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सावन में शिव पूजा और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व : पुजारी
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फोटो 27जेएनडी15-प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर पुजारी सत्यनारायण शांडिल्य।
उचाना। सावन मास 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्रद्धालुओं नियमित रूप से शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करें।
प्राचीन श्री राधा कृष्ण मंदिर, लाला प्रभु दयाल चौधरी धर्मार्थ ट्रस्ट के पुजारी सत्यनारायण शांडिल्य ने बताया कि इस वर्ष सावन के चार सोमवार आएंगे। इन दिनों शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक का महत्व रहेगा।
समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष का पान भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए किया था। विष की तीव्रता को कम करने के लिए देवी-देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से सावन मास में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
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शांडिल्य ने बताया कि सावन सोमवार का व्रत करने से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति, दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि, ग्रह दोषों का निवारण, नकारात्मकता का अंत तथा आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि सावन केवल उपवास का महीना नहीं, बल्कि पारिवारिक और धार्मिक उत्सवों का भी समय है। इस माह हरियाली तीज, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं तथा विवाहित महिलाएं मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखकर अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
उन्होंने कहा कि रुद्राभिषेक के बारे में बताते हुए कहा कि विभिन्न पदार्थों से अभिषेक करने की धार्मिक मान्यताएं हैं। जल से वर्षा की कामना, कुशोदक से रोगों से मुक्ति, दही से भवन एवं वाहन सुख, गन्ने के रस से लक्ष्मी प्राप्ति, शहद एवं घी से धन वृद्धि, तीर्थ जल से मोक्ष, इत्र मिले जल से रोग निवारण, दूध एवं गौ दुग्ध से संतान सुख, गंगाजल से ज्वर शांति तथा घृत धारा से वंश वृद्धि की मान्यता है। श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया रुद्राभिषेक भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त कराने वाला माना गया है।
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प्राचीन श्री राधा कृष्ण मंदिर, लाला प्रभु दयाल चौधरी धर्मार्थ ट्रस्ट के पुजारी सत्यनारायण शांडिल्य ने बताया कि इस वर्ष सावन के चार सोमवार आएंगे। इन दिनों शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक का महत्व रहेगा।
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समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष का पान भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए किया था। विष की तीव्रता को कम करने के लिए देवी-देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से सावन मास में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
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शांडिल्य ने बताया कि सावन सोमवार का व्रत करने से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति, दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि, ग्रह दोषों का निवारण, नकारात्मकता का अंत तथा आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि सावन केवल उपवास का महीना नहीं, बल्कि पारिवारिक और धार्मिक उत्सवों का भी समय है। इस माह हरियाली तीज, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं तथा विवाहित महिलाएं मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखकर अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
उन्होंने कहा कि रुद्राभिषेक के बारे में बताते हुए कहा कि विभिन्न पदार्थों से अभिषेक करने की धार्मिक मान्यताएं हैं। जल से वर्षा की कामना, कुशोदक से रोगों से मुक्ति, दही से भवन एवं वाहन सुख, गन्ने के रस से लक्ष्मी प्राप्ति, शहद एवं घी से धन वृद्धि, तीर्थ जल से मोक्ष, इत्र मिले जल से रोग निवारण, दूध एवं गौ दुग्ध से संतान सुख, गंगाजल से ज्वर शांति तथा घृत धारा से वंश वृद्धि की मान्यता है। श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया रुद्राभिषेक भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त कराने वाला माना गया है।