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दान हाथ जुड़वा कर नहीं, स्वयं हाथ जोड़कर दे : साध्वी लब्धि प्रभा
Mon, 06 Mar 2023 12:35 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Mon, 06 Mar 2023 12:35 AM IST
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उचाना। तेरापंथ जैन भवन में प्रवचन करते हुए साध्वी लब्धि प्रभा ठाणे-3 ने कहा कि दान में हमेशा दूसरे की अपेक्षा रहती है। आप खाना खाते हो अगर दूसरे को भूखा देख कर भी उसे कुछ नहीं देते तो हम भी चोर है। दान किसी के हाथ जुड़वा कर नहीं, हाथ जोड़कर करना चाहिए।
अगर कोई मेहमान हमारे घर आता है ये आपकी पुण्यवानी है। किसी व्यक्ति ने एक संत से पूछा आप बड़े हैं फिर भी नीचे क्यूं बैठते हैं। तब संत ने कहा कि नीचे बैठने वाला कभी भी नहीं गिरता। स्वयं से बात करें। आज हर व्यक्ति की जेब में फोन है पर वह फोन भी आपको कहता है कि स्वयं से बात करें। अंतर्मुखी बनें। बाहर बात करने पर क्लेश, झगड़ा, फसाद ही बढ़ता है पर अंतर्मुखी भगवान को प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि कभी भी मेहमान को दुतकारो मत। दान कई प्रकार के प्रकार के होते है। संग्रह दान जो यह सोचकर देना कि एक के बदले 10 मिलेंगे, अनुकंपा दान, लज्जादान समाज के प्रमुख हैं। यह सोचकर दान देना कि लोग क्या कहेंगे, भय दान जो डर कर दिया जाए, गौरव दान अपना गौरव बढ़ाने के लिए दान देना, धर्मदान रोगी, गरीब की सेवा में दान देना है। अतिथि देवता है। घर में अतिथि आया हुआ हो तो अमृत ही क्यों न हो अकेले नहीं पीना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार नहीं होता वह घर-घर नहीं श्मशान है। उस घर की चौखट पर भूलकर भी पैर पड़ जाए तो स्नान करना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार में कभी चूक नहीं होती वह घर-घर नहीं तीर्थ है। उस घर की चौखट मात्र को छूने से तीर्थ यात्रा का फल मिलता है। जो गृहस्थ अतिथि को खिलाकर फिर खुद खाता है वह कभी भी भूखा नहीं सोता। जो व्यक्ति जाने वाले अतिथि की सेवा कर चुका है और आने वाले अतिथि की इंतजार करता है वह खुद देवताओं का अतिथि बनता है।
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अगर कोई मेहमान हमारे घर आता है ये आपकी पुण्यवानी है। किसी व्यक्ति ने एक संत से पूछा आप बड़े हैं फिर भी नीचे क्यूं बैठते हैं। तब संत ने कहा कि नीचे बैठने वाला कभी भी नहीं गिरता। स्वयं से बात करें। आज हर व्यक्ति की जेब में फोन है पर वह फोन भी आपको कहता है कि स्वयं से बात करें। अंतर्मुखी बनें। बाहर बात करने पर क्लेश, झगड़ा, फसाद ही बढ़ता है पर अंतर्मुखी भगवान को प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि कभी भी मेहमान को दुतकारो मत। दान कई प्रकार के प्रकार के होते है। संग्रह दान जो यह सोचकर देना कि एक के बदले 10 मिलेंगे, अनुकंपा दान, लज्जादान समाज के प्रमुख हैं। यह सोचकर दान देना कि लोग क्या कहेंगे, भय दान जो डर कर दिया जाए, गौरव दान अपना गौरव बढ़ाने के लिए दान देना, धर्मदान रोगी, गरीब की सेवा में दान देना है। अतिथि देवता है। घर में अतिथि आया हुआ हो तो अमृत ही क्यों न हो अकेले नहीं पीना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार नहीं होता वह घर-घर नहीं श्मशान है। उस घर की चौखट पर भूलकर भी पैर पड़ जाए तो स्नान करना चाहिए। जिस घर में अतिथि सत्कार में कभी चूक नहीं होती वह घर-घर नहीं तीर्थ है। उस घर की चौखट मात्र को छूने से तीर्थ यात्रा का फल मिलता है। जो गृहस्थ अतिथि को खिलाकर फिर खुद खाता है वह कभी भी भूखा नहीं सोता। जो व्यक्ति जाने वाले अतिथि की सेवा कर चुका है और आने वाले अतिथि की इंतजार करता है वह खुद देवताओं का अतिथि बनता है।
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