम चंद राजपाल मुख्यातिथि के रूप में मौजूद रहे।
उन्होंने बताया कि हिंदी साहित्य देश को एकसूत्र में पिरोता है। उन्होंने समकालीन काव्य चेतना के अनेक उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की आत्मा इनमें जीवंत है। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. पूर्णमल गौड़ ने कहा कि देश की एकता में हिंदी भविष्य में भी बड़ी भूमिका निभाएगी। उन्होंने देशभक्ति की अनेक काव्य पंक्तियों का उदाहरण दिया। जैसे ‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना फेंक, जिस पथ पर शीश चढ़ाने जाएं वीर अनेक’। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. लालचंद गुप्त ‘मंगल’, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग व अधिष्ठाता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र ने अपने व्याख्यान में कहा ‘तुम्हारे अजमो इस्तकवाल पर सबकी निगाहें हैं, वतन के गम गुजारो वतन के जां निसारो तुम सो न जाना’। इतिहासकार डॉ. रामेश्वर ने राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को बताते हुए भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के दार्शनिक व सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया। डॉ. अशोक भाटिया ने भारत की एकता में धर्म और जाति की बाधाओं को रेखांकित करते हुए हिंदी कथा साहित्य से अनेक उदाहरण दिए।
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संगोष्ठी के संरक्षक डॉ. सुभाष तंवर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सफल आयोजन के लिए आयोजन समिति को बधाई दी। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. रविंद्र गासो ने बताया कि इस संगोष्ठी में प्रिंसिपल डॉ. ऋषिपाल बेदी, प्रिंसिपल डॉ. विकास आनंद, प्रिंसिपल डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. कृष्ण कुमार, मटक माजरी, डॉ. ऋषिपाल कौल, डॉ. ईश्वर सिंह सागवाल कौल, डॉ. सबीर सिंह करनाल, डॉ. संजय जैन करनाल, डॉ. रामफल मौन कैथल, डॉ. राजेंद्र बड़गूजर कैथल, डॉ. किरण शर्मा, यमुनानगर, डॉ. मलकीत सिंह आनंदपुर साहिब, डॉ. चंद्रप्रकाश पटियाला, डॉ. जयकुमार करनाल, डॉ. हरिओम फूलिया, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, डॉ. सुनील दत्त करनाल, डॉ. शर्मिला यादव पानीपत, डॉ. बलजीत सेरधा, अंबाला शहर प्रसिद्ध साहित्यकार रामकुमार आत्रेय, हरपाल शर्मा फरल, बलदेव सिंह महरोक सहित दर्जनों विद्वानों ने संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी की और अपने विचार रखे। डॉ. कृष्ण चंद रल्हाण ने संगोष्ठी का सारांश प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों का व स्टाफ के सभी सदस्यों का धन्यवाद किया।
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